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February 23 2020 10:28 PM

वादी से रिसता प्रेम का कहवा..

Posted at: Dec 24 , 2017 by Dilersamachar 5389

दिलेर समाचार, डा. अर्पण जैन ‘अविचल’: जब भी प्रेम के गीतों का बखान होगा, जाफरान की तासीर का तरन्नुम बनेगा, कश्यप की धरती का गुणगान होगा, शंकराचार्य की जुबानी कही जाएगी,लालचौक से क्रांतिसूत्रा माँगा जायेगा, डल झील से टपकते पानी की बात होगी, शिकारों और तैरनेवाले घर (हाउस बोट) की सर्द रातों को याद किया जायेगा, चश्मे शाही में पत्थरों से रिसते पानी की चाह होगी, मुगल गार्डन को जेहन में उतारा जायेगा, विश्वविद्यालय से शिक्षा की अजान होगी, फूलों के महकने को जब जीवन में उतरता देखा जायेगा, तब बेशक वादी की बर्फ से लेकर कहवे की महक का जायका लेकर कश्मीर की क्यारियों को ही याद किया जायेगा ।

हाँ, मैं अब तक उसी कहवे के स्वाद में खोया हूँ जिसने अनजान से शहर श्रीनगर में नए रिश्तों को बना कर मुझे तन्हा नहीं होने दिय। और हाँ, सबसे खास बात कभी न भूल पाने वाले पलों में एक वादी का वो प्यार भी हैं जो मुझे हमेशा कश्मीर की तरफ खींचने के लिए काफी हैं ।

बहुत कुछ सुना था, इंदौर से दिल्ली तक की यात्रा में कश्मीर के बारे में। पेशे से पत्राकार होने के कारण बहुत कुछ लिखा हुआ ही पढ़ पाया था घाटी के सौन्दर्य के बारे में और हालातों का वही रोजमर्रा वाला हालचाल जो सियासत दुनिया को दिखाना चाहती है पर दिल्ली से श्रीनगर की महज 1 घंटा 25 मिनट की उड़ान के बाद जो आँखों से कश्मीर को देखा और जाना वो कहीं अलग था। कमोबेश मैं विश्वास ही नहीं कर पा रहा था कि क्या मैं वाकई कश्मीर में ही उतरा हूँ या फिर कहीं और ... क्योंकि कश्मीर के बारे में जो सुना या पढ़ा वो सब कोरी हवा हवाई ही थी क्योंकि वादी के निश्चल प्रेम और मिठास के साथ अपनेपन के भाव को कोई शायद नहीं लिख पाया हो।

बहरहाल वादी में सिमटी हुई जाफरान की खुशबू अभी भी हिंदुस्तान के दिल तक नहीं पहुँच पाई! इसका मलाल हैं मुझे और उन तमाम बुद्धिजीवियों से अपेक्षाएं भी हैं कि कम से कम वादी को लगी सियासी नजर का टोटका भी करवा दो ताकि गुलजार हो जायें केशर की क्यारियां ।

श्रीनगर का टीआरसी ( टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर ) जहाँ जम्मू जाने वाली टैक्सियों का अम्बार-सा लगा हुआ रहता हैं फिर चाहे समय रात के बारह क्यों ना हो, वहीं हमारा रुकना हुआ जहाँ से बमुश्किल 200 कदम पर डल गेट है। हम में शामिल हैं मेरा मातृभाषा परिवार जिनमें मेरे साथी अजय जैन ‘विकल्प’ जी और डा. प्रीति सुराना जी। हाँ, मैं से हम हो जाना ही जिंदगी का असली मजा हैं । वादी की वो ठण्डी शाम जो सूरज को विदा करके चांदनी के घर में हमें खींच लाती हैं जहाँ सर्दी से बचने के लिए एक इलेक्ट्रिक कम्बल बिस्तर पर हमारा इंतजार कर रहा होता है और कमरे में लगा रूम हीटर हमें मुंह चिड़ा रहा होता हैं। इन्हीं सब के बीच तापमान का अचानक 11 से - 10 डिग्री हो जाना भी बहुत याद आता हैं ।

खैर, शाम हुई हमें शाकाहारी भोजन को ढूंढने की जहमत नहीं उठानी पड़ी क्योंकि मेजबान कम दिल अजीज जिनसे पहली मुलाकात करने के बाद से ही अपनापन लगने लगा, हाँ नसरीन अली जी ने हमें पहले ही सारे ठिकानों की जानकारी दे दी थी जहाँ शाकाहारी भोजन मिलता है। डल गेट जाने के लिए हमने टैक्सी वाले को रोका और इन्दौरी आदतन हमने भाड़े को लेकर थोड़ा-सा मोल-भाव करना चाहा किन्तु उस बुजुर्ग टैक्सी ड्राइवर दद्दू की एक बात दिल के इतने गहरे उतर गई कि उसके बाद हम निशब्द ही हो गए । हाँ उन्होंने कहा कि ‘आप तो मेहमान हैं और मैं आपसे वही दाम लूँगा जो आप दिल से देना चाहेंगे क्योंकि मेहमान का दिल तोड़ने की कश्मीरी रवायत नहीं ....। 

