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October 19 2019 04:04 PM

घर-घर दीवाली, हर-हर दीवाली

Posted at: Oct 10 , 2019 by Dilersamachar 5530

डा. विनोद बब्बर

भारत त्यौहार और मेलों का देश है। लोकजीवन में रचे-बसे इन त्यौहारों का अपना महत्त्व है। राजा हो या रंक, मजदूर हो सिपाही, लेखक हो या व्यापारी, उसके जीवन का हर दिन एक समान नहीं हो सकता। बसंत है तो पतझड़ भी है। सर्द हवाएं हैं तो ज्येष्ठ की लू भी अपना प्रभाव दिखाती है। जीवन की इन प्रतिकूलताओं को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता।  विवेक और साधना के अनुसार प्रतिकूलताओं का प्रभाव कम या अधिक जरूर हो सकता है।

भगवान राम को चौदह वर्ष के वनवास पर जाना पड़ा तो पांडवों को भी काफी कष्टों का सामना करना पड़ा। दुनिया का हर महापुरुष प्रतिकूलताओं की आंच में तपकर ही कुंदन बनता है। परिस्थितियों की प्रतिकूलताएं जब हमारे जीवन के समस्त रस आनंद छीन लेती है तो मानव मन निराशा के गहरे भंवर में फंस जाता है। हर माह पूर्णिमा, अमावस्या, एकादशी के आरंभ हुई त्यौहारों की अन्तहीन श्रृंखला हमारे जीवन की जड़ता को तिरोहित कर हमें नए रस-रंगों से सराबोर करती हैं।

बेशक शहरी जीवन में त्यौहार औपचारिक होते जा रहे हैं लेकिन हमारे देहात में आज भी त्यौहार के वही तेवर बरकरार हैं। हमारे जनजीवन का अभिन्न अंग बन चुके ये त्यौहार अपने साथ उत्साह और आत्मीयता की पावस सुगंध समीर लेकर आते हैं जिसके प्रभाव से समाज का कोई भी वर्ग अछूता नहीं रहता।

दीवाली भी एक ऐसा पर्व है जो हमारे लोकजीवन से हर घर तक खुशहाली का संदेश लाता है। सामाजिक समरसता का यह पर्व हर मनुष्य के परिवेश की साज-सज्जा और पुनर्वास  करता है। आशाओं के दीप जगमगाते हैं तो निराशा के काले घने बादलों को छंटने से कोई रोक नहीं सकता। अनेक विशिष्ट पर्वों की यह श्रृंखला धरती से आकाश तक, झोपड़ी से महल तक, खेत से हाट तक, कुम्हार के चाक से जुलाहे के करघे तक, तेली के कोल्हू से रूईधुनिए तक, सफेदीवाले से राजमिस्त्राी तक खील, पटाखे, मिठाई, खिलौने से आतिशबाजी तक, कुएं से नदी-तालाब तक, घर से विदेश की धरती तक, मंत्राी से संतरी तक अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराती है। माटी का नन्हा सा दीया हो या विद्युत संचालित झिलमिलाती लडि़यां- विभिन्न रूपों, आकारों में प्रकाश के इन्द्रधनुषी रंग बिखेरते हैं।

आज से नहीं, आदिकाल से ही त्यौहारों पर मन से घर तक सफाई का प्रचलन रहा है। बेशक आज महंगे रंग-पेंटों का प्रचलन बढ़ा हो लेकिन असली उद्देश्य आज भी वही है- ‘अपने परिवेश से अपने अन्तरतम तक कहीं भी कोई कीट-पतंगा, गंदगी, विकार, निराशा, अवसाद, उन्माद, आक्रोश शेष न रहे। तन-मन से घर आंगन तक, गली मोहल्ले से सम्पूर्ण परिवेश तक स्फटिक जैसी पारदर्शिता आए।’

पुरुषार्थ से प्राप्त लक्ष्मी, काम पर राम की विजय के इस पर्व पुन्ज को जीवन को मृत्यु से निर्भय देने वाली यमद्वितीया, सामाजिक शालीनता, मर्यादा और प्रेम के सात्विक स्वरूप देने वाली भैय्यादूज, ज्ञान और शिक्षा के प्रतीक कलम-दवात की पूजा के चेतना जागृत करने वाले चित्रागुप्त पूजा से विश्वकर्मा पूजा और गोवर्धन पूजा सहित अनेक रूपों व व्यवहारों में मनाया जाता है लेकिन एक बात बिलकुल स्पष्ट है कि पर्व पुंज होते हुए भी इसे प्रकाश पुन्ज के रूप में ही मान्यता है क्योंकि प्रकाश कभी कोई भेदभाव नहीं करता। जब भी होता है, सम्पूर्णता से प्रकाशित करता है। कोई चयन, कोई पक्षपात नहीं। समाज और जीवन के हर गुण-धर्म को आलोकित करते हुए ‘सर्व मंगल की कामना’ करता है।

