Logo
September 20 2018 02:24 AM

जानें क्या है कालसर्प योग एवं उसका निवारण

Posted at: Apr 7 , 2018 by Dilersamachar 5573
दिलेर समाचार, किसी जातक की जन्म पत्रिका में राहू एवं केतु के मध्य अन्य सातों ग्रह आ जाते है तो कालसर्प योग की निष्पत्ती होती है ये दोने ही ग्रह वक्री गति से गमन करते है ये दोनो ही लगभग 18 माह में राशि परिर्वतन करते है काल सर्प योग केवल 12 प्रकार का होता है, कुछ विद्वान इसे इससे अधिक प्रकार का मानते है, जो शास्त्रोक्त नहीं है शास्त्र में इसके केवल 12 प्रकारों का ही वर्णन मिलता है कुछ विद्वान केतु से राहू के मध्य समस्त ग्रह आ जाने पर भी कालसर्प योग का सृजन मानते है परन्तु वह मात्र पितृदोष ही होता है ।
 
राहू के साथ यदि सूर्य, चंद्रमा, शनि, मंगल, वृहस्पति हो तो ऐसे व्यक्तियों को अपने जीवन में अपने दोस्तो , रिश्तेदारो से ज्यादा विचार विर्मष नही करना चाहिये ये लोग आपको हमेशा उलझाकर रखते है । यही सब ग्रह केतु के साथ हो तो उन्हे किसी कार्य में जल्दबाजी नही करनी चाहिये सब काम अचानक ही होने लगते है 
 
कुछ लक्षण है जिनसे हम कालसर्प दोष एवं पित्र दोष को निश्चित कर सकते है ।
 
1.बचपन में किसी भी प्रकार की बाधा का उत्पन्न होना। अर्थात घटना-दुर्घटना, चोट लगना, बीमारी आदि का होना।
 
2. विद्या अध्ययन में रुकावट होना या पढ़ाई बीच में ही छूट जाना। पढ़ाई में मन नहीं लगना या फिर ऐसी कोई आर्थिक अथवा शारीरिक बाधा जिससे अध्ययन में व्यवधान उत्पन्न हो जाए।
3. विवाह में विलंब भी कालसर्प दोष का ही एक लक्षण है। यदि ऐसी स्थिति दिखाई दे तो निश्चित ही किसी विद्वान ज्योतिषी से संपर्क करना चाहिए। इसके साथ ही इस दोष के चलते वैवाहिक जीवन में तनाव और विवाह के बाद तलाक की स्थिति भी पैदा हो जाती है।
 
4.एक अन्य लक्षण कालसर्प दोष है संतान का न होना और यदि संतान हो भी जाए तो उसकी प्रगति में बाधा उत्पन्न होती है।
 
5. परिजन तथा सहयोगी से धोखा खाना, खासकर ऐसे व्यक्ति जिनका आपने कभी भला किया हो।
 
6.घर में कोई सदस्य यदि लंबे समय से बीमार हो और वह स्वस्थ नहीं हो पा रहा हो साथ ही बीमारी का कारण पता नहीं चल रहा है।
 
7.आए दिन घटना-दुर्घटनाएं होते रहना।
 
8.रोजगार में दिक्कत या फिर रोजगार हो तो बरकत न होना।
 
9.इस दोष के चलते घर की महिलाओं को कुछ न कुछ समस्याएं उत्पन्न होती रहती हैं।
 
10.रोज घर में कलह का होना। पारिवारिक एकता खत्म हो जाना।
 
11.घर-परिवार मांगलिक कार्यों के दौरान बाधा उत्पन्न होना।
 
12.यदि परिवार में किसी का गर्भपात या अकाल मृत्यु हुई है तो यह भी कालसर्प दोष का लक्षण है।
 
13.घर के किसी सदस्य पर प्रेतबाधा का प्रकोप रहना या पूरे दिन दिमाग में चिड़चिड़ापन रहना।
 
त्रम्बकेश्वर नासिक इस दोष से मुक्ति का सबसे उत्तम स्थान माना गया है, जहां शांतिकर्म किया जाता है। इसके अलावा भी किसी पवित्र नदी के तट पर तीर्थस्थान में शिव सान्निध्य में प्रयोग किए जा सकते हैं, लेकिन हर व्यक्ति की सामर्थ्य इस कार्य को करने की नहीं होती, क्योंकि समय ज्यादा लगता है तथा यह काफी खर्चीला कार्य भी है।
 
