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नहीं थम रहा दलितों का दमन, लगातार हो रहे है शिकार

Posted at: Mar 17 , 2018 by Dilersamachar 9774

नरेंद्र देवांगन

दिलेर समाचार, गुजरात के युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी पाखंडवाद के खिलाफ आवाज को बुलंद कर पाएंगे, इसमें शक है और जब तक हर तरह के पाखंड की पोल और चाल का भंडाफोड़ न होगा, समाज वर्गों व वर्णों में बंटा रहेगा। दलितों पर अत्याचार होते ही इसलिए हैं कि पाखंडवाद के चलते एक बच्चे को एक धर्म, एक जाति, एक गोत्रा पकड़ा दिया जाता है जिसे उसे जीवनभर ढोना होता है। उसकी जिंदगी इसी बंधन के सहारे बीतेगी, यह जन्म के दिन ही तय हो जाता है।

इलाहाबाद के एक रेस्त्रां में ऊंची जातियों के बिगड़ैलों का एक दलित को पीट-पीट कर मार डालने का मामला एक भयंकर खतरे का एक और एहसास है। इससे पहले हैदराबाद में रोहित वेमूला की खुदकुशी का मामला हुआ था। ऊना में दलितों को मारने का मामला हुआ था। राजस्थान में राजसमंद में एक लव जेहाद के नाम पर दलित को मारने की घटना हुई थी। मोबाइलों से बनी ऐसी फिल्मों का अंबार लग चुका है जिनमें दलितों को बुरी तरह मारा जा रहा है। औरतों और लड़कियों के बलात्कार के वीडियो भी वायरल होते रहे हैं।

दलित पढ़े या न पढ़े, सफल हांं या असफल, गरीब हों या अमीर उसकी जिंदगी जन्मकुंडली से तय रहती है। उसी के हिसाब से उसे मंदिरों में जाने की इजाजत होती है। उसी के हिसाब से उसका काम तय हो जाता है। उसी के हिसाब से उसको पत्नी मिलती है। उसी के हिसाब से उसे आरक्षण मिलता है या नहीं मिलता। सदियों से अछूतों के नाम से जाने जाने वाले दलित अब बराबरी की मांग कर रहे हैं और पढ़ने व कमाने के मौके पाकर देश की मुख्यधारा में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं पर पाखंड की राजनीति ऊंची जाति बनाम नीची जाति की रणनीति बनने लगी है और दलितों को दबाने-कुचलने की कोशिशें हो रही हैं। ऊंची जातियां चाहती हैं कि उन्हें सस्ते, असहाय, हुक्म मानने वाले मजदूर लगातार मिलते रहें और उन्हें डर लगता है कि अगर कल को दलित बराबर हो गए तो समाज का सदियों का बना ढांचा टूट जाएगा।

जन्म के साथ जुड़े इस पाखंड का न कांशीराम ने विरोध किया, न उनकी वारिस मायावती ने, न जिग्नेश कर रहे हैं, न रामविलास पासवान। उल्टे सब इस पाखंड को पाल रहे हैं और इसकी आड़ में अपनी राजनीति चमका रहे हैं। इन दलितों के पास वोट का हक है और इनके नेता अपनी पहचान का फायदा उठाने से चूक नहीं रहे हैं और दलित अपने से ऊंची जातियों, चाहे वे पिछड़ी कहलाती हों या राजपूत, वैश्य और ब्राम्हण, से भी कोई मेल-जोल नहीं बना पा रही है।

इलाहाबाद के रेस्त्रां की घटना एक खौलते रूख की निशानी है। ऊंची जातियां चाहे वे सवर्ण हों या गैर सवर्ण, सोचती हैं कि दलितों को वैसा ही रहना चाहिए जैसे वे सदियों रहे। दलित जातियां संख्या, चुनावी राजनीति और अब आरक्षण से मिली नौकरियों और पढ़ाई के बल पर बराबरी की सी मांग कर रही हैं। यह ऊंचों को सहन नहीं हो रहा है और हर शहर, कस्बे, गांव में इलाहाबाद जैसी घटनाओं की भरमार होने लगी है जिनमें से कुछ ही सुर्खियां बनती हैं।

