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September 30 2020 09:28 AM

राजनीति में उलझा कोरोना

Posted at: Jul 1 , 2020 by Dilersamachar 9198

वेदप्रकाश

रामचरितमानस में गोस्वामी जी ने लिखा है- ‘जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।‘ अर्थात राक्षसी सुरसा हनुमान का रास्ता रोकने के लिए और अपनी विकरालता  दिखाने के लिए अपने शरीर का विस्तार करती है किंतु उससे बचने के लिए हनुमान उससे दोगुना विस्तार करते हैं।कोरोना वायरस भी सुरसा की तरह अपना विस्तार कर रहा है। ऐसे में शासन, प्रशासन तथा राजनीतिक नेतृत्व को  उसे रोकने के लिए हनुमान की तरह दोगुनी गति से विस्तार करना होगा। स्वास्थ्यकर्मी, पुलिसकर्मी, सफाईकर्मी, मीडियाकर्मी तथा अन्य आवश्यक सेवाओं में लगे लोग महामारी के बीच रहकर अपने जीवन की परवाह न करते हुए कर्तव्य भावना और सेवा भावना से काम कर रहे हैं। उनके इस जज्बे को नमन करते हुए प्रधानमंत्राी ने उन्हें कोरोना वारियर्स कहकर संबोधित किया और समाज ने भी उन्हें इसी रूप में सम्मानित किया।

मानवता ने अपने विकासक्रम में प्लेग, चेचक, कालरा, येलो फीवर, फ्लू तथा इबोला जैसी अनेक बीमारियाँ  देखी हैं। उपलब्ध संसाधनों से उनका सामना भी किया है। इनमें से कई ऐसी रही जिनका प्रभाव किसी देश, प्रदेश अथवा क्षेत्रा तक ही सीमित रहा। कभी लाखों तो कभी करोड़ों लोग इनके प्रभाव से काल का ग्रास बने किंतु कोरोना वायरस का विस्तार वैश्विक है। समूचे विश्व में करोड़ों लोग इस संक्रमण का शिकार हो चुके हैं और लाखों लोगों की मृत्यु हो चुकी है। भारत में भी इस महामारी ने जनवरी महीने में प्रवेश किया और देखते ही देखते आज संक्रमितों की संख्या लाखों में है और मृतकों की हजारों में।कोरोना संकट के बीच प्राकृतिक आपदाएं भी निरंतर चल रही हैं। संकट के इस दौर में जहां जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष जारी है। ऐसे में चीन, पाकिस्तान तथा नेपाल जैसे पड़ोसी देश भी अपने-अपने ढंग से सीमाओं पर तनाव और दबाव बना रहे हैं। उस मोर्चे पर सेना अपना काम कर रही है किंतु जनसामान्य का जीवन उससे भी प्रभावित होता ही है।

भारतवर्ष विश्व का बड़ा लोकतंत्रा है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में पक्ष-विपक्ष मिलकर समाज और राष्ट्र की दशा और दिशा पर विचार करते हैं। विभिन्न मुद्दों पर दोनों में लंबी बहस भी होती है। सहमति- असहमति भी बनती है किंतु अंततः निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है। कोरोना ने राजनीति को भी प्रभावित किया है। सत्तापक्ष प्रधानमंत्राी के नेतृत्व में निरंतर योजनाबद्ध ढंग से कोरोना से निबटने के लिए प्रयास कर रहा है। उन प्रयासों में स्वास्थ्य सेवाओं में ढांचागत सुधार, आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, प्रभावितों के लिए राहत पैकेज, राज्यों को खाद्यान्न, चिकित्सीय उपकरण, आर्थिक सहायता, योजना तथा प्रबंधन विषयक सभी आवश्यक चीजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना आदि शामिल हैं। प्रधानमंत्राी पद से परे जाकर प्रधान सेवक के रूप में मोदी जी दिन रात काम कर रहे हैं। उनकी चिंता ‘जान भी जहान भी‘ के रूप में है।

