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ईवीएम पर बहस समय की बर्बादी? पार्ट-2, बैलेट के बाद EVM से लोगों ने राहत की सांस ली!

Posted at: Mar 23 , 2018 by Dilersamachar 5507

दिलेर समाचार, पटना: साल 2000 तक बिहार में हर चुनाव बैलेट पेपर से हुए, लेकिन हर चुनाव में जीत का मुख्य आधार सामाजिक समीकरण ही रहे. हालांकि, यह भी सच है कि उम्मीदवार अपनी जीत के लिए बैलेट पेपर को लूटने के प्रयास करते रहे. हालात ऐसे थे कि अगर पार्टी सता में होती तो प्रशासन का साथ मिलता, लेकिन विपक्ष में रहने पर गोलीबारी, चुनाव में अथाह खर्चे आदि करना एक नियमित अनिवार्य प्रक्रिया थी, जिसे नजर अंदाज करना चुनाव से पहले घुटने टेकने के समान था. इसलिए मतदान के दिन हिंसा, गोली चलना, बम विस्फोट एक आम बात थी. शायद ही कोई एक ऐसा चुनाव हो जब लोकतंत्र के नाम पर बूथ लूटने में बीस लोगों से कम जाने गयी हो. 

2002 विधानसभा उप चुनाव: 
2002 में बिहार में दो विधान सभा के उप चुनाव हुए. एक छातापुर और दूसरा दानापुर. दानापुर में राजद के लोग शुरू में बहुत उदास दिखे लेकिन शाम तक उनकी ख़ुशी देखते ही बनी. उनका कहना था बैलेट में छपाई आसान है क्योंकि अधिकारियों को मैनेज कर आप बिना किसी तनाव के और बिना किसी निशान के अपने उम्मीदवार के पर्चे में वोट डाल सकते हैं. 


2004 लोकसभा चुनाव: 
ईवीएम पर आधारित पहला चुनाव 2004 का लोक सभा का था. इस चुनाव के ठीक पहले रमनिवा अपनी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रामविलास पासवान, सोनिया गांधी के आग्रह पर लालू यादव और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे थे. केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार होने के बावजूद बिहार में लालू-पासवान गठबंधन ने नीतीश-भाजपा गठबंधन को मात दे दी. नीतीश ख़ुद बाढ़ लोक सभा सीट हार गये. इस चुनाव में छपाई का दौर ख़त्म हो चूका था. लेकिन जहां केंद्रीय ऑब्जर्वर भाजपा के लोगों की सुनते थे, वहीं लालू यादव का राज्य सरकार के अधिकारियों पर प्रभाव रहा. लेकिन जीत और हार नये गठबंधन से तय हुआ.  

2005,  फरवरी विधानसभा चुनाव: 
इस चुनाव के तुरंत बाद लालू-पासवान के संबंधो में रेल मंत्रालय को लेकर खटास आ गई और 2005 फ़रवरी के विधान सभा चुनाव में गठबंधन एक साथ नहीं लड़ी. लेकिन लालू यादव की राज्य में सरकार थी ही, केंद्र में काफी बड़ा कद हासिल था. मगर विधान सभा का परिणाम त्रिशंकु आया. इस विधान सभा चुनाव में नक्सली हिंसा को अगर अलग रखे, तो मतदान पूर्व और मतदान के दौरान हिंसा में जमकर कमी आई. मगर राबड़ी देवी की सरकार चली गयी. राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा. बाद में कोई सरकार न बन जाये इसलिए विधान सभा को बिना बैठक के भंग करा दिया गया. 

2005, अक्टूबर-नवंबर विधानसभा चुनाव: 
बिहार में एक बार फिर विधान सभा चुनाव हुए. इस चुनाव की दो विशेषता थी. अब नीतीश कुमार एनडीए के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे और चुनाव आयोग ने के जे राव को विशेष अब्ज़र्वर बनाकर भेजा और ये राज्य के चुनावी इतिहास का सबसे साफ़ सुथरा चुनाव रहा. जहां हर वक्त शिकायत को राव ने गम्भीरता से लेते हुए साबित कर दिया कि अगर चुनाव आयोग चाहे तो कोई मतदान में गरबड़ी नहीं कर सकता. इस चुनाव के पूर्व नीतीश कुमार ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कुछ वादे किये, मसलन राज्य में कानून की स्थापना, अति पिछड़ी जातियों को पंचायत चुनाव में आरक्षण आदि, जिसकी बदौलत जनता ने नीतीश के नेतृत्व वाले गठबंधन को बहुमत का आंकडा दिया. हालांकि, इस चुनाव में भी लालू-पासवान अलग-अलग ही लड़े थे. लेकिन माना जाता है कि लालू के साथ मुस्लिम यादव वोट जहां एकजुट रहा, वहीं जो वोट प्रशासन के प्रभाव से हासिल होता था, वैसा नहीं हुआ. इस तरह से ईवीएम के माध्यम से बिहार में 15 साल बाद सत्ता का परिवर्तन हुआ. 

