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अगर भगत सिंह न होते तो क्या आजाद हो पाते हम

Posted at: Mar 17 , 2018 by Dilersamachar 9847

घनश्याम बादल

दिलेर समाचार, 28 सितंबर को 1907 में पंजाब के लायलपुर गाँव में सरदार किशन सिंह के घर उनकी पत्नी विद्यावती ने जब भगत सिंह को जन्म दिया, तब उनके पिता और दोनों चाचा जेल में बंद थे पर इनके पैदा होते ही तीनों छूट गए। इस वजह से दादा अर्जुन सिंह व दादी जैकौर अपने इस पोते को प्यार से ‘भागोंवाला’ कहती  थीं। 

चाचा अजीत सिंह और करतार सिंह सराभा जैसे क्रांतिकारियों को अपना आदर्श मानने वाले व बचपन से ही क्रांतिकारियों की जीवनियाँ पढ़ने वाले भगत सिंह बालपन से ही बड़े तर्कशील थे उनके  तर्कों को काटना मुश्किल था। गरम खून के भगत सिंह को बचपन से ही  देश पर राज करते अंग्रेज  फूटी आंख नहीं सुहाते थे और वे पल पल चाहते थे कि वे भारत छोड़ जाएं। उनके अत्याचारों से भगत  तिलमिलाए रहते थे। 

1919 में जलियांवाला बाग की घटना से तो भगत सिंह क्रोध से जल उठे और घटना के अगले दिन स्कूल जाने के बहाने सीधे जलियांवाला बाग पहुंचे और खून सनी मिटटी को उस बोतल में भर लिया जिसे वो अपने साथ लाये थे। बालक भगतसिंह  उस मिटटी पर रोज फूल माला चढ़ाते थे।

नेशनल कालेज में भगत सिंह का परिचय उग्र विचारों के  सुखदेव, भगवती चरण वोहरा, यशपाल, विजयकुमार, छैलबिहारी, झंडा सिंह और जयगोपाल से हुआ।  सुखदेव और भगवतीचरण भगत सिंह के सबसे घनिष्ठ मित्रा थे। भगत सिंह और सुखदेव तो एक प्राण दो देह हो गये, तीनांे मित्रों पर समाजवाद और कम्युनिज्म व मार्क्स की पुस्तकों का गहरा प्रभाव हुआ। घरवालों के  विवाह करने को कहने पर  भगत सिंह ने कहा कि उनका विवाह तो आजादी से हो चुका है और विवाह की बेडि़याँ वो अपने पैर में नहीं पहन सकते।

आग से भरे भगत सिंह के समाजवादी विचारों से आजाद बहुत प्रभावित थे। जल्दी ही भगत सिंह आजाद के प्रिय बन गए। उस समय तक रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्ला खान के शहीद होने से आजाद अकेले पड़ गए थे किन्तु भगत सिंह ने उन्हें हिम्मत दी और  सुखदेव  व राजगुरु से मिलवाया जो कुशल निशानेबाज और बहुत साहसी थे।

लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन के समय लाला लाजपतराय पर पुलिस अधिकारी स्कॉट के सहयोगी सांडर्स ने लाठी से प्रहार किया जिससे लालाजी के सीने पर गंभीर चोटें आयीं और 17 नवम्बर 1928 को उनकी मृत्यु हो गयी। भगत सिंह,सुखदेव,आजाद और राजगुरु ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध लेने की ठानी। इसके सूत्रा धार सुखदेव बने। भगत सिंह और राजगुरु को स्काट को मारने का काम सौंपा गया और चंद्रशेखर आजाद को उन दोनों की रक्षा का। घटना वाले दिन जयगोपाल के इशारा करने पर भगत सिंह और राजगुरु ने स्काट के धोखे में सांडर्स का वध कर  दिया क्योंकि मुखबिरी करने वाले जयगोपाल से पहचानने में चूक हो गयी थी और एक अन्य सिपाही भी मारा गया मगर तीनों घटना स्थल से सुरक्षित निकल गए।

सांडर्स की हत्या ने पूरे देश में खलबली मचा दी और पुलिस भगत सिंह, चंद्रशेखर  आजाद  और राजगुरु को ढूँढने लगी। भगत सिंह ने अपनी दाढ़ी मुंडवा ली और हैट,व ओवरकोट  पहन कर दुर्गा भाभी और राजगुरु के साथ सुरक्षित निकल गए।

