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गरीबों के भरोसे भारत की सेना?

Posted at: Jul 9 , 2019 by Dilersamachar 9524

जयसिंह रावत

लोकतंत्रा के इस युग में जब हम जाति विहीन या वर्ण विहीन समाज की ओर बढ़ रहे हों तो तब शासकों और प्रशासकों की बिरादरी हमें एक नयी वर्ण व्यवस्था की ओर क्यों ले जा रही है? जब नेता का बेटा या बेटी नेता और आइएएस या फिर किसी भी नौकरशाह को बेटा या बेटी नौकरशाह ही बनेंगे तो क्या हम एक नयी वर्ण व्यवस्था की ओर नहीं बढ़ रहे हैं?

केन्द्र या किसी भी राज्य सरकार का कर्मचारी केवल उस जगह पर अपनी तैनाती चाहता है जहां पर सुख सुविधाओं के सारे साधन उपलब्ध हों। यही नहीं, वह तैनाती स्थल पर ऊपरी कमाई की भी कामना करता है। रिस्क वाली जगह पर तैनाती की बात करना भी उसके मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। इसी तरह नेताओं की बिरादरी के बच्चे सरहद पर जान जोखिम में डालना तो रहा दूर, वे सरकारी या किसी की भी नौकरी नहीं करना चाहते। उन्हें नौकर रखने या शासन करने का विशेषाधिकार चाहिये।

अगर इस देश के लोकतांत्रिक ढांचे में हर नागरिक बराबर है और हर नागरिक देश के शासन में शामिल है तो फिर यह भेदभाव क्यों है? अगर यह देश हर देशवासी का है तो इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी हर एक देशवासी की क्यों नहीं हैं? अगर इस देश में तरक्की के अवसरों पर हर एक नागरिक का अधिकार है या सभी को सुख सुविधायुक्त सुरक्षित जीवन जीने का बराबर का अधिकार है तो फिर यह भेदभाव क्यों? नेता या नौकरशाह के बेटे की जान ज्यादा कीमती और आम आदमी के बेटे की जान सस्ती क्यों?

सामरिक दृष्टि से देखा जाए तो भारत और इज्राइल की स्थिति में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। भारत तो कम से कम दो परमाणु शक्ति सम्पन्न वैमनस्यता रखने वाले देशों की सैन्य आकांक्षाओं से भी घिरा हुआ है। इस्राराइल दांतों के बीच में जीभ की जैसी स्थिति के बावजूद हर वक्त डिफेंसिव नहीं बल्कि आॅफेंसिव रहता है। उसके वजूद को मिटाने की इतनी कोशिशों के बावजूद उसका कोई बाल बांका नहीं कर पाता। इसकी वजह यह है कि भारत की तरह वहां एक वर्ग विशेष के जिम्मे देश की सुरक्षा न हो कर यह हर एक नागरिक की जिम्मेदारी होती है। वहां के छोटे नेता से लेकर राष्ट्रपति तक हर किसी को कभी न कभी सेना में योगदान देना ही होता है।

इज्रराइल ही क्यों, दुनियां के डेढ़ दर्जन से अधिक देशों में आवश्यक मिलिट्री सेवा का प्रावधान है। ब्रिटेन में तो आज भी राजशाही हंै और वहां के युवराज या राजकुमारों को आवश्यक मिलिट्री सेवा से गुजरना होता है। ब्रिटिश युवराज चाल्र्स फिलिप अर्थर जाॅर्ज स्वयं नौसेना के पदधारी रहे हैं जबकि उनके बेटे और भावी युवराज विलियम हैरी ने एक सैनिक के तौर पर इराक युद्ध में सक्रिय भागीदारी की थी। इस युद्ध में इस युवराज की जान भी जा सकती थी।

अगर देखा जाए तो आज भारत को सबसे बड़ी सैन्य चुनौती चीन की ओर से है। चीन से चुनौती केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनियां के महाबली अमेरिका के लिये भी है। उस चीन में भी  18 साल की उम्र तक पहुंचने वाले हर युवा को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के दफ्तर में अपना पंजीकरण कराना होता है ताकि जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सके।

