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October 19 2019 03:13 PM

अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद विपक्ष की सस्ती राजनीति

Posted at: Oct 10 , 2019 by Dilersamachar 5068

सूर्य प्रकाश अग्रवाल

भारतीय संविधान के अस्थाई अनुच्छेद 370 को अगस्त 5 व 6, 2019 को राज्यसभा व लोकसभा में व्यापक बहस के उपरान्त समाप्त कर दिया गया तथा अब कश्मीर में भारत का संविधान पूर्ण रुप से लागू हो गया है तथा कश्मीरियों के द्वारा शंातिपूर्ण ढंग से इसका स्वागत भी किया गया जबकि इससे पूर्व विपक्ष के नेता मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करते हुए हमेशा ही 70 वर्ष से यह भय उत्पन्न कर रहे थे कि कश्मीर के मुसलमान अनुच्छेद 370 की समाप्ति पर बहुत उत्तेजित हो जायंेगे और भारत के झंडे को उठाने वाला कश्मीर में कोई भी नहीं होगा परन्तु अनुच्छेद 370 के उन्मूलन के उपरान्त भी कांग्रेस सहित सभी अधिकांश विपक्षी दल सस्ती राजनीति करते हुए कश्मीर में तेजी से बढ़ती शांति की प्रक्रिया को तहस-नहस करना चाहते हैं तथा ऐसे राजनीतिक दल स्वयं को लुटा पिटा सा महसूस कर रहे हैं और उन्हें कश्मीर में उनकी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति को विराम लग गया है।

अनुच्छेद 370 ने कश्मीर को न तो हिन्दुस्तान का होने दिया और न ही हिन्दुस्तान को कश्मीर का। कश्मीरियों के लिए पहचान की सियासत ही चल पड़ी थी। कश्मीर के लोग सियासत, अलगाववाद और आतंकवाद के बीच स्वयं को बेसहारा व असुरक्षित महसूस कर रहे थे। कश्मीर के लोग यह सब विश्व को बताना चाहते थे परन्तु उन्हें एक अदृश्य भय सता रहा था। अनुच्छेद 370 मात्रा एक राजनीतिक नारा व कश्मीरियों की भावनाओं के शोषण के लिए ही प्रयोग किया जा रहा था। केन्द्र सरकार भी अनुच्छेद 370  की सियासत करने वाले राजनीतिक दलों को माध्यम बना कर अपने निर्णय कश्मीर में लागू करवा सकी थी। क्या बंगाल में बंगालियों की पहचान समाप्त हो गई है जबकि वहां अनुच्छेद 370 है ही नहीं। क्या वहां की मुख्यमंत्राी ममता बनर्जी की मर्जी के बिना केन्द्र में शासित भाजपा का कोई राजनेता वहां रैली, धरना व प्रदर्शन कर सकता है। कश्मीर के राजनेता केन्द्र को अनुच्छेद 370 के माध्यम से ब्लैकमेल करते रहते थे जिससे अलगावाद ही पोषित होता था।

अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद जिस प्रकार अन्य सभी भारतीयों की पहचान व अधिकार सुरक्षित हैं, उसी प्रकार अब कश्मीर के लोगों की पहचान व अधिकार भी सुरक्षित हो गये हैं। निकट भविष्य में भी कश्मीरी लोग भारत राष्ट्र की एक मुख्यधारा में आ जायेंगे और कश्मीर के लोगों की अलगाववाद की मानसिकता धीरे धीरे धूमिल हो जायेगी। कश्मीर की समस्या का मुख्य कारण अनुच्छेद 370 ही था। इसके पक्ष में गिने चुने लोग ही हैं जो इस अनुच्छेद 370 को लागू रखना चाहते थे। कश्मीर में एक छोटा सा वर्ग है जिसका झुकाव पाकिस्तान की तरफ है जबकि एक बड़े वर्ग का झुकाव हिन्दुस्तान की तरफ है। इससे नेशनल कान्फ्रेंस व पीडीपी जैसी राजनीतिक पार्टियों की राजनीति समाप्त हो गयी है। वे इस अनुच्छेद 370 को कश्मीरियों की पहचान- एक भारतीय की तुलना में न करके मात्रा कश्मीर से ही करते रहते थे। यह अनुच्छेद 370 खाली ताबूत था जिसका सारा सच एक आम कश्मीरी व्यक्ति जानता था। अब यह ताबूत दफन हो गया है।

