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September 20 2018 01:44 AM

विश्व को भारत की अनुपम देन: योग

Posted at: Jun 21 , 2018 by Dilersamachar 5082

डा. विनोद बब्बर

दिलेर समाचार, बेशक भारत में सदियों से योग का प्रचार-प्रसार रहा है लेकिन ‘योग क्या है’ आज यह प्रश्न पूरी दुनिया के लिए बेमानी हो चुका है क्यांेकि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 2015 से हर वर्ष 21 जून को  अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाये जाने की घोषणा के बाद से न केवल भारत बल्कि लगभग पूरी दुनिया जान चुकी है कि ‘जीवन जीने की कला है  का नाम योग है। स्वयं की स्वयं के माध्यम से स्वयं तक पहुँचने की यात्रा का नाम योग है।’ इसलिए यह कोई आश्चर्य नहीं कि अब तक जो लोग योग को केवल हिन्दुत्व से जोड़ते हुए इससे दूर रहने की बातें करते थे, अब वे भी नजरिया बदलने को मजबूर हो रहे हैं।

कुछ लोग यह भी जानने के उत्सुक हैं कि 21 जून को ही अंतरराष्ट्रीय योग दिवस क्यों? वास्तव में 21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध (भूमध्यरेखा से ऊपर वाले भूभाग) पर सबसे बड़ा दिन होता है। इसी दिन सूर्य अपनी स्थिति बदल कर दक्षिणायन होते हैं। कुछ लोगों का यह भी मत है कि आदिगुरु भगवान शिव ने इस दिन योग का ज्ञान सप्तऋषियों को दिया था। अतःयह दिन धरती पर अवतरण दिवस भी है।

योग कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं है इसीलिए तो ‘योगः कर्मषु कौशलम’ कहा गया है। गीता ‘योग क्षेम वहाम्यहं’ का उद्घोष करती है जिसका अर्थ है- अप्राप्त कोे प्राप्त करना और प्राप्त की रक्षा करना। दुनिया में ऐसा कौन है जो  अच्छा स्वास्थ्य, मन की शांति  प्राप्त न करना चाहते हो। यह कामना रखना अथवा इसके लिए प्रयास करना किसी एक धर्म के लोगों के लिए आरक्षित नहीं हो सकता। सद्गुण को बांटना और दुर्गुण को नष्ट करना भारतीय संस्कृति की मूल है।

पाकिस्तानी नागरिक शमशाद हैदर योग को विज्ञान मानते हुए उसे किसी मजहब से जोड़ने के विरोधी हैं। शमशाद और उनके साथियों के प्रयासों से इस्लामाबाद, लाहौर, कराची सहित पाकिस्तान के अनेक शहरों में योग के प्रति रूचि बहुत तेजी से बढ़ी है क्योंकि इससे उन्हें अस्थमा और सांस के रोगांे सहित अनेक कई गंभीर बीमारियों से राहत मिल रही है। खास बात यह है कि वहां इसे रोजगार के नए अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है।  अमरीकी नागरिक फरीदा हमजा जो स्वयं भी अनेक वर्षों से योग कर रही हैं, कहती हैं, ‘नमाज की हर अवस्था  यौगिक मुद्रा है। जो योग से घृणा करते हैं, उन्हें योग के बारे में पता नहीं है। नमाज के समय अपनी बीच वाली उंगली और अंगूठे को मिलाना योग मुद्रा की तरह है। यह अल्लाह की मेहरबानी है कि मैं योग करती हूं।’

यह प्रसन्नता की बात है कि विदेश ही नहीं, देशभर से योग के प्रति लोगांे की रूचि बढ़ रही है। हजारों वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने मानवता के हित में विश्व को यह योग विद्या दी थी लेकिन इसे जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास  करने वाले भी अभिनंदन के पात्रा हैं। स्पष्ट है कि आज सारी दुनिया योग के महत्त्व को समझते हुए उसे अपनी दिनचर्या का अंग बना रही है। दुनिया के 175 देशों, जिनमें ईरान, अफगानिस्तान, इराक, बांग्लादेश, यमन, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, सीरिया सहित 40 मुस्लिम देश भी शामिल है, में  अंतरराष्ट्रीय योग दिवस बनाये जाने ने हमारे ऋषियों मुनियों की इस अनुपम देन को जन-जन तक पहुंचा दिया है।  ‘योग कला, विज्ञान और दर्शन है, जो जनता को आत्मानुभूति कराने में मदद करता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने पुष्टि की है कि योग से न सिर्फ तनाव कम होता है बल्कि दीर्घकाल तक कई फायदे होते हैं। प्राचीन भारतीय पद्धतियां शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को लेकर लोगों की जरूरतों का संपूर्ण उत्तर हैं।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो देश सदियों से योग विद्या का साक्षी रहा है उस देश के अधिकांश युवा आज तथा कथित आधुनिक  (विकृत) जीवन शैली और खान पान की खराब आदतों के कारण बहुत कम आयु में ही मधुमेह और ब्लड प्रेशर जैसे रोगों के शिकार हो रहे  हैं। उन्हें इंटरनेट, स्मार्ट फोन, सोशल मीडिया ने इतना व्यस्त कर दिया है कि वे अपने कर्तव्यों को तो भूले ही हैं, स्वयं अपने आप तक को भूल रहे हैं। शारीरिक श्रम लगातार कम हो रहा है। ऐसे में उनका मन और बुद्धि सक्रिय होते हुए भी शरीर की निष्क्रियता बोझ बन रही है। यदि हम उन्हें भी योग के लिए प्रेरित कर सके, तभी हमारे लिए अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की सच्ची सार्थकता होगी। योग को अपनी दिनचर्या में शामिल कर ही वे स्वयं को शारीरिक और मानसिक रुप से स्वस्थ रख सके तो पूरी दुनिया को योग का उपहार देने वाले भारत के लिए भी सुखद संकेत होगा। आवश्यक है कि हमारे युवा स्फूर्ति,जोश और उत्साह से भरे हों। तभी वे देश के विकास में अपनी सम्यक भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं। केन्द्र एवं सभी राज्य सरकारों को हर तरह की राजनीतिक संकीर्णताओं से ऊपर उठते हुए सभी स्कूलों में प्रतिदिन योगाभ्यास अनिवार्य करना चाहिए।

पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में योग की महत्ता बढ़ रही है तो इसके लिए हर भारतीय को प्रसन्न ही होना चाहिए क्योंकि योग प्रवर्तक ऋषि हर भारतीय के पूर्वज  थे। अपनी उपासना पद्धति बदलने वाले यह न भूलंे कि सब कुछ बदला जा सकता है पर अपने पूर्वज नहीं। महर्षि पंतजलि के अनुसार, ‘योगश्चित्त वृत्तिनिरोधः’’ अर्थात् चित्त की वृत्तियों को रोकने का नाम योग है। हम सभी को भी अपने चित्त से योग के विरोध की वृत्ति का त्याग कर स्वस्थ,सुदीर्घ जीवन के लिए प्रयास करने चाहिए।

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