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October 19 2019 04:13 PM

नशा मुक्ति हेतु सतत अभियान चले

Posted at: Oct 10 , 2019 by Dilersamachar 5061

नरेंद्र देवांगन

समाज में शराब खुशियां मनाने का जरिया बनती जा रही है। गरीब से लेकर अमीर तबके के लोग खुशियों का इजहार करने के लिए शराब का सेवन करने लगे हैं। अमीर तबके में तो शराब को धड़ल्ले से गिफ्ट देने का चलन भी बढ़ता जा रहा है। गरीब तबका खुशी और गम दोनों में शराब का सेवन कर रहा है। समय-समय पर जहरीली शराब पी कर अनेक लोगों के मरने की खबरें भी आती रहती हैं। ऐसी घटनाएं कुछ दिन सुर्खियों में रहने के बाद भी सरकार और जनता पर इनका कोई असर नहीं पड़ता है। सरकार और जनता ही क्यों, मरने वालों के घर-परिवार वालों को भी कोई खास असर नहीं होता है।

पूरे देश भर में विभिन्न राज्यों द्वारा समय-समय पर नशा मुक्ति का साप्ताहिक अभियान आयोजित किया जाता है जिसके तहत ग्राम पंचायत स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाया जाता है और आमजन को शराब, गुटखा, तंबाकू, सिगरेट और अन्य नशीले पदार्थों से होने वाले नुकसानों के बारे में बताया जाता है। प्रति वर्ष, खास कर 2 अक्तूबर गांधी जयंती के अवसर पर नशा मुक्ति अभियान चलाए जाते हैं और सप्ताह बीत जाने पर इस महत्त्वपूर्ण विषय को भुला दिया जाता है। कई बार जहरीली शराब का कहर टूटता है पर हादसों के बाद भी कोई सबक नहीं लेता। शराब के खिलाफ जागरूकता से ज्यादा इसके प्रचार पर खर्च होता है। बहुत सारे नियम-कानूनों के बाद भी शराब का प्रचार बंद नहीं हो रहा है।

‘ग्लोबल इंफॉर्मेशन सिस्टम ऑन अल्कोहल एंड हेल्थ‘ और डब्ल्यूएचओ के अनुसार भारत में शराब, तंबाकू, सिगरेट जैसे मादक पदार्थों के सेवन के कारण होने वाली मौतों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आंकड़ों के मुताबिक भारत की 11 प्रतिशत आबादी नियमित रूप से शराब का सेवन करती है। कई प्रदेशों के ग्रामीण इलाकों में तकरीबन एक चौथाई आबादी शराब का सेवन करती है। वहीं शराब से होने वाली राजस्व आय नए रिकॉर्ड छू रही है। कई जगहों पर शराब को खराब मान कर बंद किया जाता है पर यह पूरी तरह से बंद भी नहीं होती है। जिन राज्यों में शराबबंदी है, वहां भी गैर कानूनी तरीके से खूब शराब बिक रही है। इसके लिए शराब पीने वालों को भट्ठियों के सहारे रहना पड़ता है। 

किसी भी देश-समाज में नशे की लत एक नासूर की तरह उसे खोखला कर देती है और इंसान को धीरे-धीरे विनाश की ओर ले जाती है। इस जहर का असर देर से सामने आता है और तब तक व्यक्ति उस नशे का इतना आदी हो चुका होता है कि फिर दुष्परिणाम दिखाई देने पर भी वो उसे छोड़ नहीं पाता। अमीर तो महंगी शराब पी कर भी अपने शौक पूरे कर लेते हैं पर गरीब लोग गैर कानूनी कच्ची शराब के सहारे रहते हैं। ऐसे में ज्यादातर लोग जहरीली शराब का शिकार हो जाते हैं। बहुत सारे हादसों के बाद भी यह रूकने का नाम नहीं ले रहा है। हर हादसे के बाद नया हादसा हो रहा है पर लोग इससे सबक लेने को तैयार नहीं होते।

गांवों में बच्चे पैदा होने से लेकर मरने तक अलग-अलग आयोजन होते हैं। इनमें बहुत से लोग बुलाए जाते हैं। बहुत सी जगह खाने की दावत के साथ शराब पीने का रिवाज भी होता है। शराब पीने वाले शराब की दावत में सामूहिक रूप से शामिल होते हैं। मेजबान भी सस्ती शराब खरीदने के चक्कर में रहता है। सस्ती शराब खरीदते समय इस बात की जरूरत महसूस की जाती है कि नशा जोरदार हो। ऐसे में मजेदार नशे वाली सस्ती शराब बनाने के लिए जिन चीजों का इस्तेमाल किया जाता है, उनकी मात्रा के बढ़ने और गलत तरह से मिलने से शराब जहरीली हो जाती है।

