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July 20 2018 08:06 PM

शतायु बना जा सकता है, बशर्ते

Posted at: Jun 19 , 2018 by Dilersamachar 5122

आनंद कुमार अनंत

दिलेर समाचार, कोलम्बिया विश्वविद्यालय के जीव विज्ञानी डॉ. एच. सिक्स ने अपने अनुसंधानों से यह निष्कर्ष निकाला है कि यदि शरीर को रासायनिक दोषों से और जटिल व्याधियों से मुक्त रखा जा सके तो मनुष्य आसानी से सौ वर्षों तक भी जी सकता है।

डॉ. सिक्स का कहना है कि अधिक सक्रियता, दौड़-धूप, उत्तेजना और गर्मी शरीर को संतप्त करके उसकी जीवनी शक्ति के भण्डार को बेहतर खर्च करती है। अगर भीतरी अवयवों पर अतिरिक्त दबाव न पड़े और उन्हें स्वाभाविक सरल रीति से काम करने दिया जाए तो वे इतने समर्थ रह सकते हैं कि क्षतिपूर्ति का क्रम आसानी से चलता रहे।

नशेबाज़ी से लेकर वासना, क्रोध, चिंता आदि कितने ही ऐसे कारण हैं, जो जितने अनावश्यक हैं उससे अधिक हानिकारक हैं। उत्तेजक आहार और उद्विग्न चिंतन स्नायु संस्थान को संतप्त करके मनुष्य को दुर्बल बनाता है और पूरी आयु भोगने से वंचित रखता है। इसके विपरीत शान्त, सरल, संतुष्ट और प्रसन्न जीवन जीने से निरर्थक उत्तेजना से बचा जा सकता है और जीवनी-शक्ति को क्षरित होने से बचाकर लंबा जीवन जिया जा सकता है।

श्वास-प्रश्वास क्रिया के तीव्र और मंद रहने का भी आयुष्य से संबंध है। जो जीव हांफते रहते हैं, जिनकी श्वास तेज चलती है, वे अधिक समय तक जी नहीं पाते। इसके अतिरिक्त जिनकी सांस मन्द चलती है, वे अधिक दिनों तक जीवित रहते हैं। इस संदर्भ में कुछ प्राणियों की श्वास-प्रक्रिया की दर और आयुष्य की तालिका को देखा जा सकता है।

जीव     श्वास प्रति   औसत                        मिनट            आयु

कछुआ   5 बार      150 वर्ष

सांप     7 बार      120 वर्ष

हाथी     12 बार     100 वर्ष

मनुष्य   12 बार     100 वर्ष

घोड़ा    18 बार     50 वर्ष

बिल्ली   25 बार     12 वर्ष

बकरी    25 बार     12 वर्ष

कुत्ता     26 बार     11 वर्ष

कबूतर   36 बार     09 वर्ष

खरगोश  32 बार     08 वर्ष

सशक्त और दीर्घजीवी शारीरिक स्थिति को बनाये रखने के लिए आहार-विहार के संतुलन का ध्यान रखने के अतिरिक्त इस तथ्य को भी स्मरण करना चाहिए कि आन्तरिक शान्ति और समस्वरता का आरोग्य के साथ अविछिन्न संबंध होता है।

मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रखने पर ही शारीरिक स्वास्थ्य को सुरक्षित रखा जा सकता है। अनावश्यक ताप पैदा करने वाले मनोविकार, विक्षोभ एवं उद्देश्यों से बचने और शान्त-संतुलित, संतुष्ट और हंसी-खुशी का जीवन जीने से ही शतायु बना जा सकता है।

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