Logo
October 19 2019 03:46 PM

मोदी की काशी में अजन्मी कन्याओं का पिंडदान

Posted at: Oct 10 , 2019 by Dilersamachar 5307

प्रभुनाथ शुक्ल

महादेव की पुण्य नगरी काशी से पितृपक्ष में सकारात्मक खबर आयी है। सामाजिक संस्था आगमन ने दशाश्वमेध गंगा घाट पर सोमवार को यानी मातृनवमी के दिन उन अजन्मी बेटियों के लिए जो इस दुनिया में जन्म लेने के पूर्व माँ गर्भ में मारी दी गयी के लिए 5500 पिंडदान किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार से अजन्मी उन कन्याओं को याद कर उनकी भटकती आत्माओं को शांति प्रदान की गयी। घाट पर मौजूद विद्वानों ने धार्मिक अनुष्ठान के जरिए तर्पण कराया। काशी से निकला यह संदेश निश्चित रुप से दूर तलक जाएगा।

संस्था की तरफ से की गयी यह बेमिसाल पहल है। वाराणसी प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्रा और आदिकालीन सनातन संस्कृति का केंद्र भी है। धर्म-संस्कृति और संस्कार की पुण्यनगरी वाराणसी यानी काशी अपने आप में बेमिसाल हैं। काशी जीवंत नगरी है। कहा जाता है कि काशी का कभी विनाश नहीं होता। काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है। यह मोक्ष की नगरी है। धर्म और संस्कार लोगों की नसों में रचा-बसा है। काशी की मिट्टी और वाणी में बेहद लगाव और खिंचाव है। पुण्य कमाने जो यहां आता है, वह काशी का होकर रह जाता है। काफी संख्या में विदेशी सैलानी आते हैं जो काशी को खुद में रचा-बसा लेते हैं। मोक्ष और मुक्ति की चाह में वे काशी को समाहित कर लेते हैं। काशी की गलियां और गंगा घाट अपने में हजारों रहस्य छुपा रखे हैं। परिभाषाएं यहां गढ़ी जाती हैं। सामाजिक संस्था आगमन अब तक अजन्मी 26,000 हजार बेटियों का तर्पण कर चुकी है।

सामाजिक व्यवस्थााएं तेजी से बदल रही हैं। लोगों के सोचने और जीने का नजरिया भी बदल रहा है। लड़कियों को स्कूल-कालेज भेजा जा रहा है। लड़कों से कई गुना बेहतर प्रदर्शन लड़कियां कर रही हैं। सरकारी नौकरियों से लेकर निजी संस्थानों में बेटियां का अपना जलवा है। इसरो में भी प्रभावशाली नेतृत्व क्षमता दिखा रही हैं। वायुसेना में शामिल होकर फाइटर विमान उड़ा रही हैं। बेटियों के लिए सरकार ने महिला सेना का भी गठन किया है। राज्यों के सिविल पुलिस में भी बेटियां मौजूद हैं।

समाज में शिक्षा का विकास हुआ है। बेटों के साथ बेटियों को पढ़ने भेजा जा रहा है। ग्रामीण इलाकों में भी बेटियां शिक्षा और दूसरे क्षेत्रा में अच्छा काम कर रही हैं। राजनीतिक हस्तियों में महिलाओं की कामयाबी बेमिसाल है। बेटियां सामाजिक और धार्मिक बंधनों को तोड़ कर अर्थी को कंधा देने के बाद मुखाग्नि भी दे रही हैं। इसके बाद भी कन्याभ्रूण हत्या का सिलसिला नहीं थम रहा है। यह अपने आप में सबसे गंभीर और विचारणीय बिंदु है। आखिर कन्याभ्रण हत्या पर रोक क्यों नहीं लग पा रही है। सरकारी चिकित्सालयों से लेकर निजी अस्पतालों में लिंग परीक्षण के खिलाफ गैर कानूनी बोर्ड चस्पा हैं। बोर्ड पर बाकायदे संबंधित अपराध की सजा भी लिखी गयी है लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। खुले आम लिंग परीक्षण हो रहे हैं। सोनोग्राफी के बहाने जांच रिपोर्ट भी गोपनीय तरीके से लोगों तक पैसे लेकर पहुंचायी जा रही है। देश में लगातार बेटियों का लिंगानुपात घट रहा है।

देश के छह राज्यों में बेटियां गर्भ में सुरक्षित नहीं है। सबंधित राज्यों में बेटा और बेटियों के लिंगानुपात में काफी अंतर है। बेहतर शिक्षा, आधुनिक एवं वैज्ञानिक सोच के बाद भी बेटियों के प्रति हमारे समाज का नजरिया नहीं बदला है। गर्भ में पल रही बेटियों की हत्या को लेकर कोई सकारात्मक परिणाम नहीं दिख रहे हैं जिसकी वजह से बेटियों के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं। यूपी उन छह राज्यों में शामिल हैं जहां बेटियों का लिंगानुपात बराबर धराशायी हो रहा है। बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ का नारा बेमतलब साबित हो रहा है।

