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August 9 2020 11:11 AM

कहानियां : प्रकृति की संतान

Posted at: Mar 28 , 2020 by Dilersamachar 7468

दिलेर समाचार, नरेंद्र देवांगन। एक बार फागुन की मुलाकात सावन से हो गई तो वह बोला, ‘भाई सावन, तुम किसी दिन मेरे घर आओ न।‘

सावन ने कहा, ‘अवसर मिलेगा तो अवश्य आऊंगा।‘ यह कहकर सावन अपने घर चल पड़ा। फागुन ने भी अपनी राह पकड़ी।

काफी दिनों बाद सावन को जब याद आया तो वह फागुन से मिलने उसके घर की ओर चल पड़ा। वहां पहुंचा तो देखा कि फागुन का घर खूब साफ-सुथरा, लिपा-पुता है। अंदर नए-नए पकवान बन रहे हैं। आस-पड़ोस के लोग भी अच्छे-अच्छे कपड़े पहने हुए हैं। खेतों में गेहूं , जौ की बालियां लहलहा रही हैं। मटर पक चुके हैं। सरसों की डालियां झुक गई हैं। आमों में बौर आने लगे हैं। चारों ओर चिडि़यां चहक रही हैं। फागुन ने खुशी से झूम-झूमकर सावन को अपनी समृद्धि दिखाई। अंत में स्वादिष्ट भोजन कराकर उसे विदा किया।

चलते समय सावन ने कहा, ‘भाई फागुन, किसी दिन मौका निकालकर हमारे यहां भी आओ।‘

फागुन ने कहा, ‘जरूर।‘

कुछ दिनों के बाद फागुन जब सावन के घर गया तो देखा कि नदी-नाले सभी ओर भरे पड़े हैं। काले-काले बादल आकाश में छाए हुए हैं और बिजली रह-रहकर चमक रही है। सावन के घर का रास्ता कीचड़ से भरा पड़ा है। मेंढक टर्रा रहे हैं। मच्छर काटने को तैयार हैं। चारों ओर गंदगी का साम्राज्य है। किसी तरह वह सावन के घर पहुंचा।

फागुन को देखते ही सावन खुशी से झूम उठा और उसे गले से लगा लिया। फागुन के कपड़े गीले हो गए थे। सावन ने तुरंत अपने पास से उसे सूखे कपड़े दिए।

फागुन काफी दूर से आ रहा था। काफी थक गया था। भूख भी उसे जोर की लगी थी इसीलिए सावन ने तुरंत खाने के लिए उसे सब्जी और पूड़ी लाकर दी।

फागुन नाक-भौं सिकोड़ते हुए खाने लगा। खाने के बाद फागुन अकड़कर बोला, ‘भाई सावन, तुम्हारे घर के चारों ओर तो बहुत पानी, कीचड़ और गंदगी है। तुम इस जगह कैसे रहते हो?‘

सावन हंसकर बोला, ‘भाई फागुन, अगर यह कीचड़ और पानी न फैलाएं और नदी-नाले न भरें तो तुम ये अच्छे-अच्छे कपड़े और अच्छे-अच्छे पकवान कहां से पाओगे? फिर तो तुम्हारे बागों में बसंत ही न दिखाई पड़ेगा। अगर नाराज न हो तो कहूं, तुम्हारा यह ठाट-बाट कीचड़ और पानी की देन है। इसलिए इससे घृणा नहीं करनी चाहिए।‘

सावन की बातों को सुनकर फागुन मन ही मन बहुत लज्जित हुआ और बोला, ‘भाई सावन, मुझसे भूल हो गई। हम तुम एक ही प्रकृति की संतान हैं। इसलिए न कोई बड़ा है और न कोई छोटा, न कोई ऊंचा और न कोई नीचा।‘

‘हां, हमें आपस में मिल-जुलकर रहना चाहिए। इसी में हमारी भलाई है।‘ सावन बोला।

फागुन ने विदा लेते हुए कहा, ‘अच्छा, भाई सावन, अब मैं चलता हूं और तुम्हें जब भी समय मिले, घर अवष्य आना।‘

‘और तुम भी आया करना।‘ प्रत्युत्तर में सावन बोला।

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