Logo
April 7 2020 01:11 PM

कश्मीरी नेताओं की नजरबंदी कितनी जायज?

Posted at: Oct 8 , 2019 by Dilersamachar 5088

प्रभुनाथ शुक्ल

जम्मू-कश्मीर पर सरकार का निर्णय दृृढ़ है। फिलहाल उसमें कोई बदलाव होने वाला नहीं है। गुजरात में प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में यह स्थिति और साफ कर दी कि कश्मीर में धारा-370 हटाने की अभिप्रेरणा सरदार पटेल से प्रेरित है। मोदी के इस बयान से साफ होता है कि कश्मीर अब कोई मसला नहीं है। पाकिस्तान कश्मीर पर राग अलापना छोड़ दे। विपक्ष और भारत विरोधी ताकतें यह राग अलाप रही हैं कि कश्मीर में हालात फिलहाल ठीक नहीं हैं। राज्य में सेना की किलेबंदी है। लोगों में भय और डर का माहौल है। शैक्षणिक संस्थान सुचारू रुप से काम नहीं कर रहे हैं। आम कश्मीरी सड़कों पर निकलने से डर रहा है। कश्मीरी नेताओं को नजरबंद किया गया है। लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। मीडिया पर सेंसरशिप है। धारा-370 और 35-ए खत्म होने के 45 दिन बाद भी हालात वैसे हैं। इस तरह की बातें विपक्ष और कश्मीरी नेताओं की तरफ से आ रही हैं। सुप्रीमकोर्ट में अपनी रिहाई के लिए कश्मीरी नेताओं और अलगाववादियों ने कई याचिकाएं दाखिल कर रखी हैं।

सवाल उठता है कि कश्मीर के इस हालात का जिम्मेदार कौन है। कश्मीर अगर इस जवाबदेही स्थिति में पहुंचा है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है। कश्मीर के हालात क्या इस तरह के हैं कि वहां से सेना हटा ली जाय क्योंकि मोदी सरकार की तरफ से धारा-370 पर लिया गया फैसला कोई सामान्य निर्णय नहीं कहा जा सकता। सरकार भी यह अच्छी तरह जानती है कि फैसले के बाद के उभरे हालात को नियंत्रित करना अधिक मुश्किल होगा क्योंकि कश्मीर के स्थानीय नेता और अलगाववादी भारत सरकार के इस फैसले को कभी नहीं पचा सकते। वह चाहते हैं कि कश्मीर पर भारत का कोई कानून न लागू हो। यह एक स्वतंत्रा देश बने। अगर ऐसा न होता तो घाटी में आए दिन प्रदर्शन के दौरान आजादी-आजादी के नारे न लगाए जाते क्योंकि जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा खत्म होने के बाद अलगाववादी दिक्कत में हैं।

अभी तक कश्मीर को मिले विशेष राज्य की सुविधा के तहत अलगाववादियों को विशेष सुविधाएं मिलती थीं। कश्मीर की स्वायत्तता के नाम पर ही उनकी रोटी पकती थी। भारत विरोधी मुहिम में लगा पाकिस्तान और दूसरे मुल्कों से अलगाववादियों को मोटी रकम उपलब्ध करायी जाती थी। सेना के खिलाफ आम कश्मीरियों को भड़का कर आतंकी और अलगाववादी अपनी रोटी सेंकते थे। वह आम कश्मीरियों को भड़काते थे कि आम कश्मीरियों के वजूद की असली वजह धारा-370 और 35 ए है। अगर यह खत्म हो जाएगी तो हमारा वजूद खत्म हो जाएगा जिनके बहकावे में आकर कश्मीरी युवा सेना पर पत्थरबाजी करते थे। सिविल पुलिस सेना के जवानों पर मुकदमें लादती थी। हमारे सैनिक इतने मजबूर थे कि वह चाहकर भी गोलियां नहीं चला सकते थे।

कश्मीर में क्या अलगाववादी नेताओं को छोड़ने से शांति बहाली हो जाएगी। बाप-बेटे फारुख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और मुफ्ती महबूबा समेत दूसरे नेताओं की नजरबंदी से रिहाई के बाद क्या अशांति नहीं फैलेगी। क्या अलगाववादी और उनका समर्थन करने वाले कश्मीर के राजनेता सरकार के फैसलों को कबूल कर लेंगे। कश्मीर में कोई हिंसा, आगजनी और पथराव की घटनाएं नहीं होंगी। इन सब बातों की क्या कोई गांरटी दे सकता है। जेल या नजरबंदी से छूटने के बाद संबंधित नेता क्या लोगों के बीच जाकर यह पैगाम बांटेगे कि भारत सरकार ने धारा-370 खत्म कर आम कश्मीरियों के हित की बात की है। हम भारत सरकार के साथ हैं। हम एक राष्ट्र, एक विधान और एक निशान का समर्थन करते हैं।

