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प्रखर क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद

Posted at: Jul 21 , 2019 by Dilersamachar 9422

सीताराम गुप्ता

देश को अंग्रेज़ों की परतंत्राता से मुक्त करवाने में जिन लोगों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है उनमें से कुछ स्वतंत्राता सेनानियों ने अहिंसक तरीके से अंग्रेज़ों का विरोध किया तो कुछ ने इसके विपरीत विभिन्न तरीकों से अंग्रेज़ों के नाक में दम करके आज़ादी हासिल करने के प्रयास किए। उपरोक्त में से कुछ लोग पहले वाले स्वतंत्राता सेनानियों को पसंद करते हैं तो कुछ लोग दूसरी श्रेणी के स्वतंत्राता सेनानियों को।

पसंद तक तो ठीक है लेकिन जब हम उपरोक्त में से बिना सोचे-समझे किसी एक का विरोध करने लगते हैं तो वो ठीक नहीं प्रतीत होता। कारण स्वतंत्राता के संघर्ष में दोनों का ही महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। दोनों एक दूसरे के विरोधी न होकर एक दूसरे के पूरक रहे हैं। अहिंसा दुनिया का सर्वोत्तम हथियार है लेकिन जहाँ अहिंसा बिलकुल कारगर नहीं हो पाती, वहाँ दूसरे तरीकों का इस्तेमाल करना भी ज़रूरी हो जाता है।

जब कुछ देशभक्त लोगों अथवा स्वतंत्राता सेनानियों ने अनुभव किया कि अहिंसा बिलकुल कारगर नहीं हो रही है तो उन्होंने दूसरा मार्ग अपनाया जिसे क्रांति का मार्ग कहा गया। देश को स्वतंत्रा करवाने में क्रांतिकारियों का बहुत ही अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। इन क्रांतिकारियों में चंद्रशेखर आज़ाद का नाम बड़े गर्व से लिया जाता है। चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई सन् 1906 ई0 को हुआ था। उनके पिता का नाम सीताराम तिवारी तथा माता का नाम जगरानी देवी था। इस प्रकार उनका पूरा नाम चंद्रशेखर सीताराम तिवारी था। कुछ लोग कहते हैं कि चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जि़ले के बदरका नामक गाँव में हुआ था जबकि कुछ लोग उनका जन्म स्थान मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जि़ले के भाँवरा गाँव को मानते हैं।

कहा जाता है कि उनके पिता सीताराम तिवारी सन् 1899-1900 ई0 में अकाल के कारण अपना पैतृक गाँव बदरका छोड़कर अलीराजपुर रियासत में चले गए और वहीं पर नौकरी करने लगे थे। बाद में पं0 सीताराम तिवारी अलीराजपुर जि़ले के भाँवरा गाँव में जा बसे। इस प्रकार चंद्रशेखर आज़ाद का सही जन्म स्थान अलीराजपुर अथवा भाँवरा गाँव ही प्रतीत होता है। यद्यपि उन्नाव जि़ले के बदरका नामक गाँव में चंद्रशेखर आज़ाद की प्रतिमा लगी हुई है लेकिन पैतृक गाँव बदरका में प्रतिमा लगना वहीं जन्म होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

बालक चंद्रशेखर का बचपन वहीं भाँवरा गाँव में आदिवासी भील बालकों तथा प्रकृति के मध्य गुज़रा। वे उन्हीं की तरह साहसी और तीरंदाज़ी में भी माहिर हो गए। बाद में संस्कृत पढ़ने के लिए चंद्रशेखर को बनारस भेज दिया गया। चंद्रशेखर के स्वभाव अथवा चरित्रा की विशेषता यह थी कि वे न तो किसी पर ज़्ाुल्म कर सकते थे और न ही स्वयं ज़्ाुल्म सह सकते थे। वे दूसरों पर ज़्ाुल्म होते भी बरदाश्त नहीं कर सकते थे। यद्यपि उस समय चंद्रशेखर एक कम उम्र विद्यार्थी ही थे लेकिन स्वाभाविक ही है कि सन् 1919 ई0 में अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ नरसंहार से उनके मन में अंग्रेज़्ाों के खि़लाफ़ आग भड़क उठी।

सन् 1921 ई0 में गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन की शुरूआत की गई थी। तब केवल चौदह वर्ष की उम्र में चंद्रशेखर ने भी गाँधीजी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन में भाग लिया जिसके परिणामस्वरूप उन्हें गिरफ़्तार करके मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। जब मजिस्ट्रेट ने चंद्रशेखर से उनका नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम ‘आज़ाद’ और पिता का नाम ‘स्वतंत्राता’ बताया। तभी से चंद्रशेखर का नाम चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ पड़ गया और आज भी हम उन्हें इसी नाम से जानते हैं। असहयोग आंदोलन में भाग लेने के जुर्म में मजिस्ट्रेट ने चंद्रशेखर को पंद्रह दिन के कठिन कारावास की सज़ा सुनाई।

सन् 1922 ई0 में गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन स्थगित कर देने पर चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ को बहुत दुख हुआ लेकिन वह किसी भी तरह भारत को आज़ाद देखना चाहते थे। इसके लिए चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ ने क्रांति का रास्ता चुना। पहले वे रामप्रसाद बिस्मिल व अन्य क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में 9 अगस्त सन् 1925 को प्रसिद्ध काकोरी कांड के बाद चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ फरार हो गए लेकिन कई क्रांतिकारियों को अंग्रेज़ों ने फाँसी पर चढ़ा दिया। लाला लाजपतराय की हत्या का बदला लेने के लिए चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ ने अपने साथियों के साथ मिलकर साण्डर्स की हत्या की। बाद में चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू के निकट आ गए और उनके साथ मिलकर अंग्रज़ों को डराने और उन्हें भारत से खदेड़ने का हर संभव प्रयास किया।

27 फरवरी सन् 1931 में चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने घेर लिया। चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ ने अपने बचाव में पुलिस पर गोलियाँ चलाईं और जब बचने की कोई संभावना नहीं दिखाई दी तो अंतिम गोली स्वयं को मार ली क्योंकि उन्होंने प्रण किया था कि जीते जी कभी पुलिस के हाथ नहीं आएँगे। ऐसे देशभक्त और साहसी थे चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ और दूसरे क्रांतिकारी जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों तक का त्याग कर दिया। जिस अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ शहीद हुए थे आज उस पार्क को चंद्रशेखर ‘आज़ाद’ पार्क के नाम से जाना जाता है। 

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