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आसाराम मामले से ले सबक

Posted at: May 15 , 2018 by Dilersamachar 9523

- नरेंद्र देवांगन

दिलेर समाचार, अपने आपको संत घोषित किए रखने वाले आसाराम पर अदालत ने नाबालिग बालिका के साथ दुष्कर्म करने और उसे जबरन बंधक बनाए रखने के मामले में कानून की विभिन्न धाराओं के तहत जुर्म साबित माना है और उसे कठोरतम उम्र कैद की सजा सुनाई है। देशभर से महिलाओं और बालिकाओं पर दुराचार संबंधी बढ़ती खबरों के बीच ऐसे ही मामले में आसाराम को अदालत से उम्रकैद की सजा मिलने से कानून और न्याय व्यवस्था में भरोसा और मजबूत होगा।

भारत में संतों की प्राचीन व गौरवशाली परंपरा रही है। संत उन्हें माना जाता है जिन्हें सत्य का ज्ञान हो गया हो लेकिन आज ढोंगी बाबाओं का जमाना है। ऐसे बाबाओं के पीछे भक्तों की भीड़ वे शक्तियां इकट्ठा करती हैं जो आस्था और धर्म का व्यवसाय करके फलती-फूलती हैं।

इस प्रकरण में सराहना उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की उस नाबालिग के परिवार की भी करनी होगी जिसने सारी धमकियों के बीच अपनी लड़ाई जारी रखी। आसाराम के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने वाली बालिका और उसके परिजन जबरदस्त दबावों के बावजूद अटल खड़े रहे, इसीलिए इस ढोंगी संत पर अपराध साबित हो सका। प्रशंसा तो जोधपुर पुलिस की भी की जानी चाहिए। कई बाधाएं आईं। तीन-तीन गवाहों की हत्या हो गई किंतु पुलिस व अभियोजन ने मूल साक्ष्य मिटने न दिए। पुलिस के कर्तव्य विमुख होने के कारनामों से भरा पड़ा भारतीय इतिहास, आसाराम प्रकरण में जोधपुर पुलिस की अच्छी भूमिका को याद रखेगा।

अदालत का फैसला दर्शाता है कि अध्यात्म को मनोरंजन का व्यवसाय बनाने वाले बाबाओं के भक्तों की भीड़ के उन्माद का उस पर कोई असर नहीं होता। यह फैसला साबित करता है कि अदालतों में न्याय होता है भले ही बहुतों को लगे कि वह देर से होता है। आसाराम जैसे लोग भारतीय संत परंपरा और लोगों में उनके प्रति आस्था का फायदा उठाते हैं। वे अपने सफेद चोले के नीचे अपने आपराधिक कृत्यों को ही नहीं छुपाते बल्कि अपनी पैशाचिक वृत्तियों का पोषण भी करते हैं।

सर्वोच्च प्रशंसा की जानी चाहिए न्यायालय की। जज मधुसूदन शर्मा ने इस न्याय से समूचे दुष्कर्म विरोधी माहौल को कानूनी मजबूती प्रदान की है जो इसलिए आवश्यक है, चूंकि लोगों की आशाओं का अंतिम केंद्र कोर्ट ही है। न्याय का मार्ग दुरूह, लंबा और संताप भरा होता है। बस, चलने वाला चाहिए। यौन दुराचार के मामले में सजा सुनाते हुए विशेष जज मधुसूदन शर्मा का यह कहना सारगर्भित है कि आसाराम ने न सिर्फ पीडि़ता का भरोसा तोड़ा बल्कि देश-दुनिया में संतों की छवि भी खराब की है।

आसाराम उन बड़े बाबाओं में से है जो हाल के दिनों में कड़ी कानूनी व न्यायिक कार्रवाई के भागी बने हैं। इसके बावजूद ऐसा लगता नहीं कि देश में ऐसे बाबाओं के प्रति जनसाधारण का जुनून कुछ कम हुआ हो। दरअसल, इसकी जड़ें कहीं और हैं। हमारे देश में भोली बालिकाएं एवं स्त्रिायां धार्मिक प्रवृत्ति की अधिक होती हैं और ऐसे बहुरूपियों के चंगुल में आसानी से फंस जाती हैं। वे अपने शोषण के बारे में लोकलाज के कारण किसी को आपबीती नहीं सुनाती।

