अमित कुमार अम्बष्ट
दिलेर समाचार, पिछले ही दिनों प्रकाश में आए पी एन बी के 11500 करोड़ के घोटाले ने सम्पूर्ण देश को सकते में डाल दिया है। जहाँ एक ओर देश की बैंकिंग व्यवस्था की विश्वसनीयता कसौटी पर है, वहीं घोटाले के मास्टर माइंड ज्वेलरी कारोबारी का मामला संज्ञान में आने के कुछ हफ्ते पहले ही देश छोड़ भाग जाना वर्तमान केन्द्रीय सरकार को प्रथम दृष्टया कटघरे में खड़ा करता है ।
इन सभी चौकाने वाली घटनाक्रम के बीच सत्ता पक्ष और विपक्ष का एक दूसरे पर आरोप - प्रत्यारोप भी जारी है जिससे राजनीतिक रोटियाँ सेंकी जा सकंे और वोट की क्षुधा को शांत किया जा सके लेकिन जो सबसे मुश्किल हालत है वो जनता की है जो सत्ता पक्ष और विपक्ष द्वारा एक दूसरे की तरफ खड़ी की गई उँगली निहार रही है। ऐसे में एक बारीक विश्लेषण की जरूरत है कि घोटालों की शुरूआत से मास्टर माइंड के देश छोड़़ के भाग जाने तक आखिर चूक किससे और कैसे हुई ? आखिर इतने बड़े घोटाले की जिम्मेदारी किसकी बनती है ? ऐसे में सत्ता पक्ष या विपक्ष यहाँ तक कि मीडिया को भी आरोप - प्रत्यारोप से इतर तथ्यों पर बात करनी चाहिए ।
सबसे पहले हमें यह मानकर चलना चाहिए कि इतना बड़ा घोटाला बिना किसी बैंकिंग अधिकारी , कर्मचारी और ऑडिटर के सांठ - गांठ के संभव हो ही नहीं सकता जबकि आज हम उस दौर में हैं जब बैंक के सभी कार्य मैनुअली नहीं अपितु बैंकिग साफ्टवेयर द्वारा संपादित होते हैं । ऐसे में त्राुटि की गुंजाइश बहुत कम हो जाती है ।
सबसे पहले पंजाब नेशनल बैंक के प्रबंध निदेशक सुनील मेहता ने इस मामले को संज्ञान में लाते हुए कहा कि पीएनबी ने स्वयं यह मामला उजागर किया है जो 2011 से चल रहा था । अब सोचने और चिंता की बात यह है कि जब घोटाला 2011 से शुरू हो गया था तो बैंक को इतने साल तक इसकी भनक कैसे नहीं लगी ? मजे की बात यह भी है कि बैंक 29 जनवरी 2018 को यह मामला उजागर करता है और घोटाले का मास्टर माइंड उद्योगपति उससे पहले ही 1 जनवरी को देश छोड़ भाग जाता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बैंक के द्वारा घोटाला पकड़े जाने और उसपर कार्रवाई की जानकारी क्या कोई बैंक कर्मचारी नीरव मोदी तक पहुँचा रहा था ?
