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July 8 2020 12:54 AM

‘प्रसिद्ध है जैन मुनियों की तपोस्थली: मुक्तागिरी’

Posted at: Mar 28 , 2020 by Dilersamachar 7186

दिलेर समाचार, चेतन चौहान। महाराष्ट्र के अमरावती जिले की परतवाड़ा तहसील से 15 किमी दूर सतपुडा की सघन हरी-भरी मनोरम पहाडि़यों के मध्य बसा हुआ है जैन मुनियों की तपोस्थली के रूप में सिद्ध क्षेत्रा मुक्तागिरी। इसका प्राचीन नाम सिद्ध व अतिश्य क्षेत्रा भी है। बाद में इसका नाम मेंधागिरी भी पड़ा प्राक्रीत निर्वाण कांड के मतानुसार मुक्तागिरी एक निर्वाण प्राप्ति स्थल के रूप में भी जाना जाता है जहां लगभग साढ़े तीन करोड़ संतों ने तपस्या कर मुक्ति प्राप्त की थी।

मुक्तागिरी में समवशरन के दसवें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ भी आ चुके है जिनके चरणों से यह क्षेत्रा एक महान पवित्रा स्थल के रूप में ख्याति अर्जित कर चुका है।

मुक्तागिरी सिद्ध क्षेत्रा अत्यन्त ही प्राचीन है व यहां पर समय-समय पर कई चमत्कारिक घटनाएँ भी घटित हुई है यहां के निकटवर्ती अचलपुर में खुदाई के दौरान पाये गये ताम्रपत्रा अभिलेखों के अनुसार यहां की पहाडि़यों में बना गुहामंदिर का निर्माण मगध के शासक शिरेनिक बिम्बसार ने करवाया था। राजा शिरनिक लगभग 2500 वर्ष पूर्व भगवान महावीर स्वामी के समकालीन थे।

राजा शिरेनिक के पश्चात् आज से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व अचलपुर के राजा ऐल श्रीपाल ने इस सिद्ध क्षेत्रा को पूरी तरह से विकसित कराया था। महाराजा ने यहां पर अनेकों मंदिरों का निर्माण करवाकर अनेको प्रतिमाएं स्थापित की। सफेद संगमरमर से बने नक्काशी द्वार मन्दिर अत्यन्त ही रमणीय है। मंदिरांे का कलात्मक स्वरूप आज भी दर्शनार्थियों को आकर्षित करता है। 

इस धार्मिक व पौराणिक स्थल का नाम मुक्तागिरी कैसे पड़ा। इसके पीछे भी एक रोचक कथा जुड़ी हुई है। ऐसा माना जाता है कि जब समवशरन के दसवें तीर्थकर भगवान शीतलनाथ यहाँ चार्तुमास हेतु आये थे तो उनके आगमन की खुशी में श्रद्धालुओं ने मोतियों की वर्षा की थी। इन मोतियों की बौछारांे के कारण इस पवित्रा स्थल का नाम मुक्तागिरी हो गया।

इस कथा से पूर्व जब यह क्षेत्रा मेंधागिरी कहलाता था। तब इसके पीछे एक रहस्यमयी घटना का भी जिक्र होता है। ऐसा माना गया है कि प्राचीनकाल में एक मुनिराज यहां पहाड़ों के बीच गिरने वाले जलप्रपात के नजदीक तपस्या में लीन थे। उस समय एक मेन्धा (भेड़ा) जलप्रपात के निकट विचरते समय फिसलकर मुनिराज के पास आ गिरा। घायलावस्था में उसे बचाने के लिए उन्हांेने नमोकार मंत्रा का पाठ किया। नमोकार मंत्रा के अनुवाचन के परिणामस्वरूप मेंधा को अमरत्व और चिरशांति की प्राप्ति हुई और वह देव बन गया। कहा जाता है कि इसी देव ने पहाडि़यों पर मोतियों की बौछार की थी। इस तरह यहां का नाम मेंधागिरी व कालान्तर में मुक्तागिरी हो गया। यहाँ आज भी अष्टमी, चतुर्दशी और पूर्णिमा के अवसर पर यहां मुक्तागिरी की पहाड़ी पर केसर की बौछार की जाती है।

मुक्तागिरी संस्थान में उपलब्ध लेख व तथ्य परक प्रमाणों के अनुसार गत दो सौ वर्षो से यहां के सुल्तानपुर के आवासी कलमकर परिवार द्वारा यहां के सम्पूर्ण मंदिर और धर्मशाला को व्यवस्थित किया गया। सन् 1923 में श्री नाथूसा पसूसा कलमकर ने श्री खपरदे जो कि मालगुजारी के स्वामित्व थे और यहां पूजा अर्चना करने वाले जैन भक्तों से अधिभार संग्रह करते थे, उनसे सतपुड़ा पहाड़ी की संपूर्ण श्रेणी व 52 दिगम्बर जैन मंदिरों को भी खरीद लिया। तत्पश्चात् महावीर मंदिर व धर्मशाला को गिरीपीठ के पवित्रा स्थान पर निर्मित करवाया। मुक्तगिरी सिद्ध क्षेत्रा होने के साथ-साथ अनेकानेक चमत्कारी घटनाओं के लिए भी जाना जाता है। यहां अनेकांे संवेदनशील भक्त समर्पण भाव से सांसारिक बीमारियों व अन्य रोगों से छुटकारा पाने के लिए 26 वें मन्दिर के मुख्य देवता भगवान पार्श्वनाथ के दर्शनों हेतु आते है। कई विदेशी भक्तगण भी यहां के चमत्कारों से अभिभूत हो चुके है।

सन् 1956 में यहाँ ट्रस्ट बनाया गया व मुक्तागिरी की सार संभाल का कार्य कलमकर परिवार द्वारा किया जा रहा है। सन् 1980 में 108 वें श्री विद्यासागर महाराज ने भी यहां चार्तुमास पूर्ण किया तबसे इस पवित्रा स्थान की ख्याति और भी बढ़ गई है।

मुक्तागिरी के मंदिरों का नैसर्गिक सौंन्दर्य व नक्काशी देखने के लिए आने वाले श्रद्धालुओं का प्रतिदिन तांता लगा रहता है। चारों ओर सघन वनों से आच्छादित इस क्षेत्रा में कई हिंसक पशुओं में बाघ, चीते, भालू व सरीसर्प प्राणी यहां घूमते पाये जाते है लेकिन किसी ने भी स्वयं को हिंसक प्रवृत्ति का साबित नही किया व न ही श्रद्धालुओं को क्षति पहुंचाई।

मुक्तागिरी राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ा होने के कारण आवागमन के लिए यहां अनेको साधन उपलब्ध होते हैं। महाराष्ट्र से मध्यप्रदेश सीमा से जुड़ा यह सिद्धक्षेत्रा यहां आने वाले पर्यटकों व श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र बन चुका है।

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