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कुछ भ्रांतियां जो नाहक इस्लाम को कर रही हैं बदनाम

Posted at: Oct 8 , 2019 by Dilersamachar 9394

हसन जमालपुरी

इस्लाम के बारे में बहुत सारी भ्रांतियां हैं। जो इस्लाम को नहीं मानते, उन्हें यह पता नहीं होने के कारण इस प्रकार का भ्रम होता है। आजकल इस्लाम के बारे में दुष्प्रचार करने वाले या फिर पश्चिमी पैसे से पैदा हुए आतंकवादी इस्लामिक साम्राज्य की बात करने लगे हैं। मैं दावे के साथ कहता हूं कि इस प्रकार का कोई चिंतन इस्लाम में नहीं है। यह विशुद्ध रूप से जीवन जीने का एक आसान चिंतन है जो अमन पसंद लोगों को एक प्रकार की सुरक्षा प्रदान करता है।

मसलन इन दिनों इस्लामिक गणतंत्रा पर अनावश्यक विवाद खड़ा किया जा रहा है। दरअसल, इस्लामी विधिशास्त्रा में कहीं भी मकसद-ए-शरिया सिद्धांत को समर्थन नहीं दिया गया है। दरअसल, इस सिद्धांत के अनुसार एक पृथक इस्लामी राज्य की स्थापना की कल्पना की जाती है जहां के बारे में बताया जाता है कि इस्लाम को न मानने वालों के साथ पक्षपातपूर्ण रवैय्या अपनाया जाता है और गैर इस्लामिक नागरिकों को कमतर नागरिक समझा जाता है। इस्लाम में निहित धार्मिक स्वतंत्राता पर आधारित शिक्षाओं के अनुसार किसी भी धर्म को मानना या अनुपालन करना कोई मजबूरी नहीं है। हालांकि धर्म के आधार पर पृथक राज्य की अवधारणा कोई बेहतर कल्पना भी नहीं है। इस्लामिक गणतंत्रा का सिद्धांत नवीन सोच है। इस्लामिक विधि शास्त्रा में ऐसी कोई अवधारण नहीं है।

यदि ऐसा होता तो वह राज्य जहां मुसलमानों के सबसे पवित्रा स्थान मक्का-मदीना स्थित हैं, को सऊदी अरब की रियासत के नाम से जाना जाता है न कि सऊदी अरब की मुस्लिम रियासत के नाम से। आजकल कुछ लोग रियासत-ए-मदीना का जिक्र करते हैं लेकिन वे राज चलाने के लिए बनाए गए संविधान मिश्क-ए-मदीना जिसे हजरत मोहम्मद साहब ने बनाया था, को पढ़ना भूल जाते हैं, जिसमें हजरत ने साफ-साफ कहा है कि मदीना में रहने वाले गैर मुसलमानों की पूर्ण सामाजिक व सांस्कृतिक समानता का हम सम्मान करते हैं। इसके अलावा वे यहूदियों और मुसलमानों को परिच्छेद 25 के मुताबिक एक ही ‘उम्माह’ का मानते हैं। पूरे इस्लामी इतिहास में न तो हजरत साहब ने और न ही 1300 साल में जन्में मुस्लिम खलीफाओं ने दौलत-ए-इस्लामिया पर आधारित राज का नाम लिया बल्कि इस्लाम में सदा लोकतंत्रा, समानता एवं मानवीय मूल्यों पर आधारित समाज का समर्थन किया है, अतः ऐसी कोई जरूरत नहीं है कि किसी राज को इस्लाम पर आधारित नाम दिया जाए जिसकी वजह से इस शांतिपूर्ण धर्म को पूर्वाग्रह से ग्रसित एक मजहब समझा जाए।

