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May 23 2018 04:35 AM

दीपावली पर जरूर किए जाते हैं ये 12 पारंपरिक कार्य

Posted at: Oct 11 , 2017 by Dilersamachar 5135

दिलेर समाचार, लिपाई-पुताई और नए कपड़े : इस त्योहार के आने के कई दिन पहले से ही घरों की लिपाई-पुताई, सजावट प्रारंभ हो जाती है। वर्षा के बाद गंदगी होने के बाद घर और संपूर्ण शहर तथा गांव की इस बहाने सफाई भी हो जाती है।
दीपावली से पूर्व नए कपड़े भी बनवाए जाते हैं। मान्यता अनुसार लक्ष्मीजी इन दिनों में विशेषरूप से विचरण करती है अत: जहां ज्यादा साफ-सफाई और साफ सुधरे लोग नजर आते हैं वहीं वह रम जाती है। इसीलिए लक्ष्मीजी के आगमन में चमक-दमक की ज्यादा जरूरत होती है।
 
धन्वंतरि पूजा : दिवाली का शुभारंभ कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन से होता है। इसे धनतेरस कहा जाता है। इस दिन आरोग्य के देवता धन्वंतरि की आराधना की जाती है। इस दिन नए-नए बर्तन, आभूषण इत्यादि खरीदने का रिवाज है। इस दिन घी के दिये जलाकर देवी लक्ष्मी का आहवान किया जाता है।
बहिखाते बदलना : धनतेरस के दिन व्यापारी अपनी दुकानों को साफ-सुधरा कर अपने बहीखाते नए बनाते हैं। आज ही के दिन व्यापारी अपने बही-खाते बदलते हैं तथा लाभ-हानि का ब्योरा तैयार करते हैं।
 
खरीददारी : इस दिन बाजारों में चारों तरफ जनसमूह उमड़ पड़ता है। बरतनों की दुकानों पर विशेष साज-सज्जा व भीड़ दिखाई देती है। धनतेरस के दिन बरतन खरीदना शुभ माना जाता है। प्रत्येक व्यक्ति इस दिन अपनी आवश्यकता के अनुसार वस्तुएं खरीदता है। कोई इसी दिन वाहन खरीदता है तो कोई सोना या चांदी। धनतेरस के दिन जमकर खरीददारी भी की जाती है। 
यम, कृष्ण और काली पूजा : धनतेरस के बाद नरक चतुर्दशी का पर्व होता है। इसे रूप चौदस भी कहते हैं। इस दिन जल्दी उठकर अच्छे से स्नान किया जाता है और रात्रि में इस दिन यम पूजा हेतु दीपक जलाए जाते हैं। इसे छोटी दीपावली भी कहा जाता है।
* इस दिन एक पुराने दीपक में सरसों का तेल व पांच अन्न के दाने डालकर इसे घर की नाली की ओर जलाकर रखा जाता है। यह दीपक यम दीपक कहलाता है।
 
* ऐसी धार्मिक धारणा है कि सुबह जल्दी तेल से स्नान कर देवी काली की पूजा करते हैं और उन्हें कुमकुम लगाते हैं।
 
* भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन नरकासुर राक्षस का वध कर उसके कारागार से 16,000 कन्याओं को मुक्त कराया था। इसीलिए इस दिन श्रीकृष्ण की पूजा का भी महत्व है
लक्ष्मी पूजा : धनतेरस के बाद रूप चौदस और रूप चौदस के बाद दीपावली आती है। दीपावली के दिन विष्णुप्रिया लक्ष्मी माता के साथ गणेशजी की पूजा की जाती है।
मान्यता अनुसार चौघड़‍िया का महायोग और शुभ कारक लग्न देखकर रात्रि में लक्ष्मी पूजा का प्रचलन प्राचीनकाल से ही चला आ रहा है। दीपावली के दिन विशेषतौर पर लक्ष्मी पूजा का ही प्रचलन है। लक्ष्मी कारक योग में पूजा करने से कर्ज से मुक्ति मिलती है तो दूसरी ओर अच्छी और शुद्ध भावना से लक्ष्मी की पूजा से धन और समृद्धि बढ़ती है। 
 
गोवर्धन पूजा : दीवावली के दूसरे दिन अन्नकूट महोत्सव मनाया जाता है जिसे गोवर्धन पूजा का दिन भी कहते हैं। यह दिवाली की श्रृंखला में चौथा उत्सव होता है। लोग इस दिन विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर गोवर्धन की पूजा करते हैं। इस दिन को द्यूतक्रीड़ा दिवस भी कहते हैं।
इस दिन परस्पर भेंट का दिन होता है। एक-दूसरे के गले लगकर दीपावली की शुभकामनाएं दी जाती हैं। गृहिणियां मेहमानों का स्वागत करती हैं। लोग छोटे-बड़े, अमीर-गरीब का भेद भूलकर आपस में मिल-जुलकर यह त्योहार मनाते हैं। 
 
इसी दिन को गोवर्धन पूजा होती है जिसे ग्राणिण क्षेत्रों में पड़वा कहते हैं। इस दिन परिवार, कुल खानदान के सभी लोग एक जगह इकट्ठे होकर गोवर्धन और श्रीकृष्ण की पूजा करने के बाद साथ में ही भोजन करते हैं। 
 
लोग गायों के गोबर से अपनी दहलीज पर गोवर्धन बनाकर पूजा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर अचानक आई वर्षा से गोकुल के लोगों को बारिश के देवता इन्द्र से बचाया था। आजकल शहरों में यह पूजा नहीं की जाती लेकिन मेल मिलाप किया जाता है।
भाई दूज : शुक्ल द्वितीया को भाई-दूज या भैयादूज का त्योहार मनाया जाता है। रक्षा बंधन पर भाई अपनी बहन को अपने घर बुलाकर राखी का त्योहर मनाता है, जबकि भाई दूज के दिन विवाहित बहन अपने भाई को अपने घर बुलाकर भोजन आदि कराकर उसे मिठाई आदि देती है। 
 
यह दीपोत्सव का पांचवा और अंतिम दिन होता है। इसे यम द्वितिया भी कहते हैं। ये भाई-बहनों का त्योहार होता है। मान्यता है कि यदि इस दिन भाई और बहन यमुना में स्नान करें तो यमराज निकट नहीं फटकता। चाहे भाई कितना ही व्यस्त हो इस दिन आशीर्वाद लेने के लिए वह अपनी बहन के घर जाकर टीका जरूर लगवाता है।

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