 इन्हीं सब जद्दो जहद के बाद रात का तीसरा प्रहर आ जाना जहाँ निंदिया रानी का दुबक कर कहना कि सो जाओ वरना सुबह टैगोर हाल में होने वाले आयोजन के लिए समय से नहीं पहुँच पाओंगे । दिमाग अभी भी वहीं कसरत कर रहा था कि आखिर विमान तल से टीआरसी तक पहुंचने वाले पूरे रास्तें को हिन्दुस्तानी फौज ने क्यों घेरे रखा है ? क्या वाकई कश्मीर को जरुरत हैं इन फौजी लामबंदी की ?

कश्मीर पर सियासत की इतनी गहरी सोच है कि जिसे बर्फ के मानिंद पिगलने की उम्मीद भी करना स्वयं को निश्चल पागलपन में डूबना होगा ।

खैर सर्द रात ने ख्यालों का कम्बल ओड़ा कर नींद को आगोश में ले ही लिया और फिर हम सीधे १10 बजे सो कर उठे जबकि 11 बजे हमें टैगोर हाल पहुंचना था जहाँ हमारी हिन्दी माँ अपनी बहन उर्दू के घर हमारा इंतजार कर रही थी । बहन के बच्चों का सम्मान जो होना था । हम थोड़ा विलम्ब से पहुंचे लगभग आधा घंटा।

और इसी बीच मेरे अजीज मित्रा या कहूँ भाई जिनसे मैं खुद भी पहली दफा मिला बस सोशल मीडिया के सहारे ही तीन सालों से सम्बन्ध और संवाद बना हुआ था, शाह एजाज भाई आ गए .। भाई ने कहा कि आप हमारी एक्टिवा पर चलिए। हम आपको कश्मीर दिखाते हैं । मैं तो चल दिया एक्टिवा पर और मेरे साथी सब टैक्सी से पहुंचे टैगोर हाल।

टैगोर हाल में तमाम कश्मीरी फरिश्तों के बीच ही बैठी थी हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. जोहरा अफजल जी और ख्यात लेखक निदा नवाज जी भी। घाटी में हिन्दी के विकास व विस्तार के लिए कार्यरत संस्था ’वादीज हिंदी शिक्षा समिति’ ने ’मातृभाषा उन्नयन संस्थान’ (पंजी.) इंदौर व ’आकाशवाणी केंद्र श्रीनगर’ के साथ मिलकर बुधवार को टैगोर हाल में हिंदी भाषा सारथियों के सम्मान एवं हस्ताक्षर बदलो अभियान की शुरुआत की थी। बच्चों ने कश्मीरी गीतों पर थिरकते अरमानों के साथ हमारा भी स्वागत किया जिससे कश्मीर की महक आ रही थी । हाँ वही ‘बुमरो दृबुमरो’ ।

सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ यह आयोजन प्रारंभ हुआ जिसमें मुख्य अतिथि कश्मीर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्षा प्रो. जोहरा अफजल,रेडियो कश्मीर श्रीनगर के कार्यक्रम प्रमुख सईद हूमायूँ कौसर (स्वागताध्यक्ष) एवं डा. निदा नवाज (राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हिन्दी साहित्यकार) विशिष्ट अतिथि रहे। भारतीय जीवन बीमा निगम,जम्मू और काश्मीर बैंक एवं जम्मू कश्मीर पर्यटन विभाग ने इस कार्यक्रम की प्रस्तुति में सहयोग किया। शुरुआत में वादीज हिंदी शिक्षा समिति के निदेशक डा. अब्दुल अहद बंदरुं ने सभी अतिथियों का स्वागत-सम्मान किया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बच्चों व आवाम में हिंदी में हस्ताक्षर करने की भावना को जागृत करना, साथ ही साथ उन लेखकों, कवियों एवं विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों के मनोबल को बढ़ाना था जो हिंदी भाषा से जुड़े हैं और हिंदी साहित्य को लेकर अपने उज्ज्वल भविष्य के सपने देख रहे हैं।

