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May 19 2024 10:11 AM

मात्र लक्ष्मी-पूजा से नहीं, सद्गुणों द्वारा ही संभव है लक्ष्मी की प्राप्ति व प्राप्त समृद्धि का सदुपयोग

Posted at: Nov 9 , 2023 by Dilersamachar 9762

दिलेर समाचार, सीताराम गुप्ता। दीपावली के दिन तथाकथित शुभ मुहूर्त में लक्ष्मी जी की पूजा करते हैं। धूप-दीप प्रज्वलित कर लक्ष्मी जी की  हिमा का गुणगान करते हुए लक्ष्मी जी की आरती की जाती है। आरती में एक स्थान पर आता है:

जिस घर में तुम रहती तहँ सद्गुण आता,
सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता।

लक्ष्मी के कई अर्थ हैं। लक्ष्मी धन-दौलत व समृद्धि की देवी का नाम है तो उसके द्वारा प्रदत्त धन-दौलत व समृद्धि को भी लक्ष्मी का ही भौतिक रूप माना जाता है। सद्गुणों से युक्त अथवा सौभाग्यशालिनी स्त्री को ही लक्ष्मी नहीं कहा जाता अपितु हर स्त्री को लक्ष्मी ही माना गया है क्योंकि उसके पुरुषार्थ से ही घर में धन-दौलत व समृद्धि आती है। लक्ष्मी अर्थात् धन-दौलत व समृद्धि से व्यक्ति व परिवार सद्गुणों से युक्त हो जाता है। इसमें भी संदेह नहीं कि धन-दौलत के कारण ही सब कुछ करना संभव होता है। धन-दौलत के अभाव में छोटे-मोटे कार्य भी संपन्न नहीं हो सकते। तभी तो कहा गया है कि दाम बनाए काम। ये धन-दौलत का ही प्रभाव है कि व्यक्ति इसके होने पर किसी भी प्रकार से घबराता नहीं अपितु उसमें आत्मविश्वास की वृद्धि होती है।
लक्ष्मी की महिमा किसी भी प्रकार से कम नहीं लेकिन प्रश्न उठता है कि घर में लक्ष्मी अथवा धन-दौलत व समृद्धि आए कैसे? क्या मात्र लक्ष्मीजी की पूजा करना ही पर्याप्त है? कहा गया है कि लक्ष्मी के आगमन से सद्गुण आते हैं। यदि लक्ष्मी का आगमन नहीं होगा तो सद्गुणों का आगमन भी नहीं होगा। काम नहीं बन पाएँगे। मन में घबराहट व निराशा घर कर जाएगी। यदि व्यक्ति या परिवार के सदस्यों में सद्गुण व आत्मविश्वास नहीं होंगे तो उस घर में लक्ष्मी ठहर भी नहीं पाएगी। तो क्या लक्ष्मी और सद्गुण एक दूसरे के पर्याय नहीं हुए? हाँ लक्ष्मी अर्थात् धन-दौलत व समृद्धि तथा सद्गुण एक दूसरे के पर्याय व पूरक हैं। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सद्गुणों से ही धन-दौलत व समृद्धि की प्राप्ति संभव है और सद्गुणों से ही इस समृद्धि को सहेजना संभव है। ये ठीक है कि लक्ष्मी के आने से व्यक्ति के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है लेकिन ये भी उतना ही सही है कि आत्मविश्वास से आशातीत सफलता व सफलता से पर्याप्त समृद्धि संभव है।