भारत के पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल दीपक कपूर ने अपने सेवाकाल के दौरान ही देश में ’आवश्यक मिलिट्री सेवा’ या ’कन्सक्रिप्शन’ की जरूरत की बात कही तो इस विचार को अंगीकार करना तो रहा दूर, नेताओं और सिविल नौकरशाहों की बिरादरी की भौंहें चढ़ गयीं जबकि जनरल कपूर ने तो केवल विचार ही रखा था और यह विचार भी कपोल कल्पना नहीं बल्कि दुनियां के कई देशों की व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए प्रकट किया था।

उनका यह विचार सिविल नौकरशाही के प्रति ईष्र्या भाव के कारण नहीं बल्कि सेना में बड़ी संख्या में अफसरों की कमी को देखते हुए उनके दिमाग में उभरा था। केवल थल सेना में ही आज की तारीख में लगभग 12 हजार अफसरों की कमी है। अगर हर युवा का आकर्षण नेताओं, अभिनेताओं, टैक्नोक्रैट और ब्यूरोक्रैट के बच्चों की तरह शासन प्रशासन और दिन दूनी रात चैगुनी कमाई तथा हनक की ओर होगा तो सेना में मरने के लिये कोई कैसे आकर्षित होगा?

एक जमाने में ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता था। उस साम्राज्य में 1960 तक आवश्यक सैन्य सेवा का प्रावधान रहा लेकिन ग्रेट ब्रिटेन के राजकुमार आज भी सेना में भर्ती होते हैं। दुनियां के एकमात्रा दारोगा संयुक्त राज्य अमेरिका में 1975 तक यह व्यवस्था थी जिसमें संशोधन तो कर दिया गया मगर पूरी तरह यह व्यवस्था समाप्त नहीं की गई।

अमेरिका को आज भी टक्कर देने की हिम्मत रखने वाले रूस में अब भी यह व्यवस्था किसी न किसी रूप में जिन्दा है। इनके अलावा बोलीविया, बर्मा, इंडोनेशिया, फिनलैंड, इस्टोनिया, जाॅर्डन, उत्तर कोरिया, द. कोरिया, मलएशिया, स्विटजरलैंड, सीरिया, ताइवान, थाइलैंड, टर्की, बेनेजुएला और संयुक्त अरब अमीरात में आज भी आवश्यक मिलिट्री सेवा का प्रावधान है।

अमेरिका समेत, पुर्तगाल, पोलैंड, नीदरलैंड, लिथुआनिया, जापान और हंगरी जैसे देशों ने आवश्यक मिलिट्री सेवा तो समाप्त कर दी मगर स्वैच्छिक सेवा का विकल्प बंद नहीं किया। जापान में भी सेल्फ डिफेंस फोर्स में 18 साल की उम्र वाले लड़कों को अपना पंजीकरण कराने की अपेक्षा की जाती है।

सवाल केवल राष्ट्रीय सुरक्षा में हर किसी की भागीदारी का नहीं है। चीन के बाद हमारे पास सबसे अधिक जनशक्ति है और हमारी यह जनशक्ति चीन से भी कहीं युवा है। इस देश की बौद्धिक शक्ति का लोहा अमेरिका तक मानता है। अगर हम इन शक्तियों को सेना से जोड़ते हैं तो हमारी सेना संसार की सबसे शक्तिशाली सेना स्वतः ही बन जाएगी।

ये भी पढ़े: बढ़ती जनसंख्या देश के विकास में बाधक

सवाल केवल सेना में महज औपचारिक भागीदारी का नहीं है। सवाल यह भी है कि अगर हर क्षेत्रा में काम करने वाले एक दूसरे के काम की जटिलताओं, जोखिमों और महत्त्व को समझेंगे तो उनमें तालमेल बढ़ेगा और उनका क्षमता विकास भी होगा। जब एक नेता या ब्यूरोक्रेट का बेटा सीमा पर शहादत देगा तो इस बिरादरी को तब सेना का महत्त्व समझ में आयेगा। ब्यूरोक्रेट सेना में भी काम करेंगे तो उनमें अनुशासन की भावना बढ़ेगी। 

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