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900 सालों का संरक्षित इतिहास है अष्टभुजा धाम मंदिर...यहां बिना सिर वाली मूर्तियों की होती है पूजा

Posted at: May 24 , 2018 by Dilersamachar 9539
दिलेर समाचार,  अपने देश में टूटी-फूटी खंडित प्रतिमाओं को घर में भी नहीं रखा जाता है, पर हमारे ही देश के इस स्थान पर प्राचीन काल से बिना सिर वाली प्रतिमाओं का पूजन चलाता आ रहा है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं एसे ही एक खास ऐसे मंदिर के बारे में, भारत विविधातों वाला देश है. यहां पर हर राज्य की अपनी ही खासियत है. खासियतों से भरा एक ऐसा ही मंदिर है उत्तरप्रदेश में स्थित अष्टभुजा धाम मंदिर. जहां खंडित बल्कि बिना सिर वाली मूर्तियों की पूजा की जाती है. प्रतापगढ़ के गोंडे गांव में बने 900 साल पुराने अष्टभुजा धाम मंदिर की मूर्तियों के सिर औरंगजेब ने कटवा दिए थे. शीर्ष खंडित ये मूर्तियां आज भी उसी स्थिति में इस मंदिर में संरक्षित की गई हैं.

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औरंगजेब ने कटवा डाले थे प्रतिमाओं के सिर

ASI के रिकॉर्ड्स के मुताबिक, मुगल शासक औरंगजेब ने 1699 ई. में हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया था. उस समय इसे बचाने के लिए यहां के पुजारी ने मंदिर का मुख्य द्वार मस्जिद के आकार में बनवा दिया था, जिससे भ्रम पैदा हो और यह मंदिर टूटने से बच जाए, लेकिन औरंगजेब के एक सेनापति की नजर मंदिर के घंटे पर पड़ गई, जिससे उसे शक हो गया कि ये मंदिर है. फिर सेनापति ने अपने सैनिकों को मंदिर के अंदर जाने के लिए कहा और यहां स्थापित सभी मूर्तियों के सिर काट दिए गए. आज भी इस मंदिर की मूर्तियां वैसी ही हाल में देखने को मिलती हैं.

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इस वजह से है खास

मंदिर की दीवारों, नक्काशियां और विभिन्न प्रकार की आकृतियों को देखने के बाद इतिहासकार और पुरातत्वविद इसे 11वीं शताब्दी का बना हुआ मानते हैं.गजेटियर के मुताबिक, इस मंदिर का निर्माण सोमवंशी क्षत्रिय घराने के राजा ने करवाया था. मंदिर के गेट पर बनीं आकृतियां मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध खजुराहो मंदिर से काफी मिलती-जुलती हैं.

रहस्यों से भरा है मंदिर

इस मंदिर के मेन गेट पर एक विशेष भाषा में कुछ लिखा है. यह कौन-सी भाषा है, यह समझने में कई पुरातत्वविद और इतिहासकार फेल हो चुके हैं. कुछ इतिहासकार इसे ब्राह्मी लिपि बताते हैं तो कुछ उससे भी पुरानी भाषा का, लेकिन यहां क्या लिखा है, यह अब तक कोई नहीं समझ सका.

यहां घूमना न भूलें

प्रतापगढ़ का अस्तित्व रामायण और महाभारत जैसे ग्रन्थ काल जितना पुराना है. ऐसा माना जाता है कि भगवान राम इस जगह पर आये थे और उन्होंने बेला भवानी मंदिर में पूजा की थी. महाभारत में भयहरण नाथ मंदिर का वर्णन है. पौराणिक कथा के अनुसार भीम ने बकासुर नाम के दानव का वध कर इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की थी. इस जिले से बहने वाली साईं नदी को हिन्दू श्रद्धालुओं द्वारा पवित्र माना जाता है और कई श्रद्धालु यहाँ आकर डुबकी लगाते हैं.

कैसे पहुंचे

इस मंदिर तक पहुंचने के लिए आप ट्रेन से आसानी से प्रतापगढ़ पहुंच सकते हैं. उसके बाद आपको मंदिर में पहुंचने के लिए बस या टैक्सी आसानी से मिल जाएगी.


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