एक और बेहद महत्त्वपूर्ण बात जो बैंकिग व्यवस्था और उसके अधिकारियों की मंशा पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है कि हीरे मोती तथा अन्य आभूषणों के आयात हेतु बैंक लेटर ऑफ अंडरटेकिंग ( एलओयू ) जारी करता है । वास्तव में एलओयू एक बैंक गारंटी है जो बैंक कारोबारियों को दूसरे देश से आयात के बदले निर्यातक हेतु कारोबारी की तरफ से जारी करता है कि अगर तय सीमा तक कारोबारी निर्यातक का पैसा नहीं चुका पाया तो उसके बदले बैंक उसका भुगतान करेगा।
नीरव मोदी के केस में पीएनबी के आंकड़े के अनुसार पूर्व डिप्टी मैनेजर गोकुलनाथ सेट्ठी ने वर्ष 2017 में मात्रा 63 दिनों में 143 एलओयू जारी किए थे तथा उससे पहले 2011 से 2017 फरवरी तक 150 एलओयू जारी किए गए । एक कर्मचारी और अधिकारी की मिली भगत से दो जाली एलओयू भी जारी किए गए और आश्चर्य की बात यह कि बैंकिंग की सभी तकनीकों को धता बतलाते हुए उन्होंने सबकुछ नियंत्रित कर लिया। न बैंक को कानों कान खबर हुई और न तत्कालीन कांग्रेस सरकार को। आमतौर पर ऐसे कर्मचारी और अधिकारी की फेरबदल होती रहती है लेकिन इस घोटाले में संलिप्त कर्मचारी और अधिकारी कई महीनों तक एक ही स्थान और पद पर कार्यरत रहे । यह भी अनदेखी हुई कि आमतौर पर एलओयू सिर्फ तीन तीन महीने हेतु जारी किए जाते हैं लेकिन नीरव मोदी के केस में इसे एक एक साल तक का जारी किया गया, बिना इसकी जांच के कि उससे पहले जारी किए गए एलओयू के बदले निर्यातक को भुगतान किया भी गया है या
नहीं।
ऐसे में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है कि इसकी जानकारी बैंक को पहले से थी और उसके कर्मचारी भी इसमंे संलिप्त थे । शायद यही कारण भी है कि रिजर्व बैंक ने इस घोटाले की क्षतिपूर्ति पीएनबी को स्वयं वहन करने को कहा है । ऐसी हालत में बैंक तो निश्चित रूप से कटघरे में खड़ा है लेकिन तब की कांग्रेस सरकार जो अब विपक्ष में है और इस घोटाले पर हो हल्ला मचाकर एक माहौल बनाने की कोशिश में है, जवाबदेही तो उसकी भी बनती है क्योंकि घोटाले की शुरूआत उनकी सरकार के काल में हुई थी और मोदी सरकार के आने के पहले से ही यह खेल जारी था लेकिन वर्तमान केन्द्र की सरकार भी 2014 में आ चुकी थी और यह खेल 2018 में उजागर हुआ तो मेरे हिसाब से जितनी जबाबदेही तत्कालीन कांग्रेस सरकार की बनती है, उतनी ही वर्तमान मोदी सरकार की भी बनती है।
अपराधी अगर अपराध कर के फरार हो जाये तो उंगलियाँ उठना लाजिमी है। लोकतंत्रा में उठनी ही चाहिए, ऐसे भी सत्ता पक्ष और विपक्ष को एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने के बदले अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए और बैंकिंग सिस्टम से हुई चूक जिसका फायदा नीरव मोदी और उसके सांठगांठ के कर्मचारियों ने उठाया है, उसपर विचार कर आवश्यक कदम उठाने चाहिए। किसी भी हालत में नीरव मोदी के प्रत्यार्पण की कोशिश होनी चाहिए । आम जनता को इससे कोई क्षति न हो, उसपर विचार करना चाहिए।
बेहद बारीकी से यह भी जांच होनी चाहिए कि कोई दूसरा बैंक भी तो इसका शिकार नहीं हो गया चूंकि यह एक ऐसा मामला है जिसमें उंगली पीएनबी बैंक और उसके बैंकिक सिस्टम , तत्कालीन केन्द्रीय सरकार और वर्तमान में विपक्ष की भूमिका निभा रहे कांग्रेस और वर्तमान मोदी सरकार सबकी तरफ उठ रही है । ऐसे में जनता का भरोसा बैंक, बैंकिंग सिस्टम और सरकार पर बना रहे, इसलिए जरूरी है सत्ता पक्ष - विपक्ष जनता के बीच एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप के बदले तथ्यों पर जवाब दें और आवश्यक कदम उठाएं।
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