यदि हमारे घर में लक्ष्मी तो आ जाती है लेकिन लक्ष्मी के साथ जो सद्गुण आने चाहिए वे नहीं आ पाते या हम उन्हें बरकरार नहीं रख पाते तो ये लक्ष्मी कब तक हमाराॉ साथ दे पाएगी? हम येन केन प्रकारेण समृद्धि तो पा लेते हैं लेकिन सद्गुण विकसित नहीं कर पाते या दुर्गुण विकसित कर लेते हैं तो ऐसी समृद्धि का अक्षुण्ण अथवा स्थायी बने रहना असंभव होगा और साथ ही निरर्थक भी। यदि समृद्धि के आगमन के साथ ही हममें अहंकार अथवा ग़लत आदतें भी आ जाती हैं तो ऐसी समृद्धि बेमानी ही कही जाएगी। पैसों के आगमन के साथ ही यदि हममें शराब व जुए की लत लग गई अथवा अन्य दोष उत्पन्न हो गए तो ऐसे पैसों के आने से न आना ही बेहतर होता। धन की तीन गतियाँ मानी गई हैं - सदुपयोग, दुरुपयोग और विनाश। लक्ष्मी अथवा समृद्धि के दो ही उपयोग हो सकते हैं एक सदुपयोग और दूसरा दुरुपयोग। सदुपयोग या दुरुपयोग कुछ भी न हाने पर वो नष्ट हो जाएगी अतः लक्ष्मी अथवा समृद्धि का उपयोग अनिवार्य है।
जहाँ तक लक्ष्मी अथवा समृद्धि के सदुपयोग का प्रश्न है वह केवल सद्गुणों द्वारा ही संभव है। यदि व्यक्ति सद्गुणों से ओतप्रोत है तो वह न केवल प्राप्त लक्ष्मी अथवा समृद्धि का सदुपयोग कर स्वयं को सुरक्षित कर सकेगा अपितु अधिकाधिक समृद्धि का संचय व उसका सदुपयोग कर जीवन को उत्कृष्ट भी बना सकेगा। लक्ष्मी अथवा समृद्धि के सदुपयोग से व्यक्ति विशेष ही नहीं पूरा समाज और राष्ट्र लाभांवित होता है। दुर्गुणों से युक्त व्यक्ति तो प्राप्त समृद्धि को भी नष्ट कर स्वयं को भी नष्ट कर डालेगा। 
अहंकारी व्यक्ति मधुर संबंधों को नष्ट कर समाज में अपनी प्रतिष्ठा को ही कम करेगा। सद्गुणों के अभाव में समृद्धि की प्राप्ति व उसका सदुपयोग तथा उचित संग्रह संभव ही नहीं। कहने का तात्पर्य ये है कि सद्गुणों से ही लक्ष्मी को पाया जा सकता है, सद्गुणों से ही उसका सदुपयोग किया जा सकता है और सद्गुणों से ही उसे संभालकर भी रखा जा सकता है।