दलितों के नेता यह सवाल नहीं पूछ रहे हैं कि वे आखिर जन्म से ही दलित क्यों हैं? सुप्रीम कोर्ट उनकी बदहाली पर आंसू बहाता है पर यह नहीं पूछता कि यह तमगा उन्हें दिया गया और क्यों इस पाखंड पर रोक लगाने की बात नहीं की जाती? भीमा कोरेगांव का हुजूम दलितों की इज्जत को लेकर जमा हुआ पर वे दलित कहे ही क्यों गए, यह सवाल नहीं पूछा जा रहा। उन मराठों को ऊंची पदवी किसने दी जिन्होंने इन दलितों को निशाना बनाया। आपस में भाईचारे की बात होती है पर इस भेदभाव की खाई को कौन कैसे खोद रहा है? इसकी जिम्मेदारी कौन ले रहा है। जो यह कर रहा है, वह दलित या राजनीतिक नेताओं से ज्यादा बड़ा गुनाहगार है और उसे रोकना होगा।

रोकने से पहले तो यह तय करना होगा कि हम यह करना भी चाहते हैं या नहीं। अगर ऊंची जातियां आज अपने उच्च कुल में जन्म लेने पर रोब से रहती हैं तो नीची से नीची जाति भी अपनी जाति इसी पाखंडवाद की पट्टी के कारण छोड़ने को तैयार नहीं। हाल के सालों में पाकिस्तान का बहाना लेकर इस पाखंड का जमकर बाजारीकरण हुआ है। गली का पाखंडबाज आज कई-कई शहरों में मॉल से पाखंड केंद्र बना बैठा है। इस पाखंड की फ्रैंचाइजी दी जाने लगी है। दलित आंदोलन शायद हिंदू समाज को सोचने पर मजबूर करे कि यह पाखंडवाद है जो देश को गरीब बनाए रख रहा है। वैसे उम्मीद कम है। साम, दाम, दंड, भेद का पाखंडी हथियार सदियों से कामयाब रहा है। आज क्यों नहीं रहेगा।

यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की कामकाजी जनता मोटे तौर पर दलितों की है। सवर्ण तो कभी भी मेहनत का काम करते ही नहीं थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अपने हाथ से काम करना अपमान समझते रहे हैं। पहले पिछड़े वर्गों के लोग खेतों, कारखानों और खानों में मेहनत का काम करते थे पर अब इनकी गिनती कम होने लगी है क्योंकि इनके पास जमीन आ गई है।

देश की तरक्की का दारोमदार आज दलितों पर है। उनसे मेहनत करा सकते हो तो देश को चीन बना सकते हो। उन्हें जानवर की तरह रखोगे तो सारा देश गरीब बना रहेगा। उनसे मारपीट करना अपने हाथों को जख्मी करना है। हो सकता है वे सहम जाएं, हो सकता है आपसी फूट की वजह से वे अपने हक न मांग सकें, हो सकता है पढ़े न होने के कारण वे पाखंडों में फंस जाएं पर इस सबसे देश को नुकसान होगा।

देश की हर गली में तू-तू मैं-मैं हो, हर नुक्कड़ पर दो-चार गुट एकदूसरे को मारने की फिराक में खड़े हों, अदालतें ऊंचे-नीचों के झगड़े निबटाने में लगी रहें, संसद में अत्याचारों की आवाजें ज्यादा गूंजें, तो देश आगे बढ़ने से रहा, उन्नति के सपने साकार होने से रहे।

दलितों के साथ बढ़ रहे अत्याचारों के पीछे वह पाखंडी सोच है जिसे हर रोज बढ़ावा दिया जा रहा है। संस्कृति की दुहाई देकर जो बात हर बाद याद दिलाई जाती है वह यही है कि समाज में अलग-अलग खेमे भगवान की देन हैं। पिछले जन्मों के पापों के फल हैं। उन पर उंगली न उठाइए क्योंकि यही इस समाज का दस्तूर है। यहां हरेक को बोलने, चलने- फिरने में अपनी पैदाइश का ख्याल रखना होगा। सिर्फ पढ़ाई कर लेने से जाति नहीं सुधर जाती। ऊंचों की सेवा करो, तभी कल्याण होगा, यह सोच देश को उसी गड्ढे में फिर धकेल देगी जहां से निकलने की कोशिशें हो रही हैं।

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