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कालेधन से नही बच पाये लालबाग के राजा, पिटारा खुलते ही फटी रह गई सभी की आंखे

Posted at: Sep 10 , 2017 by Dilersamachar 9557

दिलेर समाचार,मुंबई के परेल स्थित लालबाग के राजा का गणपति पंडाल। हर साल लालबाग के राजा को करोड़ों का चढ़ावा भक्त चढ़ाते हैं। इस साल भी भक्तों ने दिल खोलकर बप्पा पर पैसों की बरसात की। लेकिन शुक्रवार को जब बप्पा के चढ़ावे की दानपेटियां खुलीं और जो नोट दानपेटी से निकले उसे देखकर लालबाग राजा के कार्यकर्ता हैरान रह गये। क्योंकि, दानपेटी में से एक दो हजार नहीं बल्कि पूरे एक लाख 25 हजार रुपये के पुराने प्रतिबंधित नोट निकले।

नोटबंदी खत्म हुए 9 महीने से ज्यादा वक्त बीत चुका है। नियम के मुताबिक, अगर किसी के पास प्रतिबंधित नोट पाया जाता है तो वो गुनाहगार है। ज्यादातर लोगों ने अपने कैश को बैंकों में जमा कर दिया था। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने किसी मजबूरी की वजह से या फिर कालाधन होने की वजह से बैंकों में 500 और 1 हजार के नोट नहीं जमा कराए।
चूंकि पुराने नोट बंद हो चुके हैं। ऐसे में लालबाग के राजा के पंडाल के सामने सवाल ये है कि वो इन नोटों का करे तो क्या करे। लालबाग राजा पंडाल के एक अधिकारी ने बताया की चूंकि प्रतिबंधित नोट रखना गुनाह है इसलिये उन्होंने इस पैसों के बारे में तुरंत सारी जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे दी। लालबाग की तरफ से इन नोटों को एक्सचेंज करने की कोशिश की जायेगी अगर पैसे एक्सचेंज हो गये तो अच्छा है लेकिन अगर नहीं हुए तो उन्हें भी नहीं पता कि इन पैसों का करना क्या है।
लालबाग राजा पंडाल के अध्यक्ष बालासाहेब कांबले का कहना है कि श्रद्धालुओं की श्रद्धा पर सवाल खड़ा करना गलत होगा। ये पुराने नोट कालाधन हैं या नहीं वो हम नहीं कह सकते। लेकिन लालबाग और उसके आसपास के इलाके में चढ़ावे में मिले इन पुराने नोटों को लेकर कालेधन की चर्चा जोरों पर है।

क्यों इस साल लालबाग राजा को मिला कम चंदा
इन पुराने नोटों को छोड़ दिया जाए तो चढ़ावे की गिनती पूरी होने के बाद लालबाग ने जो आंकड़े जारी किये हैं उसके मुताबिक कैश 5।8 करोड़, सोना 5।5 किलो, चांदी 76 किलो दान में मिले हैं।

पिछले तीन वर्षों में अब तक का ये सबसे कम चढ़ावा है। लालबाग राजा पंडाल के अधिकारियों का कहना है कि इस कम चढ़ावे के पीछे दो बड़ी वजह हो सकती है। एक तो नोटबंदी और दूसरा गणेशोत्सव के दौरान हो रही मुसलाधार बारिश। गणेशोत्सव के दौरान भक्तों की संख्या हर साल के मुकाबले थोड़ी कम थी जिसका असर चढ़ावे पर हुआ।

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