भगत सिंह फ्रांस के क्रांतिकारी वेलां से बहुत प्रभावित थे उन्होंने वेलां की तरह संसद में बम फोड़ कर सबको चौंका देने की सोची। आजाद को भी योजना पसंद आई पर वे भगत सिंह को इस काम पर भेजना नहीं चाहते थे किन्तु भगत सिंह सरफरोशी की तमन्ना की जिद के आगे विवश हो स्वीकृति देनी पड़ी। 

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को संसद में बम फेंकने के बाद भागने की बजाय अपने को गिरफ्तार करवाया ताकि वो मुकदमे के माध्यम से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक माहौल बना सकें। उन्होने जानबूझ कर संसद में खाली जगह पर दो बम फोड़े और जोर से -‘इन्कलाब जिंदाबाद’ और ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’,  के नारे लगाए और पर्चे फेंके जिनमें लिखा था ‘बहरों को सुनाने के लिए लिए धमाके की आवश्कयता होती है।’

उसके बाद उन्होंने स्वयं को गिरफ्तार करवाया।

 इस घटना ने वायसराय के साथ इंग्लैंड को भी हिला कर रख दिया और भगत सिंह  व उनके साथी नौजवानों की प्रेरणा बन गए और उनका दिया गया नारा ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ राष्ट्रीय नारा बन गया और देश में अंग्रेजों के खिलाफ एक माहौल बन गया। 

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर मुकदमा चला और मुकदमे में भगत सिंह ने अपना बयान दिया - हमने बम किसी की जान लेने के लिए नहीं बल्कि अंग्रेजी हुकूमत को यह चेतावनी देने के लिए फोड़ा कि भारत अब जाग रहा है, तुम हमें मार सकते हो पर हमारे विचारों को नहीं। जिस प्रकार आयरलैंड और फ्रांस स्वतंत्रा हुआ, उसी प्रकार भारत भी स्वतंत्रा हो कर रहेगा और भारत के स्वतंत्रा होने तक नौजवान बार बार अपनी जान देते रहेंगे और फांसी के तख्ते पर चिल्ला कर कहेंगे - ‘इन्कलाब जिंदाबाद’

सिंह और दत्त के बयानों ने उन्हें जननायक बना दिया पर जयगोपाल सरकारी गवाह बन गया। लाहौर षड़îंत्रा केस में जयगोपाल की गवाही बहुत खतरनाक सिद्ध हुई। भगत सिंह और उनके साथियों ने मुकदमे को बहुत लम्बा खींचा। कभी कभी भगत सिंह ऐसे बयान दे देते जिससे जज तिलमिला उठता था। अंग्रेजों ने भगत सिंह और सुखदेव को भी एक दूसरे के प्रति भड़काने का प्रयत्न किया लेकिन वे विफल रहे और अंत में अंग्रेजी हुकूमत के इशारे पर उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई पर इससे भी वे न डरे, न ही झुके। 

जज्बा देखिए, मौत सामने देखकर भी भगत सिंह और उनके साथियों ने जेल में क्रांतिकारियों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में  भूख हड़ताल की। हड़ताल तोड़ने की हर कोशिश  असफल हुई और  जनता का गुस्सा अंग्रेजों के प्रति और क्रांतिकारियों के प्रति प्रेम बढ़ता जा रहा था। भगत सिंह के समर्थन में पूरे देश में आजादी के दीवानों ने भूख  हड़ताल शुरू कर दी जिससे अंग्रेजी हुकूमत बहुत डर गयी। इस बीच  जेल में भूख हड़ताल के दौरान क्रांतिकारी जतिन दास की मृत्यु ने हालात खराब कर दिए और बगावत पैदा कर दी।  अंततः  सरकार को झुकना पड़ा और जेलों की दशा में काफी सुधार करने पड़े। 

फांसी के लिए 24 मार्च 1931 की तारीख तय हुई पर जनता के आक्रोश के डर से अंग्रेजों ने 23 मार्च को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया। मृत्यु के समय भगत सिंह तो पूरे 24 साल के भी नहीं थे। वे 28 सितंबर को 24 साल के होते। प्रशासन की संवेदनहीनता इतनी थी कि इन शहीदों के शव तक उनके घर वालों को नहीं दिए गए।

अब लाशें मिलें न मिलें पर आज भी भगत सिंह अपने साथी शहीदों के साथ देष के कण कण में बसे हैं और उनकी शहादत ने ही भगतसिंह को सरदार और शहीद ए आजम जैसे नाम दिलवा रखे हैं। भगत सिंह महज एक उग्र क्रांतिकारी ही नहीं वरन देशभक्त होने के साथ ही लेखक, शायर व समाज सुधारक थे। उनमें देशभक्ति के जज्बे के साथ ही देश के विकास के लिए एक दृष्टि व वैचारिक चिंतन भी था।

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