वे वसुधैव कुटुंबकम और ‘सर्वे भवंतु सुखिना’ की भावना से काम कर रहे हैं। उनकी कार्यशैली राजनीति से अलग राष्ट्र नीति तथा मानवता की नीति पर टिकी हुई है। वे जन जन का सहारा बनकर खड़े हुए हैं। समाज से संवाद स्थापित करते हैं, उनका मनोबल बढ़ाते हैं और लगातार आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता का प्रयास कर रहे हैं। कोरोना काल में विपक्ष के सभी दल सकारात्मकता का परिचय दे रहे हैं। इसकी गंभीरता को समझते हुए जन सामान्य का मनोबल बढ़ाने का भाव रख रहे हैं किंतु कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी जी लगातार सुर्खियों में रहने का प्रयास कर रहे हैं।

इनके द्वारा कोई बड़ा सकारात्मक प्रयास होता तो  नहीं दिखाई दिया है। ये सरकार की योजनाओं और कार्यप्रणाली पर बड़े अर्थशास्त्राी, समाजशास्त्राी, चिकित्सक, नीतिज्ञ तथा राजनीतिज्ञ की तरह बयान देते रहते हैं। आरोप लगाते हैं और आजकल विश्लेषण भी कर रहे हैं। कुछ पुरानी आदतों का शिकार व्यक्ति जिसे परिस्थिति का ज्ञान न हो, ऐसी बातें कर सकता है। इनका बयानवीर रूप नया नहीं है।राफेल सहित तमाम रक्षा सौदों में इन्हें भ्रष्टाचार दिखने लगता है। शत्राु से निबटने में सेना के पराक्रम पर इन्हें हमेशा संदेह रहता है। नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी में इन्हें सांप्रदायिकता की बू आती है।दो संप्रदायों के छोटे-मोटे झगड़े में भी ये भारतवर्ष में असहिष्णुता को बढ़ा देखते हैं।

कश्मीर से धारा 370 जैसे अनुचित प्रावधानों का हटाया जाना इन्हें कश्मीर की स्वायत्तता पर हमला लगता है आदि आदि इसलिए क्योंकि इनके संबंध में यह सूची ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता‘ जैसी ही है। कोरोना संकट अप्रत्याशित है। भारतवर्ष आज भी स्वास्थ्य सेवाओं की दृृष्टि से पीछे है।आजादी के बाद  इस क्षेत्रा में जनसंख्या के अनुपात में सुधार नहीं किए गए।आज इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।कोरोना के कारण प्रवासी श्रमिक, मजदूर,निम्न तथा मध्यम वर्ग, उद्योग धंधे  बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। सरकार के द्वारा राहत के प्रयास जारी हैं। समाज आगे बढ़कर मदद कर रहा है किंतु बयानवीर इन प्रयासों को आंकड़ों की बाजीगरी, अर्थव्यवस्था बेपटरी है, सरकार अज्ञानी है, अहंकारी है आदि कह रहे हैं। फिर ठीक क्या है? ऐसे लोग अच्छी योजना बनाकर क्यों नहीं लाते?

कोरोना के मामलों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, बंगाल और दिल्ली की स्थिति चिंताजनक है। गैर भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्राी भी बयानबाजी में पीछे नहीं हैं। उन्हें भी लगता है कि  केंद्र सरकार अपने निर्णय तथा मनमानी उन पर थोप रही है। बंगाल की मुख्यमंत्राी ममता बनर्जी तथा राज्यपाल धनखड़ के बीच लगातार आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं जिससे प्रदेश की जनता सफर कर रही है। राजधानी दिल्ली बेहाल है। मुख्यमंत्राी केजरीवाल की प्रेस कांफ्रेंस जारी है। आंकड़ों के अनुसार इलाज के लिए लगभग 97 अस्पताल, 9500 बेड,500 वेंटिलेटर उपलब्ध हैं। सब कुछ पूरी तरह से नियंत्राण में है जबकि दिल्ली में संक्रमितों की प्रतिदिन संख्या हजारों में हो चुकी है। अस्पताल में बीमारों को बिना जांच के ही लौटाया जा रहा है।