इस मौके पर मातृभाषा संस्थान से मैने हिन्दी की उपयोगिता और उसके कारण ही संस्कृति संरक्षण के महत्त्व को बताया। साथ ही हिंदी में हस्ताक्षर क्यों हो,इसकी उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला। संस्थान के महासचिव अजय जैन ’विकल्प’ ने मातृभाषा काम की शुरुआत से अब तक के प्रकल्प पर विस्तार से चर्चा की। साथ ही संस्थान की उपाध्यक्ष डा. प्रीति सुराना ने विद्यालय स्तर से ही बच्चों को हिन्दी से जोड़ने और प्रेरणा को समझाया। कार्यक्रम में स्थानीय मीडिया सहित कई विद्यालयों के छात्रा-छात्राएं, लेखक, शायर आदि शामिल हुए। शानदार संचालन की जिम्मेदारी अशफाक लोन ने निभाई।

कार्यक्रम में वादीज हिंदी शिक्षा समिति की अध्यक्षा नसरीन अली ने सबका आभार माना और हम सब पहुँच गए ‘कहवा’ पीने, वही कहवा जो अब तक कश्मीरी प्रेम के रूप में हमारे जेहन में जिन्दा हैं । प्रेम से कश्मीर का ताल्लुक तो बहुत ही गहरा है, इस बात को हमने भी मान लिया क्योंकि कश्मीरी संस्कृति जो मिठास बाँट रही थी, उससे तो कभी नहीं लगता कि यहाँ भी रक्तरंजित होली खेली गई हैं ?

खैर इसके बाद हम चले डल होते हुए चश्मेशाही जहाँ चिनार के पत्तों के अभूतपूर्व सौन्दर्य के बीच में पत्थरों से रिसता मीठा पानी भी आता है जिसके बारे में कश्मीर कहता हैं कि यह पानी नेहरु जी और इंदिरा जी को रोज पीना होता था जिसके लिए वे अपने निजी विमान से यहाँ का पानी पीने के लिए मंगवाते थे । इसके बाद हम पहुंचे मुगल गार्डन जहाँ वादी के सौन्दर्य की झलक डल में बनी देवदार की परछाई की तरह खुद को डूबने पर मजबूर कर रही थी । शाम ढलने लगी और हम वापस अपने ठिकाने की तरफ लौटने लगे जैसे पक्षी दिनभर की मशक्कत के बाद शाम होते ही घरोंदों की तरफ लौट आते हैं।

दिन का ढलना, मतलब कश्मीर में तापमान का गिरना ही होता हैं । यहाँ बस तापमान गिरता हैं ईमां नहीं । इस बात को हमने महसूस किया फिर वही शाम को खरीदारी करने डल गेट पहुँचने पर ....

सर्द रात और दिन की थकान अपना काम बखूबी कर रही थी जिसने हमें दुबक कर कम्बल में घुसने को मजबूर कर दिया और नींद ने आगोश में लेने भी बड़ी फुर्ती दिखाई। जैसे-जैसे रात बढ़ने लगी, मौसम और सर्द होता जा रहा था। हम तो सो गए क्योंकि सुबह फिर से नए सूरज के पास जाना था और रेडियो कश्मीर भी। सुबह की थोड़ी-सी धूप ने जल्दी उठा दिया और हम तैयार हो कर निकल पड़े डलगेट की तरफ... क्योंकि हम रात में जाफरान और अखरोट खरीदना भूल गए थे। हम कहवा भी खरीद लाये पर वो मिठास नहीं जो केवल कश्मीर में थी....।

फौज की चेकिंग के बाद नसरीन जी के साथ आकाशवाणी के दफ्तर पहुंचे जहाँ हम हिंदी पूतों का साक्षात्कार होना था, हुआ भी... और फिर हम तैयार हुए अपने मकाम की तरफ लौटने को। इन्हीं के बीच हमारे मेजबान की आँखों में थमी हुई बरसात का बूंदों के रूप में झलकना देख कर रुक-से गए। खैर जो आया है वो जायेगा, यह नियति ने तय कर दिया है पर विरह की वेदना से उर भर तो जाता हैं । झलकती आँखों की नमी इस बात की गवाह दे रही थी कि हम जरुर अपने वतन की खुश्बू को समेट कर ले जा रहे हैं।

इन्हीं सब के बाद पुनः विमानतल की और लौटना जहाँ से अगली यात्रा दिल्ली की थी। इसी के बीच फिर फौज का वो खौफ जो कश्मीर के चेहरे पर साफतौर पर देखा जा सकता था झलकने लगा। कश्मीर को आदत-सी हो गई है सियासती दर्द की पर एक बात से फिर इंकार नहीं किया जा सकता कि कश्मीरी वैसे भी नहीं हैं जो हमें रोज पढ़ाए जाते हैं। कश्मीर के कुछ लोगों के कारण अवाम को क्यों सजा? खैर इन सब के बीच हमारे विमान ने भी दिल्ली के लिए उड़ान भर ली और हम समेट लाये वादी से रिसता प्रेम का कहवा पर यकीनन यह कहवा नसरीन जी द्वारा बनवाए गए कहवे जैसा तो नहीं है।

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