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July 20 2018 08:06 PM

लाठी के बल पर उत्पाद करते लोग

Posted at: Jun 21 , 2018 by Dilersamachar 5206

नरेंद्र देवांगन

दिलेर समाचार, देश की आजादी के बाद भारत को एक लोकतांत्रिक देश का दर्जा मिला। शांति और अहिंसा को देश का मूल स्वरूप रखा गया। आजादी की लड़ाई के समय महात्मा गांधी ने अहिंसा का सहारा लेकर अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर किया था। गांधीजी ने कई ऐसे आंदोलन को वापस लिया जिसमें हिंसा होने लगी थी। आजादी के समय अहिंसा ने अपना काम किया और आजादी के बाद जब देश को ज्यादा संविधान का पालन करना चाहिए था तब हिंसक घटनाएं घटने लगीं। इनमें देश में होने वाले चुनावों की स्थिति भी काफी असरदार होती है।

देश में ऐसी बहुत सारी घटनाएं घट रही हैं जिनको देखकर यह साफ हो जाता है कि लोकतंत्रा अब लाठीतंत्रा की ओर बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे धर्म के पाखंड को मजबूत करने की सोच साफतौर पर नजर आती है। इसको धार्मिक अंधविश्वास के डंडे के जोर पर तरह-तरह से थोपा जा रहा है। इतिहास गवाह है कि लाठीतंत्रा के आगे सरकारें झुकती रही हैं। वे किए गए वादों से मुकर जाती हैं। कानून अपना राज स्थापित नहीं कर पाता और प्रशासन लाचार हो जाता है। इस तरह की घटनाओं में इंसाफ नहीं मिलता। अगर मिलता भी है तो आधा-अधूरा।

प्रधानमंत्राी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में एक समुदाय को मारने की घटनाएं लाठीतंत्रा का ही उदाहरण हैं जहां पर एक समुदाय के खिलाफ हिंसा होती रही और बाकी समाज चुप्पी साधे रहा। साल 1992 के बाद राम मंदिर का आंदोलन भीड़तंत्रा का एक उदाहरण है। उस समय की उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट में हलफनामा देकर कहा था कि अयोध्या में कुछ नहीं होने पाएगा पर भीड़ ने लाठी के जोर पर विवादित ढांचा ढहा दिया। 26 साल बीत जाने के बाद भी इसका फैसला नहीं आ पाया है। ऐसी घटनाओं से लाठीतंत्रा को बढ़ावा मिलता है।

पहले इस तरह की गिनी-चुनी घटनाएं घटती थीं पर अब इनकी तादाद बढ़ती जा रही है। गौरक्षा के नाम पर ऐसी तमाम घटनाएं घटी हैं जिनमें लाठीतंत्रा का असर देखने को मिला। साल 2002 में गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा लाठीतंत्रा का सबसे बड़ा उदाहरण है जिसमें उस समय के प्रधानमंत्राी अटल बिहारी वाजपेयी को गुजरात के मुख्यमंत्राी को ‘राजधर्म‘ का पालन करने की सीख देनी पड़ी थी। धीरे-धीरे इस तरह की घटनाओं ने तेजी पकड़नी शुरू की। इनका दायरा बढ़ने लगा। लोग एकजुट होकर

इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने लगे।

अगर 1977 और 1984 के चुनावों को छोड़ दें तो हर चुनाव में जाति-धर्म का ही बोलबाला रहा है। राजनीति धर्म और जाति पर केंद्रित होती है। जीत के लिए जाति और धर्म का सहारा लिया जाने लगा। इसकी वजह से खेमेबंदी शुरू हो गई और लाठीतंत्रा के खिलाफ कदम उठाना मुश्किल हो गया। धर्म की कहानियों से शिक्षा लेने वाले समाज को दिखता है कि धर्म में ऐसी बहुत सी घटनाएं घटी हैं जहां पर अपनी बात को मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लिया गया। धार्मिक ग्रंथों में कई ऐसी कहानियां हैं जिनमें यह पता चलता है कि अपनी बात को मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है। इन कहानियों को पढ़कर लोगों ने अब हिंसा का ही सहारा ले लिया है।

आरक्षण पाने के लिए जाट समुदाय ने साल 2016 में आंदोलन किया था। हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में 340 अरब रूपए का नुकसान हुआ था। रेलवे का तकरीबन 60 करोड़ रूपए का घाटा हुआ था। तकरीबन ढाई दर्जन लोग मारे गए थे। साल 2008 में गुर्जर समाज ने पिछड़े तबके के बजाय खुद को दलित जाति में शामिल किए जाने को लेकर आंदोलन किया था। तब पुलिस और आंदोलन करने वालों के बीच हिंसक झड़पों मंे तकरीबन 37 लोगों की मौत हुई थीं। साल 2015 में गुजरात में पाटीदार समाज ने आरक्षण पाने के लिए आंदोलन किया था। 25 अगस्त को अहमदाबाद में हुए सबसे बड़े प्रदर्शन मंे जनजीवन ठप्प हो गया था।

भीड़तंत्रा और लाठीतंत्रा के समर्थक यह समझने की कोशिश नहीं करते कि हिंसा का सहारा लेकर चले आंदोलन कभी कामयाब नहीं होते। साल 2012 का अन्ना आंदोलन वर्तमान समय में इसका उदाहरण है। कांग्रेस की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के समय में लोकपाल बिल को लेकर यह आंदोलन इतना प्रभावी हुआ कि कांग्रेस पूरी तरह से सरकार से बाहर हो गई। भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के विकल्प के रूप में सरकार बनाने में कामयाब हो गई। सत्ता में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी इस बात से अनजान है। उसके राज में ऐसी कई घटनाएं घटी हैं जिनमें हिंसा का सहारा लिया गया था।

संविधान के मुताबिक लोकतंत्रा में सभी को इज्जत और इंसाफ मिलना चाहिए। इसकी हिफाजत तभी मुमकिन है जब राज करने वालों की मनमानी पर रोक लगे या उनकी नीयत साफ हो। जब तक वोट बैंक और उससे होने वाले नफा-नुकसान को देखकर फैसले होंगे, तब तक इंसाफ नहीं मिलेगा। भीड़ लाठी लेकर आएगी और अपने हिसाब से काम करने को मजबूर कर देगी। ऐसा लाठीतंत्रा किसी के भी फायदे में नहीं है।a

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