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August 24 2019 03:31 AM

प्रेम का यह जोग

Posted at: May 13 , 2019 by Dilersamachar 7481

दयानंद पांडेय

विवाहेत्तर प्रेमियों की कोई पहचान नहीं होती

इन में जान होते हुए भी जान नहीं होती 

वे मिलते भी हैं तो छुप कर

अपरिचय की सुरंग में घुस कर

सार्वजनिक मुलाकात में

उन की कोई पहचान नहीं होती

परछाईं भी जैसे आंख चुरा लेती है 

प्रेम का उफान जैसे रुक जाता है

प्रेम जैसे डर जाता है 

प्रेमी चोर बन जाता है

प्रेम में साथ होते हैं

मुलाकात में अकेले

दुःख-सुख में साथ होते हुए भी

साथ नहीं दीखते

प्रेम ऐसे ही बड़ा बन जाता है

जैसे बकैयां चलते-चलते

कोई बच्चा अचानक 

उठ कर खड़ा हो जाता है

लोक-लाज की चादर में लजाए

ये प्रेमी रोज चार ताजमहल बनाते हैं

रोज दस ताजमहल तोड़ देते हैं 

जो बना लिए होते हैं वह भी

जो नहीं बना पाए होते हैं वह भी

उन के प्रेम की परवान यही होती है

इसी में होती है

वह जल-जल जाते हैं

मर-मर जाते हैं 

पर न धुआं दिखता है , न मरना

लोग जान भी नहीं पाते

और उन की समाधि बन जाती है 

इन अज्ञात समाधियों की कोई पहचान नहीं होती

इन की कोई सरहद , कोई शिनाख्त नहीं होती

कोई कहानी , कोई उपन्यास नहीं होता

इस प्रेम में स्त्रिायां सुलगती हैं, तरसती हैं 

सिर्फ एक क्षणिक स्पर्श के लिए

इस प्यार भरे स्पर्श में उन की दुनिया संवर जाती है

किसी फूल से भी ज्यादा खुशबू से भर जाती है

शहद से भी ज्यादा मिठास से भर जाती है

और पुरुष

इसी खुशबू में नहा कर न्यौछावर हो 

इसी मिठास में जीवन गुजार देते हैं

जां निसार कर देते हैं

प्रेम की यह पवित्राता

किसी नदी की ही तरह

उन की दुनिया में बहती रहती है

इस प्रेम की कैद में

कई-कई जेलें , यातनाएं और इच्छाएं 

निसार हैं

प्रेम की यह वैतरणी ऐसे ही पार होती है

बिन बोले , बिन सुलगे , बिन उबले

चुपचाप

प्रेम की यह अकेली स्वीकार्यता , यही सुलगन

प्रेम का यह ढाई आखर, प्रेम का यह जोग 

प्रेम की यह सत्ता , प्रेम की यह कैफियत 

किसी को राधा , किसी को कृष्ण बना देती है 

चुपचाप

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