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September 30 2020 09:19 AM

लोकमान्य तिलक की अनसुनी कहानी....

Posted at: Jul 11 , 2018 by Dilersamachar 9346

दिलेर समाचार, कृष्णेन्दु कुमार दुबे, तिलक स्वभाव से अध्यापन को पसन्द करते थे। वे सफल राजनीतिज्ञ और पत्राकार थे किन्तु अध्यापन के काम में उनकी विशेष रूचि थी। यह एक असामान्य बात थी कि साहित्य और गणित में इनकी रूचि समान थी। अपने छात्रा जीवन में तिलक संस्कृत और गणित की योग्यता के लिए प्रसिद्ध थे। वे कठिन से कठिन प्रश्नों को हल करके अपने अध्यापकों को आश्चर्यचकित कर देते थे।

तिलक और उनके साथियों ने देश के बालकों को उपयोगी शिक्षा देने के लिए एक स्कूल ’न्यू इंग्लिश स्कूल‘ की स्थापना की जिसका उद्देश्य था देशवासियों को मातृभाषा के माध्यम से संस्कृति एवं देश की वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी देना। स्कूल की स्थापना के समय केवल उन्नीस विद्यार्थी थे जो वर्ष के अन्त में 336 हो गए।  धीरे-धीरे इस स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ती गई और अन्त में यह स्कूल महाराष्ट्र की प्रमुख शिक्षण संस्था बन गए।

प्रथम वर्ष में ही, इस स्कूल का परीक्षा फल 75 प्रतिशत तथा दूसरे वर्ष में 88 प्रतिशत हुआ। इस स्कूल की सफलता को देखकर तत्कालीन शिक्षा आयोग के अध्यक्ष पर विलियम हंटर ने कहा था सारे हिन्दुस्तान में इसकी बराबरी करने वाला स्कूल नजर नहीं आया और दूसरे देशों से तुलना करने पर भी इसी स्कूल का नम्बर ऊपर आयेगा।

आखिर थोड़े ही समय में इस विद्यालय की सफलता का रहस्य क्या था? विद्यालय को तिलक, आगरकर, आपटे और नाम जोशी जैसे अध्यापक और प्रबन्धक मिले थे। तिलक स्वयं गणित पढ़ाते थे। उस समय तिलक, आगरकर, आपटे और नामजोशी जैसे विद्वान् अपना निर्वाह 880 रूपये वार्षिक में करते थे। विद्यालय के नियमानुसार विद्यालय के शिक्षक प्राइवेट टूयूशन भी नहीं कर सकते थे। विद्यालय की नियमावली स्वयं तिलक ने बनाई थी।

इतने कम वेतन के कारण शिक्षकों को कष्ट भी उठाना पड़ता था। आर्थिक कमी के कारण कई शिक्षक दुःखी भी रहते थे। जब शिक्षक तिलक से वेतन बढ़ाने की मांग करते थे, वे उनका जवाब यह कह कर देते थे कि विद्यालय की उन्नति शिक्षकों के त्याग पर ही निर्भर है। जिस दिन से शिक्षक त्याग को छोड़कर रूपया बटोरना शुरू करेंगे, उसी दिन से विद्यालय की अवनति शुरू हो जाएगी। तिलक ने स्वयं इस बात को आदर्श बनाया था।

स्कूल की सफलता के बाद तिलक और उनके साथियों ने कॉलेज खोलने की योजना बनाई। सन् 1884 में स्कूल के संचालकों की बैठक हुई। सर्वसम्मिति से ’डेक्कन एजुकेशन सोसायटी‘ की स्थापना की गई। बम्बई विश्वविद्यालय को एक आवेदन पत्रा भेजा गया कि पूना में ’एक‘ आर्ट कॉलेज चाहिए। विश्वविद्यालय उसकी अनुमति प्रदान करे। कुछ ही दिन बाद सोसायटी को कॉलेज चलाने की अनुमति मिल गई। इस अनुमति से सोसायटी का व्यय बढ़ गया। इस व्यय को पूरा करने के लिए चंदा-संग्रह का भार तिलक पर था। तिलक ने महाराष्ट्र की रियासतों से चन्दा लेकर 50 हजार रूपया संग्रहित किया। बम्बई के तत्कालीन गवर्नर के नाम पर ’फरग्यूसन कॉलेज‘ की स्थापना हुई।

’न्यू इंग्लिश स्कूल‘ और संगठन की ओर से मराठी और अंग्रेजी साप्ताहिक ’केसरी‘ और ‘मराठा’ का प्रकाशन शुरू हुआ। ’मराठा‘ और ’केसरी‘ के संपादक के रूप में तिलक ने अनेक राजनीति और कानून संबंधी लेख लिखे जिससे आम आदमी के ज्ञान में वृद्धि हो सके।

इसके अतिरिक्त उन्होंने विश्वप्रसिद्ध पुस्तके  ’गीता-रहस्य‘ लिखी। इस पुस्तक के माध्यम से तिलक ने यह बतलाने का प्रयास किया कि गीता लोगों को कर्म करने का सन्देश देती है। गीता रहस्य की रचना तिलक ने मंडला जेेल के उस छोटे से कमरे में की थी जहां सूर्य का प्रकाश और हवा भी अच्छी तरह से नहीं पहुंचता था।

तिलक का कथन था कि एक समय में एक काम करो और इस कथन का पालन उन्होंने स्वयं भी किया। संपादक बनने के बाद उन्होंने सोसायटी की आजीवन सदस्यता से त्यागपत्रा दे दिया।

इस प्रकार हम पाते हैं कि तिलक महान् समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ, विधिविशारद के साथ साथ एक आदर्श लोकशिक्षक थे। आज की वर्तमान परिस्थिति में छात्रा और शिक्षक के बिगड़ते हुए संबंधों को देखकर शिक्षकों द्वारा तिलक जैसा व्यवहार अपेक्षित है।  

ये भी पढ़े: स्वच्छता ही है देश के विकास का पहला कदम...


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