प्रधानमंत्राी नरेन्द्र मोदी ने राजस्थान में एक सभा में अपने संबोधन में कहा था कि हमारी लड़ाई कश्मीर के लिए है, कश्मीर के खिलाफ नहीं है। कश्मीर की लड़ाई अमन पसंद और भारत समर्थक कश्मीरियों को साथ लेकर ही लड़ी जा सकती है। आज जितनी जरुरत इस बात  को सही तरीके से समझाने की है, उतनी ही इसकी भी है कि कश्मीर के लिए लड़ाई लड़ते समय उन तत्वों का प्रतिकार भी करना होगा जो कश्मीरियत की बात करते करते अलगाव और आतंकवाद की राह पर चल निकले हैं और घाटी के माहौल को विषाक्त करने में लगे हुए हैं। इसी विषाक्त माहौल के चलते एक समय जो कश्मीरियत सूफी परम्परा से पगी और भारतीयता के रंग में रंगी थी, वह आज मजहबी कट्टरता में तब्दील हो गई है। भारतीय हितों को चोट पहंुचाने वाली हरकतें होती हैं।

वहां अलगाववाद एक धंधा बन गया था। पाकिस्तान इस अलगाववाद को राजनीतिक व आर्थिक तरीके से शह दे रहा था। कश्मीर की संस्कृति को भ्रष्ट करने वाले राजनेता ही पाकिस्तान के इशारे पर भारतीयता से लड़ते रहे। तभी नेशनल कान्फ्रेंस व पीडीपी जैसे राजनीतिक दल कभी हुर्रियत जैसे संगठनों को साथ लेने की रट लगाते हैं और कभी इस बात पर जोर देते हैं कि पाकिस्तान से बात की जानी चाहिए। आखिर जिस पाकिस्तान ने कश्मीर को आतंक की आग में झोंक दिया, उससे बात करके क्या हासिल होगा? उससे तो बात पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्रा को खाली कराने पर ही हो सकती है, और किसी मुद्दे पर नहीं।

भाजपा से विपक्ष की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल तथा भारत के तथाकथित वामपंथी मानसिकता वाले बुद्धिजीवी कश्मीर को और अधिक अधिकारों की तो पैरवी करते रहे है लेकिन कश्मीर और शेष भारत के बीच की दूरी को घटाने वाली कोई पहल नहीं की। वे इस पहल में बाधक ही बनते रहे हैं। भारत में विलय के समय वहां के राजा हरी सिंह के द्वारा विलय पत्रा पर हस्ताक्षर करते समय वहां कोई विशेष अधिकार देने की बात नहीं की गई थी। वर्ष 1956 में जम्मू व कश्मीर का संविधान बनाया गया था। इसमें दी गई नागरिकता की परिभाषा के अनुसार वहां का स्थायी नागरिक वही व्यक्ति है जो 14 मई 1954 को राज्य का नागरिक रहा और उसने वहां कानूनी तरीके से सम्पति का अधिग्रहण किया हो। इसके अलावा कोई व्यक्ति 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो या 1 मार्च 1947 के बाद राज्य से माइग्रेट होकर पाकिस्तानी सीमा क्षेत्रा में चले गये हैं लेकिन वे प्रदेश में वापस रीसेलमेंट परमिट के साथ आए हों, कश्मीर का नागरिक माना जायेगा।

अनुच्छेद 370 के अंतर्गत से ही उपजायी गयी अनुच्छेद 35ए के अ्रंतर्गत जम्मू व कश्मीर में वहां के मूल निवासियों के अलावा देश के किसी दूसरे हिस्से का नागरिक वहां कोई सम्पत्ति नहीं खरीद सकता है तथा वह वहां का नागरिक कभी भी नहीं बन सकता। अनुच्छेद 370 के तहत 1954 में अनुच्छेद 35ए को जोड़ा गया था। यह राज्य में अन्य राज्य के भारतीय नागरिकों को स्थायी नागरिक मानने से वर्जित करती है। इस वजह से दूसरे राज्यों के नागरिक न तो जम्मू व कश्मीर में नौकरी पा सकते हैं और न ही सम्पत्ति क्रय कर सकते हैं। यदि प्रदेश की किसी लड़की ने अन्य राज्य के नागरिक से विवाह कर लिया तो उन्हें राज्य में सम्पत्ति के अधिकार से अनुच्छेद 35ए के आधार पर वंचित किया जाता था।

