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October 19 2019 02:57 PM

अच्छा लक्षण है गाडि़यों की मांग में गिरावट

Posted at: Oct 10 , 2019 by Dilersamachar 5323

अशोक गुप्त

आजकल आटोमोबाइल क्षेत्रा में मंदी की बहुत चर्चा हो रही है। आंकड़े देख कर बताया जा रहा है कि हर प्रकार की गाडि़यों की बिक्री बहुत कम हो गई है। न केवल कारों की बिक्री कम हुई है बल्कि ट्रक आदि कमर्शियल वाहनों की बिक्री भी गिरी है। ऐसा जतलाया जा रहा है कि मानो यह मंदी देश की अर्थव्यवस्था को ले डूबेगी। बहुत से लोगों की नौकरियां चली जाएंगी और अर्थव्यवस्था बैठ जाएगी।

यह सही है कि गाडि़यों की बिक्री बढ़ने से अधिक नौकरियां पैदा होती हैं किंतु सड़कों पर गाडि़यों की अधिक संख्या से बहुत सी समस्याएं भी पैदा होती हैं। सबसे बड़ी समस्या तो वायु प्रदूषण की पैदा होुती है। गाडि़यों की अधिक संख्या से पेट्रोल,डीजल और सीएनजी अधिक जलते हैं और इस धुएं से वायु प्रदूषण और बढ़ जाता है। यहां तक कि इसे कम करने के लिए दिल्ली सरकार को आड-ईवन लाने की घोषणा करनी पड़ी है।

कभी-कभी कहा जाता है कि इलेक्ट्रिक कारें शीघ्र आएंगी और उनके आने से वायु प्रदूषण कम होगा किंतु अधिक बिजली पैदा करने के लिए कोयले का अधिक प्रयोग भी जरूरी है जिससे प्रदूषण बढ़ेगा। हमारी सड़कें कारों से चोक हो रही हैं। शहरों में गाडि़यां बहुत धीमी गति से चलती हैं जिससे उनसे निकलने वाली गैसों की मात्रा बढ़ जाती है और वायु प्रदूषण बढ़ता है। अधिक सड़कें बनाने से भी बहुत लाभ नहीं क्योंकि इसके लिए भी पेड़ काटने पड़ते हैं। बंगलौर को एक समय बागों का शहर कहा जाता था लेकिन यह किसी अन्य नगर जैसा ही हो गया है। शहरों में कारों की संख्या पर ब्रेक लगाने के लिए और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए पार्किग चार्ज बढ़ाने की बात की जाती है। कुछ क्षेत्रों में प्रवेश करने पर तो कुछ अतिरिक्त चार्ज देना होता है जिसे कंजेशन चार्ज कहते हैं। यह तभी हो सकता है जब इन्हें लागू करने हेतु सख्त व्यवस्था की जाए।

दिल्ली जैसे नगर में टैªफिक नियमों को बहुत कम लोग मानते रहे हैं। लालबत्ती पार करना, हेलमेट पहनना और गाड़ी चलाते हुए टेलीफोन पर बात करना आम बात रही हैं। टैªफिक पुलिस का कार्य भी ट्रैफिक को चैक करना और सही चलाना नहीं बल्कि केवल चालान करना मात्रा ही रहा है। अब यातायात मंत्राी नितिन गडकरी द्वारा नया मोटर व्हीकल कानून बनाने के पश्चात नियमों के उल्लंघन पर होने वाले जुर्माने में काफी वृद्धि हुई है जिससे सड़कों पर अपेक्षाकृत अधिक अनुशासन देखा जा सकता है किंतु अब भी जहां पकड़े जाने की संभावना कम हो, वहो लोग खुलेआम उल्लंघन करते देखे जा सकते हैं।

मेरे घर के समीप एक स्कूल है जहां बहुत से माता-पिता सुबह अपने बच्चों की मोटर साइकिल पर छोड़ने आते हैं। इनमें से अधिकांश ने हेलमेट नहीं पहना होता क्योंकि उन्हें पता है कि सुबह सड़कों पर कालोनी के अंदर विशेष चैकिंग नहीं होती। ऐसे लोगों को केवल सीसीटीवी लगा कर ही पकड़ा जा सकता है और दंडित किया जा सकता हे। सुबह के समय सड़कों पर गलत दिशा में चलने वालों की कमी नहीं होती जिससे कई बार गंभीर दुर्घटनाएं हो जाती हैं।

बहुत सी राज्य सरकारों ने नए कानून द्वारा सुझाए हुए जुर्मानों को कम कर दिया है क्योंकि इनके विरूद्ध कुछ लोगों द्वारा शोर मचाया जा रहा था। ऐसी स्थिति में टैªफिक नियमों के उल्लंघनों को कैसे काबू किया जा सकता है। वैसे भी दिल्ली जैसे महानगरों में गाडि़यों की संख्या इतनी अधिक है कि यहां कोई कानून लागू करना सरल नहीं है। पुलिस हर स्थान पर नहीं रह सकती, इसलिए हर हाल में नगरों में कारों व मोटर साइकिलों की संख्या कम होनी चाहिए और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ाना चाहिए। दिल्ली में साइकिल चलाना खतरे से खाली नहीं है। दिल्ली में मैट्रो का अच्छा नेटवर्क है और यात्रियों की संख्या भी काफी है पर इससे कारों की संख्या पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है क्योंकि अमीर लोग अभी भी अपनी कारों पर चलना ही पसंद करते हैं और मोटर साइकिल पर चलना मैट्रो से सस्ता पड़ता है।

हाइवे पर भी गाडि़यों और ट्रकों की संख्या कम होनी चाहिए। यदि ये संख्या कम होगी तो दुर्घटनाएं भी कम होगीं। रेलमार्गों के विद्युतीकरण का लाभ उठाया जाना चाहिए और सस्ती माल ढुलाई को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए ताकि ट्रकों की आवश्यकता कम हो। कुल मिलाकर गाडि़यों की संख्या कम रहना ही देश और पर्यावरण के हित में है। 

ये भी पढ़े: नशा मुक्ति हेतु सतत अभियान चले


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