2009 लोक सभा चुनाव: 
इस चुनाव आते-आते तक लालू ने पासवान से दोस्ती तो कर ली, लेकिन कांग्रिस पार्टी को अलग कर दिया. इस बीच सरकार में आने के बाद नीतीश कुमार ने एक नया वोट बैंक बनाया, वो था अगड़ी जातियों के साथ ग़ैर यादव पिछड़ी जातियां. जिनमें खासकर अति पिछड़ी जातियां, ग़ैर पासवान, रविदास के अलावा सभी दलित जातियों को मिलाकर महादलित वोटबैंक शामिल थे. यह काफी प्रभावी रहा और चुनाव में 40 में से 32 सीटें जीतीं. पासवान ख़ुद हाजीपुर से चुनाव हार गये. सिवान की सीट से शहाबुद्दीन को भी हार का मुंह देखना पड़ा. 

2010 विधानसभा चुनाव: 
यह चुनाव नीतीश बनाम लालू था. कांग्रेस अलग से सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही थी, लेकिन नीतीश गठबंधन को एक बार फिर उनके वोट बैंक के आधार पर प्रचंड बहुमत मिला. इस चुनाव में लालू और कांग्रेस दोनों ने चुनाव आयोग से प्रशासनिक धांधली की शिकायत की. लेकिन अब तक चुनाव पूर्व हिंसा, मतदान के दौरान हिंसा, बूथ ककैप्चरिंग ये सब पुराने जमाने की बाद हो गई. लोग वोट देने के बाद आराम से घर जाते, इसका एक बड़ा कारण सामाजिक तनाव में कमी को बताया जाता है.
 
2014 लोक सभा चुनाव: 
यह चुनाव कई मायनो में अलग था. नीतीश, भाजपा का साथ छोड़ चूके थे और लालू-कांग्रेस एक साथ, नीतीश अलग और भाजपा के साथ लोजपा और रालोसपा ने साथ चुनाव लड़ा था. इस त्रिकोणीय संघर्ष में नीतीश को मात्र दो सीटें मिलीं, लालू को चार, कांग्रेस को दो, और बाकी की सारी सीटें भाजपा गठबंधन के पाले में गई. इस चुनाव में मोदी की आंधी थी. नीतीश के परंपरागत अति- पछड़ा वोट बैंक दरक चुका था. क्योंकि बिहार में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को गुजरात के अति  पिछड़ी जाति का बेटा बताया था. बिहार के लोगों का कहना था कि इस चुनाव में वे मोदी को वोट करेंगे मगर विधानसभा में उनकी पसंद फिर से नीतीश ही होंगे. 

2014 बिहार विधानसभा उप चुनाव: 
लोक सभा चुनाव के तुरंत बाद दस सीटों पर विधानसभा उपचुनाव हुए लेकिन तब तक लालू-नीतीश हाथ मिला चूके थे और छह सीटें उन्हें मिली और बाकी के चार भाजपा के उम्मीदवार को. जहां सामाजिक समीकरण बदले,. उसका सीधा असर चुनाव परिणाम पर देखने को मिला.

2015 बिहार विधान सभा चुनाव: 
यह चुनाव नीतीश कुमार बनाम नरेंद्र मोदी था. प्रधानमंत्री मोदी ने अपने गठबंधन के प्रचार की कमान ख़ुद सम्भाली थी. उनके साथ अब जीतन राम मांझी थे. लेकिन नीतीश ने, जो जनता दल यूनाइटेड, राजद और कांग्रेस के सीएम उम्मीदवार थे, अपना काम, चेहरा और नये सामाजिक समीकरण के आधार पर भाजपा और उसके सहयोगियों को क्लीन बोल्ड किया. इस चुनाव में प्रचार पर पानी की तरह पैसा बहाया गया लेकिन मतदाता एक बार मन बना चुके थे कि इस बार राजद महागठबंधन के साथ ही जाना है. बिहार चुनाव ने साबित किया कि भाजपा को पराजित किया जा सकता है. मगर इसके बाद किसी ने बिहार में फिर से वापस बैलेट के माध्यम से चुनाव कराने की मांग नहीं की. 

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