देशी शराब और इस तरह भट्ठियों में बनने वाली शराब की कीमत में फर्क होता है। देशी शराब की बोतल तकरीबन 200 रूपए में बिकती है जबकि भट्ठियों में बनने वाली शराब 70 रूपए से 100 रूपए के बीच मिल जाती है। ज्यादातर गरीब परिवार भट्ठियों में बनने वाली शराब का ही सेवन करते हैं। यही शराब जहरीली हो जाती है। सस्ती और नशीली शराब बेचने के लिए इसमें ऑक्सिटोसिन दवा, यूरिया और नींद की गोली तक को मिलाया जाता है। गांव-देहात में ऑक्सिटोसिन दवा का इस्तेमाल दुधारू पशुओं में दूध जल्दी उतारने के लिए किया जाता है। यूरिया और ऑक्सिटोसिन दवा मिलाने के बाद मिथाइल अल्कोहल बन जाता है जो जानलेवा होता है।

ऑक्सिटोसिन दवा एक तरह का हार्मोनल इंजेक्शन होता है जिसका इस्तेमाल होने से शरीर ढीला पड़ने लगता है और इमोशनल होने लगता है। इस तरह की चीजों से तैयार शराब के इस्तेमाल से अगर पीने वाले की जान बच भी जाए तो उसका लिवर खराब होने और आंखों की रोशनी जाने का खतरा बना रहता है। गांव में शराब पीने वालों में सभी जातियां शामिल हैं। इसके बाद भी जहरीली शराब पी कर मरने वालों को देखें तो दलित और पिछड़ी जाति के लोग इसके ज्यादा शिकार होते हैं। ईंट-भट्ठों में ज्यादातर जगहों पर शराब बनती है। यहां पर लोग शराब का इस्तेमाल खुद भी करते हैं और इसको बेचते भी हैं। इनके खरीदार भी मजदूर तबके के लोग होते हैं।

शादी-ब्याह और दूसरे मौके पर इस बिरादरी के लोग ही शराब पार्टी ज्यादा करते हैं। इनकी दावतों में देखें तो दावत और समारोह से बहुतों को कोई मतलब ही नहीं होता है। वे केवल शराब की दावत के चलते ही उसमें शामिल होते हैं। नशे की लत के चलते ये लोग शराब पिए बिना नहीं रह सकते हैं। ऐसे में जैसे ही किसी दावत में मुफ्त में शराब पीने को मिलती है, वे वहां पहुंच जाते हैं। शराब की वजह से इन परिवारों में आपसी झगड़े, कलह, अपराध और मारपीट की वारदातें भी खूब होती हैं।  

नशा मुक्ति के प्रति आमजन को बड़े स्तर पर जागरूक करने के लिए साल में किसी एक सप्ताह का इंतजार करने की बजाए पूरे वर्ष देश और प्रदेश के कोने-कोने में सरकारी और एनजीओ स्तर पर प्रयास करने होंगे। उनकी सतत मॉनिटरिंग भी जरूरी है ताकि इन प्रयासों का जमीनी स्तर पर कितना फायदा हुआ, ये देख कर आगे की दिशा तय की जाए।

नशा मुक्ति अभियान में महाविद्यालय के विद्यार्थियों की भी मदद ली जा सकती है। देश के कई भागों में विद्यार्थियों ने नुक्कड़ नाटकों व सभाओं के जरिए इस दिशा मंे अच्छा कार्य किया है।

बेहतर यही होगा कि सभी राज्य सरकारें शराबबंदी की दिशा में कदम बढ़ाएं। शराबबंदी भले ही शराब के उपभोग को पूरा खत्म न करे पर इससे निश्चित रूप से उसका उपयोग बड़े स्तर पर कम होता है। लोग शराब के सेवन के बिना जीने की कोशिश करते हैं।

नशा मुक्त समाज के लिए न सिर्फ नशे की लत से लोगों को दूर रखना जरूरी है बल्कि जो लोग इसके आदी हैं, उनका भी नशा छुड़ाना आवश्यक है। खासतौर पर गरीब वर्ग के लिए बड़ी संख्या में नशा मुक्ति केंद्रों की आवश्यता है जहां धीरे-धीरे उन्हें पुनर्वास के रास्ते पर लाया जा सके।

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            नशे के खिलाफ समाज, नेताओं और घर-परिवार के लोगों को जागरूक होना पड़ेगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हादसे दर हादसे होते रहेंगे। जरूरी है कि इन हादसों से सबक लिया जाए। सरकार को भी चाहिए कि वह शराब के कारोबार को बंद कर दे। सरकार को शराब के धंधे से जितना फायदा होता है, उससे कहीं ज्यादा लोगों की बीमारियों पर खर्च करना पड़ता है। ऐसे में शराब से कमाई की बात करना सही नहीं लगता है। शराब, गुटका और सिगरेट के विक्रय से होने वाली आय किसी भी राज्य सरकार के राजस्व का एक बड़ा स्रोत होती है। कहीं बड़े नुकसान को देखते हुए सरकारों को इसका मोह छोड़ कर राजस्व बढ़ोत्तरी के दूसरे उपाय करने होंगे और पूर्ण नशाबंदी की दिशा में ठोस कदम उठाने ही होंगे। नशा मुक्त समाज से ही खुशहाली और प्रगति के रास्ते खुलेंगे। 


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