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December 8 2019 10:02 PM

चक्रासन से कब्ज को दूर भगाइये

Posted at: Oct 24 , 2019 by Dilersamachar 6084

आनंद कुमार अनंत

आज कब्ज एक भयंकर बीमारी के रूप में उभरी हुई है परन्तु अभी भी अधिकतर लोग इसके प्रति सजग नहीं हैं। जो लोग कब्ज के विषय में नहीं जानते, उन्हें इस विषय में जान लेना आवश्यक है और जो इसके विषय में पहले से ही जानते हैं और फिर भी इसकी अवहेलना करते हैं, वे वास्तव में अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करते रहते हैं और देर-सवेर उन्हें इसका भयंकर परिणाम भुगतना ही पड़ता है।

मल जब आंतों को पकड़ लेता है अर्थात् उनकी स्वाभाविक क्रिया में अवरोध उत्पन्न कर देता है तो उस स्थिति को कब्ज के नाम से जाना जाता है। इसे कोष्ठबद्धता के नाम से भी जाना जाता है। प्रायः शरीर में होने वाले सभी रोगों के मूल में ‘कब्ज‘ ही कारण बनता है। कब्ज के कारण बड़ी आंतों में खुराक के देर तक रूकने और सड़ते रहने पर उसमें से  दुर्गन्धयुक्त गैस निकलती रहती है।

यह गैस शरीर के लिए बहुत हानिकारक होती है। इसी से रक्त में उष्णता बढ़कर उसकी गति में व्यवधान उपस्थित होता है। इसके नतीजे धीरे-धीरे सामने आते हैं। प्रायः लोग ‘कब्ज‘ को बीमारियों की माता कहते हैं। कब्ज के कारण जीवन का आनन्द नष्ट हो जाता है। इसके कारण अजीर्ण, मन्दाग्नि, संग्रहणी, अर्श (बवासीर), भगंदर, धातु दुर्बलता, स्त्रिायों के मासिक स्राव में गड़बड़ी, रक्तचाप, स्वप्नदोष, दमा, मियादी बुखार, पायरिया, गंजापन, मोटापा, बालों का सफेद होना, नेत्रा ज्योति का क्षीण होना, आदि अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं।

कब्ज के रोगी को मल त्यागने के लिए बार-बार जोर लगाना पड़ता है जिससे कभी-कभी हर्निया भी हो सकता है। कब्ज से यकृत में बहुत विकार पैदा हो जाते हैं। यहां तक कि अनीमिया (खून की कमी) और शरीर में पानी पड़ जाने का रोग भी हो जाता है।

मल का पतला आना, शुष्क आना, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार आना कब्ज के ही रूप हैं। कब्ज होने के विभिन्न कारण हैं लेकिन खान-पान की अनियमितता इसका एक विशेष कारण है। खान-पान की अनियमितता के कारण ही पैखाना निश्चित समय पर न आना या कम आना या बिलकुल न आना प्रारंभ हो जाता है। मल का कड़ा होना, मल त्याग में कठिनाई, रूक जाना आदि भी कब्ज के ही अन्तर्गत आता है। कब्ज या कोष्ठबद्धता के कुछ विशिष्ट कारण निम्नांकित हैं-

ड यकृत की कमजोरी।

ड रेचक दवाओं का परिणाम।

ड विटामिनों का अभाव।

ड मलमूत्रा के वेगों को रोकना।

ड विशुद्ध वायु का अभाव।

ड मानसिक स्थिति का प्रभाव।

ड शारीरिक परिश्रम का अभाव तथा।

ड खान-पान की अनियमितता।

इनके अतिरिक्त नींद की अनियमितता, शौचालय की गंदगी, कम जल पीना, आदि कारणों से भी कब्ज की बीमारी हो सकती है। कब्ज से ग्रस्त व्यक्तियों को सिरदर्द, अंग वेदना, शरीर का भारी रहना, पैरों में दर्द, घबराहट, गैस चढ़ना, नेत्रों में भारीपन, दांतों पर मैल की परत जमना आदि लक्षण दिखाई देने लगते हैं। संग्रहणी, पेचिश तथा मल का बार-बार आना भी कब्ज के ही लक्षण माने जाते हैं।

