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बॉलीवुड में इनदिनों अंग्रेजों के जमाने की बनी फिल्में वीरगाथा

Posted at: Jan 6 , 2018 by Dilersamachar 9671

दिलेर समाचार, नई दिल्ली: बॉलीवुड में इनदिनों अंग्रेजों के जमाने की एक वीरगाथा पर कई फिल्में बन रही हैं. इतना ही नहीं, बल्कि इस कहानी को लेकर टीवी पर एक शो शुरू होने वाला है. शुक्रवार को अक्षय कुमार ने जहां अपनी अगली फिल्म 'केसरी' का पोस्टर जारी किया, तो वहीं टीवी पर भी जल्द आने वाला शो '21 सरफरोशः सारागढ़ी 1897' का अनाउंसमेंट हुआ. दोनों ही एक कहानी है और टीवी पर 'महादेव' के किरदार के साथ टीवी पर तहलका मचाने वाले मोहित रैना लीड एक्टर होंगे. मीडिया में खबरें यह भी है कि अजय देवगन भी इसी विषय पर एक फिल्‍म बना रहे हैं. सिर्फ अक्षय कुमार और अजय देवगन ही नहीं, बल्कि रणदीप हुड्डा भी सारागड़ी के युद्ध पर बन रही एक फिल्‍म में नजर आने वाले हैं. यानी 'केसरी' इसी विषय पर बनने वाली तीसरी फिल्‍म होगी.

'बैटल ऑफ सारागढ़ी' की कहानी है बेहद खास?
सारागढ़ी युद्ध 12 सितम्बर 1897 को ब्रिटिश भारतीय सेना और अफगानी सेना के बीच लड़ा गया था. यह युद्ध खैबर-पखतुन्खवा में हुआ था, जोकि अब पाकिस्तान में है. ब्रिटिश भारतीय सेना में सिख पलटन की चौथी बटालियन में 21 सिख थे, जिन पर 10 हजार अफगानी सैनिकों ने हमला किया था. इस बटालियन का नेतृत्व करने वाले हवलदार ईशर सिंह ने ऐसे मौके पर मरते दम तक लड़ने का फैसला लिया. इसे सैन्य इतिहास में इतिहास के सबसे महान अन्त वाले युद्धों में से एक माना जाता है. ब्रिटिश भारतीय सैनिक और अफगानी सैनिकों के बीच युद्ध के दो दिन बाद अन्य भारतीय सेना ने उस स्थान पर फिर से कब्जा जमा लिया था. सिख सैन्य कर्मियों द्वारा अब इस युद्ध की याद में 12 सितम्बर को सारागढ़ी दिवस के रूप में मनाते हैं.


ये थी शुरू से लेकर अंत तक की कहानी
सुबह 9 बजे लगभग 10 हजार अफगानी सेना सारागढ़ी पोस्ट पर पहुंचने का संकेत दिया. गुरमुख सिंह के अनुसार लोकहार्ट किले में कर्नल हौथटन को सूचना मिली की उनपर हमला हुआ है. कर्नल हौथटन के अनुसार सारागढ़ी में तुरन्त सहायता नहीं भेज सकते थे. सैनिकों ने अन्तिम सांस तक लड़ने का निर्णय लिया. भगवान सिंह सबसे पहले घायल हुये और लाल सिंह गम्भीर रूप से घायल हुये. सैनिक लाल सिंह और जिवा सिंह कथित तौर पर भगवान सिंह के शरीर को पोस्ट के अन्दर लेकर आये. दुश्मनों ने घेरे की दीवार के एक भाग को तोड़ दिया. कर्नल हौथटन ने संकेत दिया कि सारागढ़ी पर 10 हजार से 14 हजार अफगानियों ने हमला किया है.


अफगान सेना कई बार भारतीय सैनिकों को आत्मसमर्पण करने के लिए लुभाता रहा. कथित तौर पर मुख्य द्वार को खोलने के लिए दो बार प्रयास किया गया लेकिन असफल रहे. उसके बाद दीवार टूट गयी और आमने-सामने की भयंकर लड़ाई हुई. बहादुरी दिखाते हुए ईशर सिंह ने अपने सैनिकों को पीछे की तरफ हटने का आदेश दिया जिससे लड़ाई को जारी रखा जा सके. हालांकि इसमें बाकी सभी सैनिक अन्दर की तरफ चले गये लेकिन एक पश्तों के साथ एक सैनिक मारा गया.


गुरमुख सिंह, जो कर्नल हौथटन को साथ युद्ध समाचारों से अवगत करवा रहे थे, अन्तिम सिख रक्षक थे. पश्तों ने उसको मारने के लिए आग के गोलों से हमला किया. सारागढ़ी को तबाह करने के पश्चात अफगानों ने गुलिस्तां किले पर हमला करने के बाद 13-14 सितम्बर की रात को किले पर कब्जा कर लिया. इसके बाद पश्तों ने स्वीकार किया कि 21 सिखों के साथ युद्ध में उनके 180 सैनिक मारे गये और बहुत से सैनिक घायल हुये. वहीं बचाव दल को वहां 600 सैनिकों के शव मिले थे. हालांकि भारतीय सैनिकों ने इस किले पर दोबारा से कब्जा पा लिया था.

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