भारत के द्वारा कश्मीर की सुरक्षा और पोषण में व आतंकवाद के विरुद्ध लाखों करोड़ रुपये व्यय किये जाते रहे हैं परन्तु फिर भी स्थिति बिगड़ती ही चली गयी। आतंकवाद के कारण कश्मीर और देश की अर्थव्यवस्था को लगभग 4.155 लाख करोड़ रुपये की हानि हो चुकी है। देश के शेष राज्यों की तुलना में केन्द्र सरकार के द्वारा कश्मीर को आठ गुना से ज्यादा फंड दिया जाता है। 1994 में कांग्रेस के नरसिम्हा राव के कार्य काल में संसद में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करके पाक अधिकृत कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा बताया गया था। पीओके से ही कश्मीर में आतंकवाद की सप्लाई हो रही है। पीओके भारत का एक अभिन्न अंग है पर सामरिक और संवैधानिक आधिपत्य जमाने के लिए भारत को अपने हिस्सों की तरह ही उसे राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल करना चाहिए।

अनुच्छेद 370 को रद्द करना भारत का आंतरिक मामला था और है जिसे पाकिस्तान के द्वारा अतंर्राष्ट्रीय मंचों पर चुनौती दी गई परन्तु पूरा विश्व समूह 5 व 6 अगस्त 2019 के बाद से ही भारत के साथ खड़ा था तथा किसी भी देश ने इस मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ नहीं दिया। तभी से पाकिस्तान के प्रधानमंत्राी इमरान खान आक्रमण की बंदर घुड़की लगातार देते रहे कि पाकिस्तान भारत पर परमाणु हमला कर देगा तथा यदि भारत हमला करता है तो पाकिस्तान उसका करारा जवाब देने में भी सक्षम है परन्तु थोडे़ ही समय में विपक्षी दल को स्यापा करने के बाद ही पाकिस्तान को भी समझ में आ गया कि युद्ध से वह भारत पर विजय हासिल नहीं कर सकता है।

अब भारत को चाहिए कि वह पाकिस्तान द्वारा फैलाई जा रही गलत फहमियों व मुसलमानों को भड़काने की कार्यवाहियों का करारा जवाब दे तथा ऐसे भी उपाय करें जिससे कश्मीर घाटी के लोगों की भारतीय संविधान के प्रति आस्था बढे़ और स्वयं को वे भारतीय मानें न कि कश्मीरियत की आड़ में भारत से इतर। उनकी मानसिकता बदली जानी चाहिए तथा यह भरोसा दिलाना चाहिए कि भारत के लोग कश्मीर के लोगों के साथ प्रत्येक सुख व दुख की घड़ी में उनके साथ खडे़ हैं और जम्मू व कश्मीर में अमन चैन लाने के साथ ही उनके कल्याण के लिए आतुर भी हैं और यह आतुरता दिखनी भी चाहिए। पाकिस्तान को अब यह  अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि अनुच्छेद 370 को समाप्त करना भारत का आंतरिक मामला था। उससे पाकिस्तान का कुछ भी लेना देना नहीं था और अब पाकिस्तान को अपना सभी पैसा व धन आतंकवादियों व भारत में दहशत फैलाने की बजाय अपने नागरिकांे के कल्याण व सुविधा पर व्यय करना चाहिए।

पाकिस्तान ने इस मुद्दे को इस्लाम मजहब से भी जोड़ कर उछाला परन्तु भारत के अधिसंख्य मुसलमानों ने इसको नकार दिया। पाकिस्तान को मुस्लिम राष्ट्रों का भी समर्थन नहीं मिला। पाकिस्तान को चाहिए कि वह अपने क्षेत्रा में चल रही आतंकी शिविरों को भी तुरंत बंद कर दे वरना बालाकोट की तरह किसी भी दिन भारत की सेनाएं उन शिविरों को भी नेस्तनाबूद कर देंगीे तथा पाकिस्तान को अब अपने नागरिकांे की रोजी रोटी की फिक्र करनी चाहिए। अब भारत का उद्देश्य यह कि वह पीओके को जल्दी से जल्दी पाकिस्तान से छीन कर अपने कब्जे में करें। 

आज कश्मीर में एक नयी जागरुकता लाने की जरुरत है जिससे भारत व कश्मीर में अलगाव व आतंक के खुले व छिपे समर्थक हतोत्साहित किये जा सकें। शांति समर्थकों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए तथा सही सोच वाले कश्मीरियों को प्रमुखता देकर भारत के संंिवधान की मुख्यधारा में कश्मीर को कल्याणकारी कार्यों के द्वारा स्थापित करने की है। कश्मीर का लेकर विपक्ष को सस्ती राजनीति तुरंत प्रभाव से बंद कर देनी चाहिए वरना केन्द्र सरकार को उनके विरुद्ध भी कडे़ कदम उठाने से भी कोई संकोच नहीं करना चाहिए। 

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