बहुत दिन पहले मुख्यमंत्राी ने 5 टी प्लान (टेस्टिंग,ट्रीटमेंट, ट्रैकिंग,टीमवर्क और ट्रेसिंग) के जरिए संक्रमण रोकने की बात कही थी। क्या एक प्लान पर भी ठीक से काम हुआ? उपराज्यपाल लगातार सभी के लिए स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने की बात कह रहे हैं लेकिन मुख्यमंत्राी अपने ढंग से ही चल रहे है। दिल्ली सरकार के अस्पतालों में सिर्फ दिल्ली वालों को इलाज का फरमान ले आते हैं जिसे उपराज्यपाल 24 घंटे के अंदर ही पलटते हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदेश गुप्ता कोरोना संक्रमितों के आंकड़े जारी करने के लिए सड़क पर उतर आते हैं। भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था में कुप्रबंधन देख रही हैं।

बढ़ते वाक्् युद्ध को देखकर केजरीवाल का बयान आता है - ‘दिल्ली में कोरोना तेजी से फैलने वाला है। सरकार और पार्टी के लोग इस पर कोई वाद-विवाद न करें। हम सब को मिलकर काम करना है। तभी कोरोना वायरस से  जीत पाएंगे नहीं तो कोरोना जीत जाएगा।‘ यह सराहनीय है किंतु इसी श्रृृंखला में वे आगे कहते हैं - ‘बेड को लेकर बहुत बड़े स्तर पर काम करना होगा। जहां जहां बेड की व्यवस्था हो सकती है, हम करेंगे। पूरी ईमानदारी के साथ तन, मन, धन से पूरी कोशिश करेंगे। कल- परसों से मैं जमीन पर उतरूंगा। स्टेडियम, बैंक्वेट हाल को इसके लिए तैयार करेंगे।‘ इस बयान में दो बातें ध्यान देने योग्य हैं - पूरी ईमानदारी के साथ और कल परसों से मैं  जमीन पर उतरूंगा। देश की राजधानी में हाहाकार मचा है। 10 जून को मुख्यमंत्राी कहते हैं- ‘कल परसों से मैें  जमीन पर उतरूंगा।‘ स्पष्ट है कि अभी तक वे आसमान से ही केवल देख रहे थे।कोरोना से त्रास्त दिल्ली की तस्वीर सुधारने के लिए गृह मंत्राी अमित शाह को उतरना पड़ा है। 15 जून को दिल्ली में सर्वदलीय बैठक में उन्होंने कहा-‘मतभेद भुलाकर कोरोना से जंग में हाथ मिलाएं।  राजनीतिक दलों के बीच एकजुटता से बढ़ेगा जनता का विश्वास। सुधरेंगे हालात।‘ इससे स्पष्ट है कोरोना काल में भी मतभेद व्याप्त है, राजनीतिक दलों के बीच एकजुटता का अभाव है।

महामारी से निबटने में भारत विकसित देशों से आगे है।  इसका कारण है-शासन द्वारा सही समय पर सुनियोजित ढंग से किए गए प्रयास। प्रशासन और समाज की भागीदारी लेकिन संकट अभी बाकी है, निर्णायक दौर में है। आवश्यकता है राजनीतिक बयानबाजी का सिलसिला बंद हो। निहित स्वार्थों से परे समाज राष्ट्र तथा मानवता के हित में सभी अपना योगदान दें। राष्ट्रीय,प्रादेशिक तथा क्षेत्राीय बयान वीर सपरिवार- निस्वार्थ भाव से पीड़ितांे की  मदद करें। दलगत राजनीति,जाति, संप्रदाय, क्षेत्रा आदि की संकीर्णता से ऊपर उठकर- हम भारतीय हैं। इस भाव से एक दूसरे का सहयोग करें। यह संकट अप्रत्याशित है।यह टीका टिप्पणी का समय नहीं है।प्रत्येक व्यक्ति हनुमान बनकर कोरोना से जंग में  दोगुना ताकत दिखाए। राजनीति छोड़कर समाजनीति, राष्ट्रनीति,मानवता नीति की ओर बढें़। राजनीति में उलझकर कोरोना विकराल हो सकता है। 

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