अब एक प्रश्न और उठता है कि यदि सद्गुणों से ही लक्ष्मी अर्थात् धन-दौलत व समृद्धि की प्राप्ति संभव है तो फिर लक्ष्मी की पूजा का औचित्य ही क्या है? वास्तव में पूजा तो एक संकल्प मात्र है जिसमें समृद्धि की कामना निहित है लेकिन समृद्धि की कामना के साथ-साथ सद्गुणों की कामना भी अनिवार्य है क्योंकि सद्गुणों द्वारा ही प्राप्त समृद्धि का सदुपयोग व समृद्धि के सदुपयोग द्वारा जीवन की उत्कृष्टता संभव है। यदि हम सात्त्विक भाव से किसी भी प्रकार की पूजा-अर्चना करते हैं तो अन्य कामनाओं के साथ-साथ सद्गुणों की कामना भी अवश्य करते हैं। यदि हम ऐसा कर पाने में असमर्थ रहते हैं तो वो पूजा-अर्चना मात्र आडंबर ही नहीं घातक भी है। नकारात्मक भाव से की गई पूजा-अर्चना हमारा अनिष्ट कर देती है अतः पूजा-अर्चना में हर प्रकार से सकारात्मक भावों अथवा सद्गुणों की कामना ही अपेक्षित व अनिवार्य है। एक बड़ी प्रचलित कहानी अथवा बोधकथा है। एक महिला ने प्रातःकाल जैसे ही
अपने घर का दरवाज़ा खोला दरवाज़े पर तीन अजनबियों को खड़े हुए पाया। तीनों के ही मुखमंडलों पर अद्वितीय आभा व्याप्त थी। महिला ने सौजन्यवश उनसे अंदर आकर जलपान ग्रहण करने की प्रार्थना की। तीनों अजनबियों में से एक ने कहा कि हम तीनों एक साथ किसी के घर नहीं जाते। हम कुछ देर ही यहाँ ठहरेंगे अतः आप अंदर जाएँ और परिवार के सदस्यों से अच्छी प्रकार से विचार-विमर्श करके किसी एक को अपने घर आमंत्रित करें। इस पर महिला ने उन्हें अपना-अपना परिचय देने को कहा। उनमें से एक ने उत्तर दिया कि मेरा नाम समृद्धि है, दूसरे ने कहा कि मेरा नाम सफलता है और तीसरे ने कहा कि मेरा नाम सद्गुण है। उन तीनों का परिचय पाकर महिला अंदर गई और घर के सदस्यों को सारी बात विस्तारपूर्वक बतलाई।
महिला की बात सुनकर उसके युवा पुत्र ने कहा कि माँ आप समृद्धि को बुला लाएँ। हम सब समृद्धि के लिए ही तो कड़ी मेहनत करते हैं। घर में समृद्धि के आने से हम कड़ी मेहनत से बच जाएँगे। इस पर महिला के पति ने कहा कि सफलता को बुला लाना ठीक होगा क्योंकि जहाँ सफलता होगी वहाँ पर समृद्धि तो अपने आप आ जाएगी। उन दोनों के विचार सुनकर महिला के वृद्ध व अनुभवी ससुर ने कहा कि मेरे विचार से तो सद्गुण को आमंत्रित करना अच्छा रहेगा। उनकी बात सुनकर घर के शेष सभी सदस्यों ने कहा कि दादाजी बिलकुल ठीक कह रहे हैं। घर में सद्गुण आ जाने से हमारे अंदर सहयोग व संवेदनशीलता बढ़ेगी जिसका हमारे घर में अभाव है। इस निष्कर्ष के
उपरांत महिला ने घर के बाहर आकर कहा कि हमारे संपूर्ण परिवार की इच्छा है कि सद्गुण हमारे घर के अंदर चले।
जब सद्गुण घर के अंदर प्रवेश करने लगा तो महिला ने देखा कि सफलता और समृद्धि भी उसके पीछे-पीछे घर के अंदर प्रवेश कर रहे हैं। महिला ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘आपने तो कहा था कि आप तीनों एक साथ नहीं जाते लेकिन जब मैंने सद्गुण को ही अंदर आने के लिए आमंत्रित किया है तो फिर आप सभी क्यों सद्गुण के पीछे-पीछे घर के अंदर प्रवेश कर रहे हैं?’’ सफलता और समृद्धि ने एक साथ जवाब दिया, ‘‘यदि आप हम दोनों में से किसी एक को आमंत्रित करतीं तो केवल वही एक आपके घर के अंदर जाता लेकिन सद्गुण कभी कहीं अकेला नहीं जाता। वह जहाँ भी जाता है हम उसके पीछे-पीछे चले आते हैं।’’ सीधी-सी बात है कि यदि घर में लक्ष्मी को बुलाना है और उसे
स्थायी रूप से घर में रखना है तो सबसे पहले व्यक्ति को स्वयं में सद्गुणों का विकास करना पड़ेगा।
किसी भी घर में धन-दौलत व सफलता तभी तक टिक पाती है जब तक उस घर के सदस्यों में सद्गुण रहते हैं। सद्गुणों से ही व्यक्ति के व्यवहार में ईमानदारी, विनम्रता, सहयोग की भावना व अन्य उपयोगी गुणों का विकास होता है जिससे वो जीवन में हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है। बात आपसी संबंधों की हो या सेवा अथवा व्यवसाय की सफलता अनिवार्य है। यही सफलता घर-परिवार में समृद्धि लाती है और यही समाज और राष्ट्र को समृद्ध करती है। नागरिकों में सद्गुणों के अभाव में कोई राष्ट्र समृद्ध नहीं हो सकता। यदि ग़लत तरीक़े से समृद्धि अर्जित कर भी ली तो सद्गुणों के अभाव में ज़्यादा देर तक टिकी नहीं रह सकती। समझदारी इसी में है कि हम धन-दौलत के पीछे भागने की बजाय अपने अंदर सद्गुणों का विकास करने पर ज़ोर दें। सद्गुणों के विकास के साथ बाक़ी सभी चीज़ें अपने आप दौड़ी चली आएँगी।

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि दिलेर समाचार इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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