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भारत का संविधान नागरिकों को कर्तव्य व अधिकार का ज्ञान कराने में सक्षम

Posted at: Dec 16 , 2019 by Dilersamachar 9426

डा. सूर्य प्रकाश अग्रवाल

भारत के संविधान को 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा के द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार कर 26 जनवरी 1950 को लागू कर दिया गया था। भाजपा के नरेन्द्र मोदी की सरकार ने ऐतिहासिक महत्त्व की इस तिथि 26 नवम्बर को भारत के संविधान दिवस मनाने के निर्णय की घोषणा उस समय की जब प्रधानमंत्राी नरेन्द्र मोदी 1 अक्तूबर 2015 को मुम्बई में भारत के संविधान निर्माता डा.ॅ अम्बेडकर की प्रतिमा का शिलान्यास कर रहे थे। भारत के संविधान दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य था कि प्रत्येक भारतीय अपने संविधान के प्रति जागरुक हो तो उसे भारत में रहते हुए उसके अधिकारों के साथ साथ उसके कर्तव्यों का भी बोध हो जायेगा।

संविधान भारत का राजधर्म है जिसका निर्माण 1946 में गठित संविधान सभा ने किया था जिसने विभिन्न विषयों पर 17 समितियां गठित की थी। भारत के संविधान के निर्माण में डा.ॅ राजेन्द्र प्रसाद, पं. जवाहर लाल नेहरु, सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि प्रतिभा सम्पन्न महानुभाव प्रमुख रुप से लगे हुए थे । इसके प्रारुप समिति के अध्यक्ष के रुप में डा.ॅ अम्बेडकर थे जिनका काम अति-विशिष्ट था। भारत का संविधान 26 नवम्बर 1949 को सर्वसम्मति से पारित किया गया था। संविधान भारत में सर्वोच्च विधि (कानून) है जिसका मुख्य शक्ति स्रोत ‘हम भारत के लोग‘ है जिसने सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए इस संविधान को अंगीकृत तथा अधिनियमित किया है।

भारत के नागरिकों के मूल अधिकारों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता प्रमुख है जो लोकतंत्रा का आधार है तथा यही भारत के संविधान का मूल-रस भी है परन्तु 70 वर्ष आते आते इस अधिकार का दुरुपयोग बहुत हो रहा है। आज संसदीय सदनों में शोर बहुत हो रहा है तथा दोनों सदनों में असीम वाक् स्वातंत्र्त्रय है। जनता की आवाज को मुखर करने की दुहाई देकर भी सांसद सदन में जाते ही नहीं और जाते हैं तो अनर्गल बातों पर शोर शराबा करके सदन से बाहर चले जाते हैं। वे चर्चा व बहस में शामिल ही नहीं होते। वे सदन में उस समय उपस्थित रहने की भी जहमत नहीं उठाते। शुक्रवार को सांसदों के निजी विधायी कार्य के लिए तय समय में दोनों सदनों में कुल संख्या 781 सदस्यों में से मात्रा 58 सदस्य ही उपस्थित हुए थे जिससे कोरम पूरा नहीं होता। लोकसभा में 543 में से मात्रा 25 सदस्य मौजूद थे जबकि नियमानुसार 10 प्रतिशत सदस्य अर्थात 54 सांसद मौजूद होने चाहिए थे। कई संासद अपने सूचीबद्ध विधेयक को भी पेश करने तक के लिए मौजूद नहीं रहते। सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के चुने गये 303 सदस्यों में से 18-20 सदस्य मौजूद थे। प्रधानमंत्राी नरेन्द्र मोदी व कांग्रेस की श्रीमती सोनिया गांधी लगातार अपने अपने सांसदों को सदन में मौजूद रहने के लिए कहते रहते है।

प्रधानमंत्राी नरेन्द्र मोदी ने राज्य सभा के 250 वें सत्रा के दौरान कहा भी कि सदनों में राष्ट्रीय महत्त्व के विषयों पर चर्चा होनी चाहिए लेकिन उन्हें रोकने का प्रयास नहीं होना चाहिए। विरोध व अवरोध के बीच भेद होना चाहिए। दोनों में संतुलन होना चाहिए। सदन की अपनी प्रासंगिकता तथा उपयोगिता होती है। भाजपा के वरिष्ठ संासद प्रभात झा का निजी विधेयक जो स्वच्छता से जुड़ा हुआ था, की चर्चा के दौरान राज्यसभा में शुक्रवार को 238 में से मात्रा 33 सांसद मौजूद थे। इस विधेयक के द्वारा स्वच्छता को नागरिकों का बुनियादी कर्तव्य बनाने की मांग की गई है।

भारत के संविधान का उद्देश्य ‘हम भारत के लोग’ की ऋद्धि, सिद्धि और समृृद्धि है। 22 जनवरी 1947 को संविधान सभा ने संविधान का उद्देश्य संकल्प पारित किया था जिसमें कहा गया था कि यह प्राचीन भूमि विश्व शांति व मानव कल्याण के लिए पूरा सहयोग देगी। यहां प्राचीन भूमि का अर्थ प्राचीन दर्शन व संस्कृति ही है। विश्व के कल्याण के लिए भारत की तत्परता का उल्लेख बहुत महत्त्वपूर्ण समझा जाता है।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 ए में भारत के प्रत्येक नागरिक के मूल कर्तव्यों की सूची दी हुई है। भौतिक कर्तव्यों को वर्ष 1976 में सरदार स्वर्ण सिंह समिति की रिपोर्ट के आधार पर 42 वें संशोधन के मार्फत भारत के संविधान में जोड़ा गया था। कुल 11 मौलिक कर्तव्य निर्धारित किये गये हैं।

