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September 24 2021 02:56 AM

Hindi Divas 2021: इसलिए हिंदी नहीं बन सकती राष्ट्रभाषा

Posted at: Sep 14 , 2021 by Dilersamachar 9523

दिलेर समाचार, आजादी के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के समर्थक महात्मा गांधी और नेहरू भी थे. इन्होंने एक या दो भाषाओं को पूरे देश की भाषा बनाने की मुहिम चला रखी थी. जबकि हिंदी विरोधी गुट इसका विरोध कर रहा था. अंग्रेजी को ही राज्य की भाषा बनाए रखने के पक्ष में था. 1949 में भारत की संवैधानिक समिति एक समझौते पर पहुंची. इसे मुंशी-आयंगर समझौता कहा जाता है. इसके बाद जिस भाषा को राजभाषा के तौर पर स्वीकृति मिली, वह हिंदी (देवनागरी लिपि में) थी.

संविधान में भारत की केवल दो ऑफिशियल भाषाओं का जिक्र था. इसमें किसी ‘राष्ट्रीय भाषा’ का जिक्र भी नहीं था. इनमें से ऑफिशियल भाषा के तौर पर अंग्रेजी का प्रयोग अगले पंद्रह सालों में कम करने का लक्ष्य था. ये 15 साल संविधान लागू होने की तारीख (26 जनवरी, 1950) से अगले 15 साल यानी 26 जनवरी, 1965 को खत्म होने वाले थे.

हिंदी समर्थक राजनेता जिसमें बालकृष्ण शर्मा और पुरुषोत्तम दास टंडन शामिल थे. उन्होंने अंग्रेजी को अपनाए जाने का विरोध किया. इस कदम को साम्राज्यवाद का अवशेष बताया. साथ ही केवल हिंदी को भारत की राष्ट्रीय भाषा बनाए जाने के लिए विरोध प्रदर्शन किए. उन्होंने इसके लिए कई प्रस्ताव रखे लेकिन कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सका क्योंकि हिंदी अभी भी दक्षिण और पूर्वी भारत के राज्यों के लिए अनजान भाषा ही थी. 1965 में जब हिंदी को सभी जगहों पर आवश्यक बना दिया गया तो तमिलनाडु में हिंसक आंदोलन हुए.

जिसके बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने तय किया कि संविधान के लागू हो जाने के 15 साल बाद भी अगर हिंदी को हर जगह लागू किए जाने पर अगर भारत के सारे राज्य राजी नहीं हैं तो हिंदी को भारत की एकमात्र ऑफिशियल भाषा नहीं बनाया जा सकता है. शायद ऐसा हो जाता तो भारत की यह एकमात्र ऑफिशियल भाषा, राष्ट्रभाषा कही जा सकती थी.

इसके बाद सरकार ने राजभाषा अधिनियम, 1963 लागू किया. इसे 1967 में संशोधित किया गया. जिसके जरिए भारत ने एक द्विभाषीय पद्धति को अपना लिया. ये दोनों भाषाएं पहले वाली ही थीं, अंग्रेजी और हिंदी.

1971 के बाद, भारत की भाषाई पॉलिसी का सारा ध्यान क्षेत्रीय भाषाओं को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ने पर रहा. जिसका मतलब था कि ये भाषाएं भी ऑफिशियल लैंग्वेज कमीशन में जगह पाएंगी और उस स्टेट की भाषा के तौर पर इस्तेमाल की जाएंगी. यह कदम बहुभाषाई जनता का भाषा को लेकर गुस्सा कम करने के लिए उठाया गया था. आजादी के वक्त इसमें 14 भाषाएं थीं, जो 2007 तक बढ़कर 22 हो गई थीं.

वर्तमान NDA सरकार ने भी इस दिशा में बहुत सी आशाएं जगाई थीं. 2014 में, सरकार ने आते ही अपने अधिकारियों और मंत्रियों को सोशल मीडिया पर सरकारी पत्रों में हिंदी का प्रयोग करने का आदेश दिया था. स्वयं प्रधानमंत्री मोदी भी अंग्रेजी में सहज होते हुए भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी हिंदी में बोलते दिख जाते हैं. हालांकि फिर भी हिंदी के राष्ट्रभाषा बनने की संभावना बहुत कम ही है.

25 जनवरी, 2010 को दिए एक फैसले में गुजरात हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था, भारत की बड़ी जनसंख्या हिंदी को राष्ट्रीय भाषा मानती है. ऐसा कोई भी नियम रिकॉर्ड में नहीं है. न ही कोई ऐसा आदेश पारित किया गया है जो हिंदी के देश की राष्ट्रीय भाषा होने की घोषणा करता हो.

अक्सर कहा जाता है कि करीब 125 करोड़ की जनसंख्या वाले भारत में 50 फीसदी से ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं. साथ ही गैर हिंदी भाषी जनसंख्या में भी करीब 20 फीसदी लोग हिंदी समझते हैं. इसलिए हिंदी भारत की आम भाषा है. लेकिन कई भाषाविदों का कहना है कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ के लोगों को हिंदी भाषियों में गिन लिया जाता है, वे लोग हिंदी भाषी नहीं हैं. और उनमें से बहुत से लोगों की भाषा जनजातीय या क्षेत्रीय है. ऐसे में इन्हें हिंदीभाषी के तौर पर गिन लेना सही नहीं है.

ये भी पढ़े: स्पूतनिक लाइट को मिली भारत में फेज-3 ट्रायल की अनुमति

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