उज्जैन में पुण्य सलिला क्षिप्रा के तट पर स्थित सिद्धवट पर भी इस दोष से मुक्ति के लिए उचित स्थान है 
 
इसके अतिरिक्त इन कुछ सरल उपायों से भी व्यक्ति अपने दुख तथा समस्याओं में कमी कर सकता है-
 
कालसर्प योग के नाम 
ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक भाव के लिए अलग अलग कालसर्प योग के नाम दिये गये हैं. इन काल सर्प योगों के प्रभाव में भी काफी कुछ अंतर पाया जाता है जैसे प्रथम भाव में कालसर्प योग होने पर अनन्त काल सर्प योग बनता है. 
 
अनन्त कालसर्प योग 
जब प्रथम भाव में राहु और सप्तम भाव में केतु होता है तब यह योग बनता है. इस योग से प्रभावित होने पर व्यक्ति को शारीरिक और, मानसिक परेशानी उठानी पड़ती है साथ ही सरकारी व अदालती मामलों में उलझना पड़ता है. इस योग में अच्छी बात यह है कि इससे प्रभावित व्यक्ति साहसी, निडर, स्वतंत्र विचारों वाला एवं स्वाभिमानी होता है. 
 
कुलिक काल सर्प योग 
द्वितीय भाव में जब राहु होता है और आठवें घर में केतु तब कुलिक नामक कालसर्प योग बनता है. इस कालसर्प योग से पीड़ित व्यक्ति को आर्थिक काष्ट भोगना होता है. इनकी पारिवारिक स्थिति भी संघर्षमय और कलह पूर्ण होती है. सामाजिक तौर पर भी इनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं रहती. 
 
वासुकि कालसर्प योग 
जन्म कुण्डली में जब तृतीय भाव में राहु होता है और नवम भाव में केतु तब वासुकि कालसर्प योग बनता है. इस कालसर्प योग से पीड़ित होने पर व्यक्ति का जीवन संघर्षमय रहता है और नौकरी व्यवसाय में परेशानी बनी रहती है. इन्हें भाग्य का साथ नहीं मिल पाता है व परिजनों एवं मित्रों से धोखा मिलने की संभावना रहती है. शंखपाल कालसर्प योग राहु जब कुण्डली में चतुर्थ स्थान पर हो और केतु दशम भाव में तब यह योग बनता है. इस कालसर्प से पीड़ित होने पर व्यक्ति को आंर्थिक तंगी का सामना करना होता है. इन्हें मानसिक तनाव का सामना करना होता है. इन्हें अपनी मां, ज़मीन, परिजनों के मामले में कष्ट भोगना होता है. 
 
पद्म कालसर्प योग 
पंचम भाव में राहु और एकादश भाव में केतु होने पर यह कालसर्प योग बनता है. इस योग में व्यक्ति को अपयश मिलने की संभावना रहती है. व्यक्ति को यौन रोग के कारण संतान सुख मिलना कठिन होता है. उच्च शिक्षा में बाधा, धन लाभ में रूकावट व वृद्धावस्था में सन्यास की प्रवृत होने भी इस योग का प्रभाव होता है. 
 
महापद्म कालसर्प योग 
जिस व्यक्ति की कुण्डली में छठे भाव में राहु और बारहवें भाव में केतु होता है वह महापद्म कालसर्प योग से प्रभावित होता है. इस योग से प्रभावित व्यक्ति मामा की ओर से कष्ट पाता है एवं निराशा के कारण व्यस्नों का शिकार हो जाता है. इन्हें काफी समय तक शारीरिक कष्ट भोगना पड़ता है. प्रेम के ममलें में ये दुर्भाग्यशाली होते हैं. 
 
तक्षक कालसर्प योग 
तक्षक कालसर्प योग की स्थिति अनन्त कालसर्प योग के ठीक विपरीत होती है. इस योग में केतु लग्न में होता है और राहु सप्तम में. इस योग में वैवाहिक जीवन में अशांति रहती है. कारोबार में साझेदारी लाभप्रद नहीं होती और मानसिक परेशानी देती है.
 