लक्ष्मी पूजा से पूर्व यह समझना जरूरी है कि लक्ष्मी के शंख, चक्र, गदा, पद्म चार पुरुषार्थों के प्रतीक हैं। उलूक वाहन सचेत करता है कि  वैभव-समृद्धि अहंकार उत्पन्न करने वाला उलूक न हो जिसे प्रकाश दिखाई ही नहीं देता। अहंकार युक्त सामर्थ्य महिष बनाता है अतः महिष मर्दन के लिए उसी वरदा लक्ष्मी को विष्णु और शिव से तेज प्राप्त कर दुर्गा का स्वरूप धारण करना पड़ता है। धर्म नियंत्रित मर्यादित पुरुषार्थ से अर्जित लक्ष्मी के संयमित उपयोग को ही लक्ष्मी पूजन माना जाता है, भोंडे प्रदर्शन को नहीं।

गौ तो पूजनीय है क्योंकि वह प्रकृति का ऐसा उपहार है जो जीवन शक्ति संग चेतना का पथ प्रशस्त करता है। गोवर्धन पूजा उस चेतना के नवीकरण और आत्मनिरीक्षण का अवसर है। आज जब नदियां प्रदूषित की जा रही है, वनों को साफ कर रेगिस्तान को आमंत्राण दिया जा रहा है, उपयोग को भोग में बदलते सुख के आधुनिक साधनों से उत्पन्न विष प्राणवायु को प्राणांतक पीड़ा दे रहा है तब गोवर्धन पूजा प्राण और चेतना के ऊर्जा केन्द्रों को अक्षुण रखने के संकल्प का दिवस होना चाहिए।

दीपावली का शाब्दिक अर्थ ‘दीयों की पंंिक्तयां’ है लेकिन वास्तविक भाव ‘मानवता की पंक्तियां’ है। इन भावों को समझे बिना संसार तो छोडि़ए, अपने इर्द-गिर्द, अपने परिवेश से भी अज्ञानता, आक्रामकता, आत्मकेन्द्रिता, जैसे अंधकारों से मुक्ति का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। यदि हमारे हृदय में अपने ही समाज के उपेक्षित, असहायों के प्रति जिम्मेवारी का भाव नहीं है तो औपचारिक रूप से बेशक स्वयं को दीवाली मनाते हुए समझ सकते हैं पर वास्तव में हम अंधकार को बढ़ाने के दोषी है, अपराधी है क्योंकि हमारी संस्कृति का उद्घोष है-

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।

अर्थात सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

यह विशेष  स्मरणीय है कि यदि जीवन में त्यौहार न हो तो हमारा जीवन वीरान व ठूंठ होता है। जिजीविषा मर जाती है, हम असहाय हो जाते हैं। लोकजीवन में उत्सवों की परंपरा हमारे मनीषी पूर्वजों की दार्शनिकता से युक्त है जो जीवन को निरंतरता की संजीवनी देती है लेकिन चेताती भी है- ‘तुम्हारे पड़ोस का प्रकाश बेशक तुम्हें चकाचौंध करे या न करे लेकिन पड़ोस की आग तुम्हें भी भस्म कर सकती है। अपने घर, अपनी संतति, अपनी खुशियों कोे बचाने के लिए अपने परिवेश के सभी जीवों का हितचिंतन भी करना होगा वरना लाख दिये जलाकर भी आपका अंधकार दूर नहीं हो सकता।’

पर्व-पुंज के पावन अवसर पर हमारी शुभकामनाएं स्वीकारते हुए आप सभी को अपने पुरुषार्थ, विवेक से अर्जित लक्ष्मी को विदेशी उत्पादों पर न खर्च कर अपने ही बंधुओं के श्रम को उपकृत करने का संकल्प लेना होगा। यदि आपके घर आंगन में दिये जलेंगे तो आपके बंधु कुम्भकार, रूईधुनिये, तेली, व्यापारी के घर तक रोशनी पहुंचेगी। यदि विदेशी मांस आदि युक्त अपवित्रा चाकलेट को त्याग बताशे, चीनी के खिलौने, परम्परागत मिठाइयांे को अपनायेंगे तो आपका अपना देश, अपना परिवेश, अपनी जन्मभूमि भारत मजबूत समृद्ध बनेगी। विदेशी आतिशबाजी को दूर से ही सलाम कर आप न केवल प्रदूषण से निजात पा सकते हैं बल्कि निज बंधुओं के जीवन में खुशियां भर सकते है।

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यदि इस बार का पंचपर्व आपके हृदय के तारों को समाज के उपेक्षित वर्ग से जोड़ने में सफल रहा तो तूफान और दीये की लड़ाई अब बहुत लम्बी नहीं चलेगी। ‘घर-घर प्रकाश, हर-हर प्रकाश। घर-घर लक्ष्मी, हर-हर लक्ष्मी।।’ को साकार करती दीवाली बस आप सभी के संकल्प और व्यवहार की बाट जोह रही है। 


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