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August 7 2020 10:11 AM

फिल्मों में है समाज को बदलने की ताकत-तेज सप्रू

Posted at: Dec 6 , 2017 by Dilersamachar 5432

दिलेर समाचार, संजय सिन्हा :फिल्मों में अभिनय का जिक्र आते ही बेशुमार कलाकारों का नाम सामने आ जाता है मगर कुछ नाम ऐसे हैं जो बेहद ही खास हैं। ऐसा ही एक खास नाम है तेज सप्रू का। अभिनय के कैरियर का एक लम्बा दौर देख चुके तेज सप्रू ने लगभग पौने तीन सौ हिंदी और पंजाबी फिल्मों में अभिनय किया है। नए-पुराने कलाकारों के साथ काम करने वाले तेज सप्रू के पास अभिनय का लम्बा अनुभव है। आज भी वह सक्रिय हैं। पिछले दिनों सुविख्यात फिल्म अभिनेता तेज सप्रू से कई मुद्दों पर लम्बी बातचीत की संजय सिन्हा ने पेश है मुख्य

अंशः

आपने फिल्म इंडस्ट्री के कई दौर देखे हैं.याद कीजिये,जब आप एक्टिंग शुरू कर रहे थे और आज का दौर...क्या फर्क पाते हैं तब और अब में?

मैंने वाकई कई दौर देखे। हर दौर ने मुझे सिखाया.मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया। एक बात जरूर बताना चाहूंगा कि उस दौर में एक अपनापन -सा था। सीनियर एक्टर्स छोटे कलाकारों को को-आपरेट करते थे, सिखाते थे मगर आज का दौर कुछ अलग है। उस वक्त हमलोग जब भी आउटडोर शूटिंग पर जाते थे तो अलग ही माहौल मिलता था। छोटे-बड़े सभी कलाकार एक साथ मिलकर खाते  थे, बैठते थे, बातें होती थीं मगर अभी ऐसा माहौल नहीं रह गया है। स्टारडम का भूत सवार होता है बड़े कलाकारों पर जिनमें वो प्यार, वो अपनापन अब नहीं दीखता है। प्रोफेशनलिज्म के साथ-साथ अपनापन और प्यार भी जरूरी है। तब संगीत भी अच्छा हुआ करता था। फिल्मों के गाने भी कर्णप्रिय होते थे लेकिन आज गीतों की कर्णप्रियता खोती जा रही है। तब स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का दौर था, आज की प्रतिस्पर्धा गन्दी हो गई है।

सही कहा आपने पर माहौल को ठीक करने के लिए आप जैसे सीनियर कलाकारों को ही पहल करनी होगी। ऐसा नहीं लगता है आपको?

मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करता हूं मगर सबको मिलकर इस दिशा में काम करना होगा।

शुरू -शुरू में अपने पाजिटिव शेड्स वाले किरदार निभाए मगर बाद में आप विलेन के रूप में ढल गए। ऐसा क्यों?

देखिए, एक्टिंग तो एक्टिंग होती है.नेगेटिव हो या पाजिटिव, सबके लिए उतनी ही मेहनत करनी पड़ती है। मेरी पर्सनालिटी के हिसाब से फिल्मकारों को लगा कि मैं नेगेटिव शेड्स के लिए ही फिट हूं इसलिए मुझे नेगेटिव किरदार ही मिलने लगे। सच तो ये है कि कलाकार को हर कैरेक्टर  के लिए मेहनत करनी पड़ती है। बिना मेहनत के उस कैरेक्टर  में जान आ ही नहीं सकती है।

आपने फिल्म इंडस्ट्री और अभिनय का एक लम्बा दौर देखा है। कोई ऐसी घटना बताइए जिसे आप आज तक भूल नहीं पाए हैं।

ऐसी बहुत सारी घटनाएं हैं जिन्हें मैं आज तक भूल नहीं पाया हूं मगर एक घटना मुझे आज भी याद आती है। मैं दिलीप कुमार साहब के साथ एक फिल्म कर रहा था-‘कानून अपना-अपना’। इस फिल्म में संजय दत्त और माधुरी दीक्षित भी थे। मेरा नेगेटिव कैरेक्टर था। क्लाइमेक्स में दिलीप कुमार के साथ मेरा फाइट सीन भी था। शूटिंग से पहले दिलीप साहब ने मुझे बुलवाया और मुझसे ही सलाह लेने लगे। मैं अवाक् रह गया कि इतना सीनियर और मंजा हुआ कलाकार मुझ जैसे जूनियर आर्टिस्ट्स से भी सीखता है। तब से मैं दिलीप साहब का मुरीद हो गया। वह बड़े कलाकार के साथ-साथ एक नेक इंसान भी हैं। दूसरे कलाकारों को उनसे सीखना चाहिए।

आपने एक्टिंग के लगभग 39 साल पूरे कर लिए। अब आगे क्या करना चाहते हैं? एक्टिंग ही करते रहेंगे या डायरेक्शन के क्षेत्रा में भी आएंगे आप?

एक्टिंग तो छूटेगा नहीं। जब तक शरीर साथ देगा,एक्टिंग करता रहूंगा। एक्टिंग कैरियर के पचास साल  पूरे करना चाहता हूं (हंसते हैं)। वैसे डायरेक्शन की भी इच्छा है मेरी। मैंने एक स्क्रिप्ट लिखी है। उस पर फिल्म बनाना चाहता हूं। मुझे लगता है यह एक फाइनेस्ट लव स्टोरी होगी। स्क्रिप्ट तो बहुत पहले ही लिख चूका हूं मगर काम में इतना बिजी रहा कि इसपर सोचने का मौका ही नहीं मिला। अब इसपर काम शुरू करूंगा और डायरेक्शन भी खुद ही करूंगा।

देश का सच्चा हीरो आप किसे मानते हैं। फिल्मों में काम करने वाले हीरो या कोई और?

देखिये, फिल्मों में तो एक्टिंग की जाती है.देश का सच्चा हीरो तो वो है जो देश के हित में काम करता है। सबसे बड़ा हीरो मैं उन जवानों को मानता हूं जो देश की सरहदों पर खड़े होकर हमें सुरक्षा दे रहे हैं। जिस तापमान में आम लोगों का रहना मुश्किल होता है, उस तापमान में खड़े होकर दुश्मनों से हमारी हिफाजत करने वाले मिलिट्री के जवान ही सही मायने में हमारे हीरो हैं।

अपने प्रशंसकों को क्या सन्देश देना चाहेंगे?

यही कि अच्छी फिल्मों को हमेशा सपोर्ट करें। अच्छे गाने सुनें। संदेशप्रद फिल्में समाज को बदलने की ताकत रखतीं हैं।

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