भारत के आर्थिक विकास की कितनी ही बात की जाए पर लगता नहीं कि यह आर्थिक तरक्की आमजन को सामाजिक न्याय व समानता देने में सफल रही है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि शासन के अधिकृत संस्थान अपनी जिम्मेदारियां निभाने में नाकाम रहे हैं। इसके कारण एक तरफ ऐसे बाबाओं को कानून से ऊपर अपनी सत्ता चलाने का मौका मिलता है तो दूसरी तरफ न्याय व राहत की तलाश में जनसाधारण इनकी ओर आकर्षित होते हैं। जितना देश समृद्ध होता जा रहा है उसी अनुपात में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है।

आसाराम प्रकरण में आया फैसला अभूतपूर्व है। स्पष्ट है। प्रेरक है। न्यायोचित है। यह उस समय आया है, जब समूचा राष्ट्र बच्चियों और महिलाओं की गरिमा पर हो रहे पाशविक हमलों से आहत और उद्वेलित है। असुरक्षा और अविश्वास का वातावरण बन गया है। आसाराम जैसे प्रभावशाली, शक्तिशाली और वैभवशाली दुष्कर्म आरोपी का कानून की बेडि़यों में जकड़ा जाना ही अविश्वसनीय था। अंधश्रद्धा विराट होती है। किसी सच और तर्क को नहीं मानती। और आस्था से ऊपर कानून रखने की हिम्मत जुटाना मुश्किल काम है।

दुर्भाग्य से हम एक ऐसे समय में हैं, जब भक्तिमार्ग का इस्तेमाल लोगों की आस्था से खिलवाड़ करने के लिए किया जा रहा है। राजनीतिक दल भी बहती गंगा में हाथ धोने से बाज नहीं आ रहे। राजनीति को धर्म से अलग रखने की सैद्धांतिक सहमति ताक पर रखकर राजनेता ऐसे कलंक-पुरूषों के समक्ष नतमस्तक होने से गुरेज नहीं करते। इससे दोनों की ताकत बढ़ती है। यह कहना ज्यादा उचित होगा कि दोनों मिलकर आंखों में धूल झोंकते हैं।

कार्ल मार्क्स का यह कहना सही है कि धर्म आम लोगों के लिए अफीम है। आज के समय में उसे अपनी सारी समस्याओं का समाधान इसी में नजर आता है। सामाजिक विषमता के अलावा यह प्रवृत्ति शिक्षा की कमजोर गुणवत्ता की ओर भी इशारा करती है वरना आमजन के साथ उच्च शिक्षित और समृद्ध तबका भी ऐसे बाबाओं के पीछे क्यों भागता। हमारी शिक्षा व्यवस्था समाज में अंधविश्वास व कुरीतियों के खिलाफ एक वैज्ञानिक सोच का वातावरण बनाने में नाकाम रही है।

न्यायालय ने जर्जर बूढ़ी हो चुकी उस रहम की अपील को खारिज कर बहुत अच्छा किया जिसमें आसाराम की वृद्धावस्था का भावुक उल्लेख किया गया था। राम रहीम भी ऐसे ही अपने सामाजिक कार्यों के कवच को दया का भिक्षा पात्रा बनाकर न्यायालय में लाया था। आशा है, कम उम्र के दुष्कर्मियों की इससे रूह कांप उठेगी। अब राष्ट्र का न्याय में नए सिरे से विश्वास जगा है। इसे बनाए रखने की चुनौती है। प्रश्न केवल इतना है कि कहीं यह केवल आसाराम तक सीमित न रह जाए। हजारों दुष्कर्मी चारों ओर स्वच्छंद फैले हैं।

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