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July 22 2019 09:23 PM

दूर करें अपने मनोगत अवरोध

Posted at: Apr 18 , 2019 by Dilersamachar 5194

श्री ‘ख’ अपरिचित लोगों के सामने मुंह ही नहीं खोल पाते। उनकी जुबान पर जैसे ताला सा लग जाता है, वह हकलाने लगते हैं। उन के मन में यह बैठ गया है कि वह अनजान लोगों के सामने समयोचित वार्तालाप नहीं कर पाएंगे।

श्री ‘ग’ स्टेज पर जाने के नाम से ही नर्वस हो जाते हैं। उन के हाथ-पांव फूल जाते हैं, पसीने छूटने लगते हैं। मुझे याद है कि स्कूल कॉलेजों के दिनों में मैं पढ़ाई में सब से आगे रहता था मगर खेलकूद के नाम से मुझे घबराहट होने लगती थी। मेरी यह दृढ़ धारणा बन गई थी कि मैं कोई भी गेम ठीक से नहीं खेल पाऊंगा।

उपरोक्त किसी भी व्यक्ति में किसी भी प्रकार की कोई शारीरिक अथवा मानसिक त्राुटि हो या कमी हो, ऐसी कोई बात नहीं है। केवल अपनी कल्पना में ही उन्होंने ऐसा मान लिया है। एक भ्रम पाल लिया है। वे चाहें तो अपनी इस धारणा से उबर सकते हैं, इस भ्रमजाल को काट सकते हैं मगर वे इस हेतु प्रयास ही नहीं करते क्योंकि यह धारणा इन के मन-मस्तिष्क पर पूरी तरह हावी हो गई है। उन्होंने इस से समझौता ही कर लिया है। इस स्थिति को ‘मैंटल ब्लाक्स’ अर्थात् ‘ मनोगत अवरोध’ कह सकते हैं।

मजे की बात यह है कि ऐसा कोई न कोई मानसिक अवरोध हम में से अधिकांश लोग पाले रहते हैं यद्यपि उसे हम इस रूप में या इस नाम से नहीं जानते अथवा स्वीकार नहीं करते। उसे हम अभिरूचि, रूझान, प्रवृत्ति, पसंद, दिलचस्पी का नाम दे देते हैं।

दिन-प्रतिदिन के जीवन में तो इससे अड़चनें आती ही हैं, यह अवरोध हमारे कैरियर को भी प्रभावित करता है। हर प्रकार से सुयोग्य होते हुए भी इन मनोगत अवरोधों से ग्रस्त व्यक्ति प्रायः व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं। स्वयं को प्रोजेक्ट करने में ये अवरोध कहीं न कहीं, किसी न किसी प्रकार, उनके आडे़ आ जाते हैं।

मनोवैज्ञानिक इन मनोगत अवरोधों के लिए कई कारण बताते हैं। उनके अनुसार बचपन में मिला पारिवारिक वातावरण, माता-पिता के आपसी संबंध, बहन-भाइयों का व्यवहार, बाल्यकाल में घटी कोई घटना-दुर्घटना देखना या सुनना कोई असामान्य दृश्य आदि जीवन भर के लिए व्यक्ति के मन में एक ग्रंथि उत्पन्न करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।

यह सही है कि अवचेतन में गहरे पैठे, जकड़ जमाए इन मनोगत अवरोधों से छुटकारा पाना इतना आसान नहीं है किन्तु यह भी उतना ही सही है कि बिना इन से छुटकारा पाए व्यक्ति सही अर्थों में स्वयं को सामान्य भी नहीं कह सकता और न ही एक सामान्य व्यक्ति जैसा जीवन ही जी सकता है।

यह भी एक धु्रव सत्य है कि मनुष्य यदि दृढ़ निश्चय कर ले तो असम्भव को भी सम्भव बनाने का सामर्थ्य रखता है। महान व्यक्तियों की जीवनियां स्पष्ट बताती हैं कि उन में भी कोई न कोई कमी, कमजोरी, दोष, दुर्बलता थी जिसे उन्होंने अपने अध्यवसाय, लगन व दृढ़ निश्चय से दूर करने में सफलता पाई।

स्कूल के दिनों में हमारे एक अनुभवी अध्यापक ने, जो स्वयं एक सफल वक्ता थे, मंचभीति (स्टेज फ्राइट) से निबटने के लिए एक आसान या घरेलू नुस्खा बताया था, जिसमें हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा आए। इनका कहना था कि घर से दूर खेतों में निकल जाओ, पेड़-पौधों को श्रोताओं की भीड़ मान लो और उन्हें अपना भाषण पूरे आत्मविश्वास के साथ सुनाओ, बार बार सुनाओ।

यह एक तथ्य है कि हम में से वे विद्यार्थी जिन्होंने उनकी बात गांठ बांध ली और वैसा अभ्यास किया, स्टेज फ्राइट से सदा के लिए मुक्त हो गए तथा अच्छे वक्ता बन गए। इसी प्रकार अभ्यास, निरंतर अभ्यास से इन मनोगत अवरोधों पर काबू पाया जा सकता है। इस में रत्ती भर भी संशय नहीं। कहा भी तो गया हैः

‘करत-करत अभ्यास से जड़मति होत सुजान

रसरि आवत जात ते सिल पर पड़त निसान।’

अतः पहला काम है अपने मनोगत अवरोध को पहचानना, तदुपरांत आवश्यक है उस से छुटकारा पाने हेतु दृढ़ संकल्प करना तथा तद्नुसार आवश्यक कदम उठाना। जरा सोचिए, आखिर क्यों लादंे फिरें हम इन मानसिक अवरोधों को। क्यों न झटक दें इन्हें अपने पल्लू से। ऐसा करना ज्यादा कठिन भी तो नहीं है। 

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