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बाल कहानियां : नए साल की दावत

Posted at: Apr 13 , 2019 by Dilersamachar 10042
दिलेर समाचार, नरेन्द्र देवांगन । जब भी नया साल आता, रजक वन के जानवर दावत करते, खुशी मनाते। उनका अपना एक क्लब भी था। बानू भालू उस क्लब का प्रेसिडेंट था। वह रजक वन का सबसे सीधा-सादा जानवर था। वह कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता। सभी उसे प्यार करते थे। इसीलिए उसे क्लब का प्रेसीडेंट चुना गया था।

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उस दिन जानवरों के क्लब की मीटिंग थी। सभी जानवर बैठक में आए थे। सिर्फ काना भेडि़या नहीं आया था।

‘हमें नए साल की खुशी में दावत करनी है। यह मीटिंग इसीलिए बुलाई गई है,‘ बानू भालू ने कहा।

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उसकी बात पर जानवरों ने खुशी से तालियां बजाईं। बानू भालू ने आगे कहा, ‘भाइयो, सभी को दावत के लिए अपने-अपने घर से सामान लाना होगा। फिर हम सब मिलकर दावत का मजा लेंगे।‘

इसके बाद उसने सभी जानवरों को बता दिया कि किसको क्या लाना है। तभी नाकू बंदर ने कहा, ‘हम लोग शायद भूल गए हैं कि काना भेडि़या दावत का मजा किरकिरा करने जरूर आएगा।‘

‘याद है न, पिछली बार नए साल की दावत में वह सारी चीजें जबरदस्ती खा गया था?‘ मंगू खरगोश ने कहा।

‘हम जब भी दावत करते हैं, उसे न मालूम कैसे पता चल जाता है। अगर उसे हमारी दावत का पता न चले, तो वह वहां आएगा ही नहीं,‘ टिंकू चूहे ने कहा।

सभी जानवर सोच में पड़ गए। आखिर में बानू भालू ने कहा, ‘हम इस बार भेडि़ए को दावत का मजा किरकिरा नहीं करने देंगे। उससे बचने के लिए मैंने एक उपाय सोचा है।‘

28 दिसंबर को काना भेडि़या एक पेड़ के नीचे सो रहा था। तभी गिलहरियों की बात सुनकर उसकी आंख खुल गई। एक गिलहरी दूसरी से कह रही थी, ‘नए साल की दावत में मैं नीले रंग का सूट पहनकर जाऊंगी।‘

‘अच्छा, तो ये लोग नए वर्ष पर दावत कर रहे हैं,‘ सोचकर काना भेडि़या बहुत खुश हुआ।

दूसरी गिलहरी ने अपनी सहेली से कहा, ‘दावत ठीक 8 बजे शुरू हो जाएगी। तुम पहले से तैयार रहना।‘

‘अच्छा, दावत 8 बजे शुरू होगी। इन लोगों ने मुझे नहीं बुलाया। मैं इनको सबक सिखाऊंगा,‘ सोचता हुआ काना भेडि़या घर की ओर चल दिया।

खाने की चीजों के बारे में सोचकर उसके मुंह में पानी आ गया। उसे अपनी चालाकी पर घमंड था।

1 जनवरी की शाम को 4 बजे सभी जानवर इकट्ठे हुए। खाने की बहुत-सी चीजें थीं। हलवा, तरह-तरह की मिठार्इ्र, समोसे, फल, वगैरह। जानवरों ने दावत का खूब मजा लिया। 7 बजे दावत खत्म हो गई।

तब जानवरों ने एक बड़े से झोले में पत्थर डाले। उनके ऊपर खाने की बची-खुची चीजें रख दीं। फिर झोले को रस्सी से बांधकर एक तरफ रख दिया। इसके बाद उन्होंने कुछ सूखी टहनियां इकट्ठी कीं और आग जलाकर नाचने-गाने लगे।

8 बजने से थोड़ा पहले काना भेडि़या आया। बंधे हुए झोले को देखकर वह बहुत खुश हुआ।

‘ओह, लगता है मैं समय पर पहुंच गया। अभी तो खाने की चीजें बंधी ही पड़ी हैं। मैं तुम लोगों को अब इसे खोलने की तकलीफ नहीं करने दूंगा,‘ वह बुदबुदाया।

बड़ी मुश्किल से उसने इतना भारी झोला कंधे पर रखा। फिर होंठों पर जीभ फेरते हुए बोला, ‘वाह, क्या खुशबू है। अब घर जाकर मजे से दावत उड़ाऊंगा।‘

सबकी नजर बचाकर काना भेडि़या वहां से भाग निकला। वह घर पहुंचा। उसका कंधा दर्द करने लगा था। उसने झोला उतारकर नीचे रखा और खोलकर उलट दिया। झोले में से पत्थर लुढ़कते देख काना भेडि़या बड़ा हैरान हुआ। वह गुस्से से पागल हो गया।

‘मैं सबको देख लूंगा...... बदमाश कहीं के ....‘ चिल्लाता हुआ वह दावत वाली जगह की तरफ दौड़ा।

लेकिन जब वह वहां पहुंचा तो मैदान खाली था। सभी जानवर अपने-अपने घर जा चुके थे। काना भेडि़या मुंह लटकाए वापस आ गया। 

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