अलगाववादियों से इस बात की कभी उम्मीद नहीं की जा सकती। अगर नहीं ंतो इतनी  जल्दी में कश्मीर में अमन-चैन की उम्मीद करना बेईमानी होगी। ऐसे लोग जिनकी भूमिका पहले से संदिग्ध हैं। उनकी मांगों पर सरकार कैसे विचार कर सकती है।  कश्मीर के हालात को सुधरने में वक्त लगेगा। इस स्थिति में कश्मीरी नेताओं और विपक्ष को सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। विपक्ष को धैर्य रखना चाहिए। सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की यह टिप्पणी सच है कि सरकार कश्मीर में लोकतांत्रिक व्यस्था को बहाल करे। लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैय्या कराए। स्कूलों में पठन-पाठन सामान्य हों। अस्पतालों में लोगों को दवा और इलाज की सुविधा मिले। गोगोई ने कश्मीर के हालात जानने के लिए खुद श्रीनगर जाने की बात भी कही है लेकिन यह समस्या चुटकी बजाते हल होने वाली नहीं है। कश्मीर के हालात सुधरने में अभी वक्त लगेगा। फिलहाल सरकार का यह दायित्व है कि वह नागरिक हितों का ख्याल रखे जिससे लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा हो।

कश्मीर को लेकर राजनीतिक दलों को स्वार्थ का नजरिया त्यागना होगा। उन्हें कश्मीर पर सकारात्मक नजरिया रखना होगा। यह मसला बेहद संवेदनशील है। गलत बयानबाजी से बचना होगा क्योंकि यह मसला सीधे राजनीतिक होते हुए भी गैर राजनीतिक है। कश्मीर भारत की अस्मिता से जुड़ा है। पाकिस्तान या दुनिया का कोई भी मुल्क इसे भारत से कभी छीन नहीं सकता। मोदी सरकार ने एक कलंक को खत्म किया है। कश्मीर को जब विशेष राज्य का दर्जा मिला था तो उस समय वहां के हालात ऐसे रहे होंगे जब कश्मीर को विशेष सुविधाएं मिली थीं लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। फिर विशेष प्रावधान का कोई मतलब नहीं रह जाता। कश्मीर राजनेता भारत के साथ कम, पाकिस्तान से अधिक हमदर्दी दिखाते हैं। अलगाववादी कैसी आजादी की हिमायत करते हैं। उन्हें कैसी आजादी चाहिए। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद को सुप्रीमकोर्ट ने बारामूला, अनंतनाग, श्रीनगर और जम्मू जाने की अनुमति दे दी है लेकिन उन्हें सभा करने की आजादी नहीं होगी। कश्मीरी नेताओं को रिहा करने के लिए सुप्रीमकोर्ट में आठ से अधिक याचिकाएं हैं जिन पर 30 सितम्बर को सुनवाई होनी हैं जिसमें फारुख अब्दुल्ला और दूसरे नेता शामिल हैं। फारुख अब्दुल्ला को पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया गया है क्योंकि अभी तक उन्हें नजरबंद रखा गया था जिस पर कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा था कि अब्दुल्ला गिरफ्तार हैं या नहीं। अगर सरकार गिरफ्तारी की बात करती तो उसे कोर्ट में मुश्किल होती। ऐसी स्थिति में उन्हें पब्लिक एक्ट में गिरफ्तार कर लिया गया है।

गृहमंत्राी अमित शाह ने कश्मीर में अशांति की बात से साफ इनकार किया है। उन्होंने कहा है कि 05 अगस्त 2019 के बाद कश्मीर में एक भी गोली नहीं चली है जबकि इसके पहले 1990 से लेकर धारा-370 खत्म होने से पूर्व 41,866 लोगों की मौत हुई है। हिंसक झड़प की 71,038 घटनाएं हुईं। इस दौरान 15,292 सुरक्षाबलों को जान गंवानी पड़ी। सरकार साफ तौर पर कह रही है कि जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों को छोड़ कर 90 फीसदी से अधिक इलाकों में शांति है। स्कूल खुले हैं। अस्पतालों में लोगों को दवाएं और दूसरी स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रहीं है। मीडिया पर अघोषित इमरजेंसी लगाने जैसे बात नहीं है। कवरेज के लिए कम्प्यूटर और लैंडलाइन की सुविधा उपलब्ध कराई गयी हैं हालांकि वहां से निकले वाले अखबार और पत्राकारों की संख्या को देखते हुए यह नाकाफी है लेकिन फिर भी सुविधाएं उपलब्ध हैं उससे इंकार नहीं किया जा सकता है। कश्मीर नेताओं की रिहाई सरकार के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है। यह वक्त राजनीति का नहीं देशहित में अडिगता के साथ खड़े रहने का है। सरकार को अपने अपने तरीके से काम करने देना चाहिए। लेकिन सरकार का यह नैतिक दायित्व है कि वह हरहाल में लोकतांत्रिक हितों का संरक्षण करे और आम लोगों की परेशानियों का पूरा ख्याल रखे। सरकार की तरफ से कश्मीर पर लिया गया फैसला देशहित में है। विपक्ष को इस बात को समझना चाहिए। जहां तक कश्मीर में शांति बहाली की बात है उस पर कुछ कहना अभी जल्दबाजी होगी। जब तक सरकार आम कश्मीरियों में विश्वास पैदा करने में सफल नहीं होती यह डगर बेहद मुश्किल है। 

ये भी पढ़े: पुतले फूंकने वालो, रावण के गुण भी देखो


Tags:

Related Articles

Popular Posts

Photo Gallery

Images for fb1
fb1

STAY CONNECTED