Logo
September 30 2022 07:44 AM

आर्थिक संपन्नता बनी भारत में शिक्षा का वर्तमान उद्देश्य

Posted at: Mar 3 , 2018 by Dilersamachar 9642

संतोष तिवारी

दिलेर समाचार, विश्व गुरू की पदवी को सुशोभित करने वाला हिन्दुस्तान आज अपनों की साजिश का शिकार होकर कराह रहा है, कोई भी देश की आवाज सुनने को तैयार नहीं है, लोगों की जिन्दगी इतनी भागमभाग दौर से गुजर रही है कि लोग अपने माता-पिता, बच्चों, समाज, रिश्तेदारों और मित्रों के साथ समय निकालकर बात नही कर सकते हैं। देश के बारे में सोचना बडी बात है। देश में बेरोजगारी, महंगाई समेत मुद्दों ने लोगों को लोगों से दूर कर दिया है। इसकी वजह है आर्थिक विपन्नता। लोग इसको सही करने में लोग तरह-तरह के अच्छे कोर्स, डिग्री, डिप्लोमा, शिक्षा और टेªर्निंग लेकर आर्थिक मजबूती के लिये अग्रसर है।

 यह वही भारत है जहां लोग शिक्षा ग्रहण करके संस्कार, संस्कृति, परोपकार, दया, संतोष, सहयोग, प्रेम, शांति, सभ्यता आदि के माध्यम से शिक्षा का सदुपयोग करते और अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के साथ-साथ सामाजिक, राजनैतिक, आध्यात्मिक स्थिति को मजबूत करते थे लेकिन आज जिस तरह भारत में शिक्षा का बाजारीकरण हुआ है, इससे लोग आर्थिक रूप से भले मजबूत हांे लेकिन संस्कार, सभ्यता, संस्कृति व देशभक्ति के बारे में आज के युवा पहले के लोगों से काफी पीछे हैं जो देश के लिये एक बड़ी चुनौती है। भारत को युवा देश कहा जाता है क्योंकि यहां सबसे ज्यादा युवा निवास करते हैस देश के युवा आज के दौर में अपने को पुर्णतः व्यस्त रखते हैं। देश के युवाओं पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव इतना प्रभावी हो रहा है कि जैसे उनको भारतीय संस्कृति से कोई सरोकार नही है।

भारत के युवा मनीषी स्वामी विवेकानंद ने देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भारतीय संस्कृति का सम्मान बढ़ाया। क्या स्वामी जी मूर्ख थे जो विदेश में भी गेरूवा वस्त्रा पहनकर रहे। उस जमाने में स्वामी जी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते थे और शिकागो सम्मेलन में स्वामी जी ने अपने उद्बोधन से सबको मंत्रा मुग्ध कर लिया था। आज के फर्जी विद्वान जो दो लाइन अंग्रेजी रटकर किसी तरह जुगाड़ से किसी परीक्षा को पास करके नौकरी पा गये हैं तो लगता है कि विश्व का सबसे बड़ा विद्वान वही है।

 यह बडे़ अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि देश के कुछ आधुनिक विद्वानों को देश के लिये शहीद हुये वीर महापुरूषों का नाम तक नहीं मालूम है। केवल किसी तरह पैसा कमाये, बस हो गई देशभक्ति। देश के सरकारी विद्यालयों में आज के विद्वान अध्यापक केवल खानापूर्ति करने जाते है न कि पढ़ाने। सरकारी अस्पताल में निर्धारित समय तक किसी तरह डाक्टर साहब रह लें, मेहरबानी हो गई नहीं तो सरकारी वेतन से ज्यादा उनकी प्राइवेट प्रैक्टिस से मिल जाता है। सरकार के किसी अधिकारी से जब किसी मामले के बारे में पूछा जाता है तो केवल एक रटा रटाया जवाब मिलता है कि मामले की जांच की जायेगी और दोषी पाये जाने पर कार्यवाही होगी। आखिर क्यों होते हैं ऐसे खेल। कहीं न कहीं सबका कनेक्शन पैसे से ही है। यह मालूम है कि अधिकारी पढ़ लिखकर अपने पद को पाते है लेकिन पैसे की पिपासा उन्हें भी बिगाड़ देती है। आखिर क्या यही उद्देश्य है हमारी शिक्षा का?

  महात्मा गांधी जी भी पढे़ लिखे विद्वान महापुरूष थे, उन्हें भी अंग्रेजी का और कानून का भरपूर ज्ञान था लेकिन देशहित में एक संत के रूप में स्वयं को पेश करके देश की आजादी में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

देश के युवा जब तक स्वयं से देश के प्रति जागरूक नहीं होंगे। तब तक देश में अंधेरा कायम रहेगा और देश के अंदर बैठे कुछ भ्रष्ट नेता व अधिकारी देश को खोखला करके देश को पुनः गुलामी के तरफ ढकेल रहे है। हमारी आपकी सच्ची देशभक्ति यही है कि कम से कम हमारे किसी भी कार्यों से देश की संस्कृति, सभ्यता पर आंच न आये। युवाओं को अपनी रोजी रोटी के लिये उद्यम करना जरूरी है लेकिन शिक्षा के असूलों को ध्यान में रखकर कार्य करना है जिससे भारत मां का सर हमेशा ऊंचा उठा रहे और हम सब मिलकर हिन्दुस्तान को पुनः विश्वगुरू का दर्जा दिलाने के लिये प्रयासरत रहें।

ये भी पढ़े: कांग्रेस को फिर लगा झटका, टूटी उम्मीदें

Related Articles

Popular Posts

Photo Gallery

Images for fb1
fb1

STAY CONNECTED