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January 23 2020 11:04 AM

इस ‘कुप्रथा' से बुंदेलखंड के दलित हो रहे हैं आजाद

Posted at: Sep 16 , 2017 by Dilersamachar 5251

दिलेर समाचार,बुंदेलखंड के ललितपुर में दलित महिलाएं घर के बड़े-बुजुर्गों और ऊंची जातियों के लोगों को देखकर चप्पल सर और हाथ में ले लेती थी. ये परंपरा वर्षों से चली आ रही थी.बता दें कि रमेशरा गांव में सभी महिलाएं इस परंपरा को कई दशकों से निभा रही थीं. चप्पल पहनकर घर के बुजुर्गों और ऊंची जाति के लोगों के सामने नहीं जा सकते हैं. कोई भी मौसम हो इनके सामने से चप्पल हाथ में लेकर निकलना पड़ता था.

ललितपुर से सटे महरौनी, मड़ावरा ब्लाॅक और रमेशरा गांव की दलित महिलाएं बताती हैं कि 40 से 60 वर्ष की महिलाएं ससुराल में अपने से बड़े पुरुषों जैसे ससुर, ज्येष्ठ, नन्दोई या बड़ी जाति के लोगों के सामने चप्पल पहनकर नहीं जा सकती हैं.अपने ही घर के पुरुषों या ऊंची जाति के लोगों के सामने चप्पल पहनकर किसी महिला का जाना इज्जत और मर्यादा का विषय माना जाता है. सिर्फ महिला ही नहीं बल्कि पुरुष भी ऊंची जाति के सामने चप्पल पहनकर नहीं जाते हैं

देना पड़ता था जुर्माना
लोगो ने बताया कि अगर गलती से चप्पल पहनकर बड़े लोगों के सामने चले गये तो वो हमारी गलती के लिए हमपर जुर्माना लगते हैं, जिसके बदले हमारे घर के लोग कुछ पैसा दिया जाता है. उस पैसे को गांव के मन्दिर में रख देते हैं जरूरत पड़ने पर इसका उपयोग किया जाता है.

इस मामले में ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधान ने बताया कि ये परम्परा सदियों से चली आ रही थी. लेकिन अब 2 प्रतिशत ही बड़े-बुजुर्ग महिलाएं और पुरुष बचे हैं जो इस परम्परा को निभा रहे है. बाकि ये प्रथा अब पूरी तरह से समाप्त हो गई है. क्योंकि आज के युग में गांव के काफी नौजवान शिक्षित हो चुके हैं. वहीं ये युवा वर्ग अब इस परम्परा को नहीं मानते है.

बुर्जुग निभाते हैं आज भी ये परंपरा
लोगो ने बताया कि चाहे जितनी सर्दी हो, तपती धूप हो, हमें बड़ी जाति के लोगों के सामने चप्पल पहनने की अनुमति नहीं थी. लेकिन आज भी प्रधान के पास हमारे बुजुर्ग चप्पल पहनकर नहीं जाते, अगर जाते भी हैं तो हाथ में चप्पल लेकर जाते हैं.वर्षों से चली आ रही है इस परंपरा के बारे में ललितपुर के डीएम मानवेन्द्र सिंह ने बताया कि आपके द्वारा मेरे संज्ञान में ऐसा मामला पहली बार सामने आया है. मुझे इसकी जानकारी नहीं है. मैं प्रत्येक रविवार को गांव में चौपाल लगाता हूं, लेकिन मुझे आजतक ऐसी कोई बात सुनने को नहीं मिली. इस मामले के बारे में विस्तार से जानकारी जरूर हासिल करूंगा.
ललितपुर गांव की रहने वाली मीरा बताती हैं कि आज हम अपने घर से चप्पल पहनकर निकलते हैं. विरोध करने वाली महिलाओं की संख्या अभी बहुत ज्यादा नहीं है, पर बदलते समय के साथ एक दूसरे के देखा-देखी नई नवेली बहुएं चप्पल पहनकर निकलने लगी हैं. बदलते वक्त के साथ अब इन महिलाओं की चप्पल हाथों की बजाय पैरों की शोभा बढ़ा रही हैं.

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