उसी प्रकार इस्लाम में पड़ोसियों के बारे में भी कई प्रकार के पूर्वाग्रह लोगों ने पाल रखे हैं। इस बात की जानकारी खुद ईमान वालों को भी नहीं है। इस्लाम में जीवन को जीने का पूरा कायदा दिया गया है। यह मुस्लिमों को भाईचारे, शांति और पड़ोसियों के प्रति प्यार-मुहब्बत रखने का उपदेश देता है। इस्लाम अपने पड़ोसियों के मजहब पर विचार किए बिना उनके साथ आपसी रिश्ते-सहारे और सहयोग रखने पर जोर देता है और साथ ही पड़ोसियों से किसी भी रूप में घृणा करने या नुकसान पहुंचाने के लिए भी मना करता है। एक मुस्लिम होने के नाते यह स्वीकार करना चाहिए कि सभी मनुष्य आदम और हव्वा की संतानें हैं और इसलिए सभी आपस में बराबर हैं। कुरान मजीद में भी यह कहा गया है, ‘अल्ला की खिदमत करो और उसके साथ किसी और को खड़ा न करो और अपने माता-पिता, रिश्तेदारों, अनाथों, जरूरतमंदों, पड़ोसियों, अजनबियों, अपने साथियों, मुसाफिरों और भले आदमियों के साथ अच्छा बर्ताव करो क्योंकि अल्ला खुदपरस्तों तथा बढ़बोलों को प्यार नहीं करता।’ कुरान-4ः36।

पैगम मोहम्मद साहब ने यह भी कहा है, ‘फरिश्ता जिबरिल ने बार-बार मुझे अपने पड़ोसियों की देख-रेख करने के लिए कहा जबतक कि मैं यह नहीं समझने लगा कि अल्ला ही अपना वारिस बनाएंगे। उन्होंने इसपर भी जोर दिया कि आपके घर से अगले घर में रहने वाला ही व्यक्ति आपका पड़ोसी नहीं है बल्कि सभी दिशाओं में रहने वाले 40 घरों तक के लोग भी आपके पड़ोसी ही हैं। अगर किसी मुस्लिम का पड़ोसी भूखा हो तो उसे भी खाना नहीं खाना चाहिए।’ इसका मतलब यह है कि मुस्लिम को अपने

पड़ोसी के सुख-दुख को बांटते हुए उनके लिए भी वही कामना करनी चाहिए, जो वे खुद के लिए करते हों। पड़ोसियों के उच्च अधिकारों के बारे में पैगंबर कहते हैं, ‘वे इंसान जो अल्लाह और कयामत के दिन में विश्वास रखते हैं कभी भी अपने पड़ोसियों के लिए मुश्किलें और परेशानियां पैदा न करें। अपने मेहमानों का एजाज करें और सिर्फ अच्छा बोलें या फिर चुप रहें।’ बुखारी। और साथ यह भी कहा गया है, ‘जो अल्लाह और कयामत के दिन में विश्वास रखते हैं वे अपने पड़ोसियों के साथ भलाई करें।’ संक्षेप में हरेक सच्चा मुस्लिम अपने पड़ोसियों की जाति, तबके, मजहब पर विचार किए बिना उनके साथ बढि़या बर्ताव करने और उनकी मदद करने और उनका अदब करने और उनके प्रति दया भाव रखने के लिए बाध्य है। अल्लाह पड़ोसियों के अधिकारों को एक मजहबी जिम्मेदारी समझने और इंसानियत की ओर एक कदम बढ़ाने में मदद करे।

इस प्रकार हम देखते हैं कि मुस्लिम दाढ़ी देखते लोग पहले से यह विचार बना लेते हैं कि यह बंदा जरूर एक पक्षीय होगा। यह बंदा खतरनाक होगा। यह बंदा इस्लामिक राष्ट्र में विश्वास करने वाला होगा और जरूर अपने पड़ोसियों से लड़ाई करता होगा लेकिन ऐसी कोई बात नहीं है। मुसलमान नेक होता है। यदि वह सच्चा मुसलमान है तो वह अपने पड़ोसी से अच्छा व्यवहार करेगा और कभी भी इस्लामी राष्ट्र की बात नहीं करेगा। यदि कोई करता है तो वह सच्चा मुसलमान नहीं है। जिस प्रकार हिन्दुओं के लिए उनके तीर्थ पवित्रा हैं, उसी प्रकार इस्लाम के मानने वालों के लिए मक्का और मदीना पवित्रा हैं। इस्लाम के मानने वाले अपने धर्म के प्रति पायबंद हैं। नमाज, जकात, रोजा, हज उनके जीवन जीने का ढंग है। यह कारण है कि दुनिया में इस्लाम बड़े तेजी से फैला। आज कुछ लोग इस महान धर्म को विवादित और संकुचित बना रहे हैं। इसके लिए इस्लाम के मानने वाले भी दोषी हैं। हमें खुद के गिरेबान में भी झांकना होगा और हमारे खिलाफ जो दुष्प्रचार चल रहा है, उसे काउंटर करना होगा। 

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