शंखचूड़ कालसर्प योग 
तृतीय भाव में केतु और नवम भाव में राहु होने पर यह योग बनता है. इस योग से प्रभावित व्यक्ति जीवन में सुखों को भोग नहीं पाता है. इन्हें पिता का सुख नहीं मिलता है. इन्हें अपने कारोबार में अक्सर नुकसान उठाना पड़ता है. 
 
घातक कालसर्प योग 
कुण्डली के चतुर्थ भाव में केतु और दशम भाव में राहु के होने से घातक कालसर्प योग बनता है. इस योग से गृहस्थी में कलह और अशांति बनी रहती है. नौकरी एवं रोजगार के क्षेत्र में कठिनाईयों का सामना करना होता है. 
 
विषधर कालसर्प योग 
केतु जब पंचम भाव में होता है और राहु एकादश में तब यह योग बनता है. इस योग से प्रभावित व्यक्ति को अपनी संतान से कष्ट होता है. इन्हें नेत्र एवं हृदय में परेशानियों का सामना करना होता है. इनकी स्मरण शक्ति अच्छी नहीं होती. उच्च शिक्षा में रूकावट एवं सामाजिक मान प्रतिष्ठा में कमी भी इस योग के लक्षण हैं. 
 
शेषनाग कालसर्प योग 
व्यक्ति की कुण्डली में जब छठे भाव में केतु आता है तथा बारहवें स्थान पर राहु तब यह योग बनता है. इस योग में व्यक्ति के कई गुप्त शत्रु होते हैं जो इनके विरूद्ध षड्यंत्र करते हैं. इन्हें अदालती मामलो में उलझना पड़ता है. मानसिक अशांति और बदनामी भी इस योग में सहनी पड़ती है. इस योग में एक अच्छी बात यह है कि मृत्यु के बाद इनकी ख्याति फैलती है. अगर आपकी कुण्डली में है तो इसके लिए अधिक परेशान होने की आवश्यक्ता नहीं है. काल सर्प योग के साथ कुण्डली में उपस्थित अन्य ग्रहों के योग का भी काफी महत्व होता है. आपकी कुण्डली में मौजूद अन्य ग्रह योग उत्तम हैं तो संभव है कि आपको इसका दुखद प्रभाव अधिक नहीं भोगना पड़े और आपके साथ सब कुछ अच्छा हो. 
 
 
1.राहू तथा केतु के मंत्रों का जाप करें या करवाएं-
 
राहू मंत्र ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः 
 
केतु मंत्र ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः
 
2.सर्प मंत्र या नाग गायत्री के जाप करें या करवाएं-
 
सर्प मंत्र ॐ नागदेवताय नमः 
 
नाग गायत्री मंत्र ॐ नवकुलाय विद्यमहे विषदंताय धीमहि तन्नो सर्पः प्रचोदयात् ।।
 
3.ऐसे शिवलिंग (शिव मंदिर में) जहां शिवजी पर नाग न हो, प्रतिष्ठा करवाकर नाग चढ़ाएं।आपकी राशि या लग्न अनुसार ताँबे पंचधातु या चांदी का हो सकता है ।
 
4.श्रीमद भागवत और श्री हरिवंश पुराण का पाठ करवाते रहें।
 
5. दुर्गा पाठ करें या करवाएं।
 
6. भैरव उपासना करें।
 
7.श्री महामत्युंजय मंत्र का जाप करने से राहू-केतु का असर खत्म होगा।
 
8 श्री भगवान नारायण के वाहन गरूड़ सहित फोटो जिसके पंजो में नाग पकड़ रखा हो।
 
9 अपने निवास स्थान  में गोमुत्र पानी में मिलाकर पोछा
लगवाऐं, एवं गोमुत्र का सुबह शाम सेवन भी करें।
 
10 गाय व कुत्ते की सेवा दिल लगाकर करें
 
11 किसी पवित्र नदी में धारा के विपरीत जाकर रांगे के 108 नागों को विसर्जित करना ।
 
12 मूक पशु - पक्षी की सेवा करना पंछियों एवं चीटीयों को चुगाना।
 
ज्योर्तिविद पं. संजय शर्मा 9424828545, 9893129882)

ये भी पढ़े: रोजाना की ये 5 आदतें आपको कर रही हैं बीमार, अच्छी डाइट और एक्सरसाइज भी फेल


Tags:

Related Articles

Popular Posts

Photo Gallery

STAY CONNECTED