2011 की जनगणना के बाद नीति आयोग ने जो आंकड़े जारी किए हैं वह बेहद चौंकाने वाले हैं। 2011 की जनगणना में जहां लड़कियों की संख्या प्रति हजार लड़कों पर 901 थी जबकि नीति आयोग के हेल्थ इंडेक्स में यह संख्या 879 पर पहुंच गयी। 2001 में यह संख्या 916 थी। नीति आयोग की तरफ से 2012 से 2014 और 2013 से 2015 में किए गए एक सर्वे से पता चलता है कि देश में लिंगानुपात लगातार घट रहा है। बेटियों की संख्या कम हो रही है। यूपी उन छह राज्यों में शामिल है जहां लगातार बेटियों की संख्या घट रही है।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की बात को सच मानें तो अब शादी के लिए बेटियों का अपहरण भी किया जाने लगा है। मध्यप्रदेश के हालात और बदतर हैं। यहां शादी के लिए बेटियों का सबसे अधिक अपहरण किया जाता है। एनसीआरबी के आंकड़ों के आइने में अगर हम इसका विश्लेषण करें तो 2016 में देश भर में 66,225 लड़कियों का अपहरण किया गया जबकि 33,855 के अपहरण की वजह सिर्फ शादी थी। मध्यप्रदेश बेटियों के अपहरण मामले में सबसे अव्वल रहा। यहां बेटियों के अपहरण मामले में आठ फीसदी से भी अधिक वृद्धि दर्ज की गयी। यहां 2016 में कुल 7,237 अपहरण के मामले दर्ज हुए जबकि कुल अपहरण के मामलों में 4,994 यानी 69 फीसदी बेटियों का अपहरण किया गया। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो 2014 से महिलाओं के अपहरण का डाटा संग्रहित करने लगा। राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़ों पर गौर करें तो 2016 में 3,38,954 मामले महिलाओं के साथ हुए अपराध के पंजीकृत किए गए जिसमें 66,525 मामले महिलाओं के अपहरण से संबंधित थे। जबकि अपहरण के दर्ज कुल 88,875 मामलों में 74 फीसदी घटनाएं महिलाओं को अगवा करने से जुड़ी थीं।

काशी में आगमन संस्था की तरफ से पितृपक्ष में धार्मिक अनुष्ठान के जरिये जो संदेश देने की कोशिश की गयी है वह अपने आप में काबिले गौर है। पीएम मोदी का संसदीय क्षेत्रा होने के नाते ऐसी सकारात्मक खबरों को सरकार को खुद गंभीरता से लेना चाहिए। इसे एक सामाजिक मुहिम बनाना चाहिए। सरकार को ऐसे आयोजन खुद आयोजित कर लोगों में एक धार्मिक डर पैदा करना चाहिए। हिन्दू -धर्म संस्कृति का यह अकाट्य सत्य है कि अकाल मौत की वजह से आत्माएं भटकती हैं। वे प्रेतयोनि में वास करती हैं जिसकी वजह से लोगों की अकाल या सामान्य मौत होने पर आत्माओं की शांति के लिए पिंडदान और दूसरे कर्म किए जाते हैं। फिर हजारों कन्याएं जो इस दुनिया में आने से पहले की गर्भ में मार दी जाती हैं, वह भी जीव होती हैं। इस हत्या का पाप भोगना पड़ता है। फिर ऐसी अजन्मी बेटियों की आत्माओं का तर्पण कौन करेगा।

ये भी पढ़े: घर-घर दीवाली, हर-हर दीवाली

हमें ऐसा माहौल पैदा करना चाहिए कि अजन्मी बेटियों के तर्पण और पिंडदान की नौबत ही न आए। ऐसा सामाजिक माहौल तैयार करना चाहिए कि लोग बेटियों को लेकर डरे नहीं। सड़क पर बेटियां सुरक्षित हों। घर से लेकर आफिस और कामकाजी क्षेत्रा तक वह बेहिचक रहें। दहेज मुक्त शादियों के लिए माहौल पैदा किया जाए। लोगों को समझाया जाय कि कन्याभ्रूण कि गर्भ में हत्या एक महापाप है। आगमन संस्था की पहल बेमिसाल है। यह मुहिम सामाजिक परिर्वतन ला सकती है। 


Tags:

Related Articles

Popular Posts

Photo Gallery

Images for fb1
fb1

STAY CONNECTED