कब्ज की व्याधि से छुटकारा पाने के लिए ‘चक्रासन‘ रामबाण औषधि है क्योंकि इसका सीधा प्रभाव बड़ी आंत पर पड़ता है जिससे आंत के अंदर का सड़ा, कड़ा एवं रूका मल शीघ्र ही बाहर निकल जाता है। चक्रासन करने से कब्ज की शिकायत रह ही नहीं सकती। इससे शरीर में लचीलापन आता है और पुनर्यौवन की प्राप्ति होती है। कमर पतली तथा सीना चौड़ा होता है। यह आसन नृत्य कलाकारों की दिव्य देन है।

चक्रासन करते रहने से नाभि मंडल स्वयमेव अपने स्थान पर आ जाता है और शरीर का रक्तसंचार दुरूस्त हो जाता है। कमर, घुटना, हाथ-पांव, कंधा, वक्षस्थल, बांह और पैर, सभी पर इस आसन का अच्छा प्रभाव पड़ता है। इस आसन को स्त्राी एवं पुरूष दोनों ही समान रूप से कर सकते हैं।

इस आसन के करते रहने से कब्ज की बीमारी दूर हो जाती है तथा पाचन-शक्ति में वृद्धि होती है। पुरूषों के धातुदोष, शीघ्रस्खलन, स्वप्नदोष आदि बीमारियां भी चक्रासन से दूर हो जाती हैं। स्त्रिायों की मासिक अनियमितता, स्तनों की शिथिलता, ल्यूकोरिया आदि बीमारियां चक्रासन से दूर हो जाती हैं तथा बदन छरहरा व चुस्त हो जाता है।

आसन की विधिः- आसन के नियमों का ध्यान रखते हुए जमीन पर एक चादर बिछा दें और उस पर पीठ के बल लेट जाएं। पूरे शरीर को सीधा रखें। इसके बाद दोनों पांवों को घुटने से मोड़कर उनके बीच लगभग एक फुट की दूरी रखते हुए नितम्बों (जांघों) के पास तक लायें। इसके बाद हाथों को कोहनी वाले हिस्से से मोड़कर उल्टा करते हुए कंधों के पास रखें। इस समय हाथों की अंगुलियां पैरों की तरफ होनी चाहिए।

 अब हाथों और पांवों के बल पूरे शरीर को ऊपर की ओर उठाइए। नजर सामने रखें। सांस साधारण रूप से चलने दें। कुछ देर उसी स्थिति में रहने के बाद वापस पहली स्थिति में आ जाइये। इस प्रकार पांच-सात बार तक रोज अभ्यास करके चक्रासन के लाभों को उठाया जा सकता है।

प्रारंभ में थोड़ी कठिनाई हो सकती है मगर निरन्तर अभ्यास करते रहने पर कुछ दिनों मंे यह सामान्य हो जाता है। आसन के अभ्यास को धीरे-धीरे आगे बढ़ाते रहना चाहिए। कुछ लोग इस आसन को खड़ा होकर भी करते हैं परन्तु सामान्य लोगों से प्रारंभ में यह संभव नहीं होता। खड़ा होकर अभ्यास तभी किया जाना चाहिए जब कोई अच्छा योग शिक्षक सम्मुख हो।

कब्ज निवारण, यकृत को शक्तिशाली बनाने, कमर को पतली बनाने, स्तनों को सुदृढ़ बनाने, पाचन की शक्ति को बढ़ाने, शीघ्रपतन, धातुदोष, ल्यूकोरिया आदि व्याधियों से मुक्ति पाने के लिए चक्रासन‘ का अभ्यास नियमित रूप से करना चाहिए। 

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