पहला कर्तव्य है- भारत के संविधान का पालन करें और उसके आदर्शो, संस्थाओं, राष्ट्र घ्वज और राष्ट्रगान का आदर करें।

दूसरा कर्तव्य है- स्वतंत्राता के लिए राष्ट्रीय अंादंोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखें और उनका पालन करें।

तीसरा कर्तव्य है- भारत की संप्रभुता, एकता व अखंडता की रक्षा करें और उसे अक्षुण्ण बनाए रखें।

चौथा कर्तव्य है- देश की रक्षा करें और बुलाए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।

पांचवा कर्तव्य है- भारत के सभी भागों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का विकास करें जो धर्म, भाषा, प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभावों से परे हो और ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रिायों के सम्मान के विरुद्ध है।

छंठा कर्तव्य है- समन्वित संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्त्व समझें और संरक्षण करें।

सातवां कर्तव्य है- वन, झील, नदी और वन्य जीव आदि प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करें। प्राणी मात्रा के प्रति दया का भाव रखें।

आठवां कर्तव्य है- वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवता, ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।

नौंवा कर्तव्य है- सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखें व हिंसा से दूर रहे।

दसवां कर्तव्य है- व्यक्तिगत व सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों के उत्कर्ष की ओर बढने का सतत् प्रयास करें ताकि राष्ट्र निरंतर प्रगति व उपलब्धि की नवीन ऊंचाइयां छू सके।

ग्यारहवां कर्तव्य है- प्रत्येक अभिभावक का कर्तव्य है कि वे अपने 6 से 14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा के लिए उपयुक्त माहौल तैयार करें।

संविधान दिवस पर यह भी मौका होता है कि हम स्वयं में यह निरीक्षण करें कि हम इन कर्तव्यों के प्रति कितने सजग है। सभी संासद संविधान की शपथ लेकर भी संविधान का आदर नहीं करते, जनता राष्ट्रगान, राष्ट्र ध्वज व राष्ट्रगीत के प्रति आदर नहीं दिखाती। वंदेमातरम् गाने पर निरन्तर विवाद बना हुआ है। भारत के विश्वविद्यालयों में भारत के टुकड़े टुकडे़ करने की धौंस दी जाती है। भारत में राजनीति से प्रेरित लोगों की भीड़ थोड़ी थोड़ी व महत्त्वहीन बातों पर अंादंोलन करके रचनात्मक कार्य न करके रेल, बस, दफ्तरों व सरकारी सम्पत्ति में तोड़-फोड़ करने व आगजनी से पीछे नहीं रहते है। पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने की कोई जागरुकता नहीं देखी जा रही है। सामाजिक संस्कृति पर भ्रम फैलाने की कोशिश की जाती है।

भारत का संविधान एक पूर्ण दस्तावेज है। डा.ॅ अम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि ‘जो लोग संविधान से असंतुष्ट हैं, उन्हें केवल दो तिहाई बहुमत प्राप्त करना है। यदि वे निर्वाचित संसद में दो तिहाई बहुमत भी प्राप्त नहीं कर सकते तो यह नहीं समझा जा सकता कि जनसाधारण असंतोष में उनके साथ है।’

कोई भी संविधान निर्जीव शब्द संचय नहीं होता है व स्वयं शक्ति सम्पन्न भी नहीं होता। डा.ॅ अम्बेडकर ने अपने 25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में कहा था कि संविधान चाहे जितना अच्छा हो, यदि उसे संचालित करने वाले लोग बुरे हैं तो वह निश्चित ही बुरा हो जाता है।

भारत के संविधान के लागू होने के 70 वर्ष में अभी तक अनुच्छेद 356 को प्रयोग करते हुए 100 से अधिक बार राज्य विधानसभाओं को भंग किया गया है। अनुच्छेद 353 के अंतर्गत 1975 में देश में आपात काल लगाया। अभी तक संविधान में उल्लेखित समान नागरिक संहिता भी देश में नहीं लगायी गयी है। देश में विधायिका ढंग से कार्य नहीं कर रही है। राजनेता जनकल्याण व सेवा की बात न करते हुए सदैव स्वार्थ सिद्धि में लगे हुए है।

प्रधानमंत्राी नरेन्द्र मोदी के द्वारा संविधान को वर्ष में एक बार याद करने के लिए संविधान दिवस मनाने की परम्परा अच्छी समझी जा रही है। इससे नागरिकों में भारत के संविधान के प्रति जहां जागरुकता बढे़गी, वहीं राष्ट्र के प्रति उनका लगाव भी बढ़ सकेगा।

संविधान में यह भी संशोधन होना चाहिए कि जिस प्रकार देश के नागरिक अपने अपने धर्म ग्रन्थों में लिखे हुए को अंगीकार करते हैं और नहीं अंगीकार करने पर उसको पाप समझते हैं उसी प्रकार संविधान में लिखे हुए को नकारना एकदम से देशद्रोह की श्रेणी में आ जाना चाहिए। इसी भय के कारण लोग संविधान को अक्षरतः स्वयं अंगीकार करने के लिए प्रेरित हो सकेंगे वरना तो देश में टुकडे़ टुकडे़ गैंग अपनी गतिविधियों को बढ़ाता ही जायेगा और देश की अखंडता खतरे में पड़ते देर नहीं लगेगी। देश के लोगों को यह भी समझना चाहिए कि वे देश को क्या दे रहे हैं। भारत को विश्व में सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए प्रत्येक नागरिक का योगदान अनिवार्य है। 

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