Logo
October 19 2019 04:14 PM

मलाला को जब तालिबानियों ने मारा

Posted at: Oct 10 , 2019 by Dilersamachar 5314

ताबिश सिद्दीकी

मलाला को जब तालिबानियों ने मारा तो उनकी जान यहूदी और ईसाईयों ने मिलकर बचाई फिर अपना सब कुछ छोड़ कर मलाला विदेश में बस गयीं और उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार भी मिला। खूब दौलत, शोहरत से सम्पन्न हैं आज मलाला। उनके पिता जो कि उनके साथ ही रहते हैं, उन्होंने मलाला फाउंडेशन बनाया जिसे दुनिया के अमीर कबीर लोगों और बड़े बड़े हालीवुड अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने खुलकर दान दिया। लाखों डालर अब इस फाउंडेशन के पास हैं। यह फाउंडेशन लड़कियों की शिक्षा के लिए काम कर रहा है। ठीक है अच्छी बात है ये मगर मेरे हिसाब से मलाला को जो करना चाहिए था वो उन्होंने आज तक नहीं किया और उल्टा वो धीरे धीरे उसी विचारधारा के सपोर्ट में झुकती हुई नजर आ रही हैं जिसने आज भी उन जैसी जाने कितनी लड़कियों का जीना हराम कर रखा है।

मलाला को तालिबानियों ने गोली मारी। वो गोली उन लोगों ने इसलिए मारी थी क्यूंकि मलाला ने स्कूल जाने की कोशिश की थी और तालिबान चाहते थे कि लड़कियां उनकी इस्लामिक रियासत में स्कूल जाना बंद कर दें और घर में बैठें। तो लड़ाई दरअसल थी इस्लामिक विचारधारा और इस्लामिक शरीयत की जिसकी वजह से मलाला को गोली मारी गयी मगर इस विचारधारा के खिलाफ मलाला और उनके फाउंडेशन ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिस से इस विचारधारा को कमजोर किया जा सके या जड़ से खत्म किया जा सके। नोबेल पाने के बाद मलाला दार्शनिक बन गयीं और दार्शनिक बातें ज्यादा करने लगीं और इस्लामिक कट्टरपंथ के खिलाफ लगभग मौन ही हो गईं। वो लोगों को ये बताने में जुट गयीं कि पढ़ लिख कर आतंकवाद से निपटा जा सकता है.. कलम की ताकत से आतंकवाद मिटाया जा सकता है।

तो मलाला के हिसाब से मामला यह है कि अगर इंसान चाहे तो तालिबान के बीच में ही रहकर आर्टिकल लिखकर और तालिबानियों के साथ कांफ्रेंस कर के उन्हें सुधार सकता है। वही अब वो कर रही हैं। पाकिस्तान समेत अनेक देशों की लड़कियों को पढ़ा रही हैं ताकि तालिबान जैसी सोच खत्म हो जाये। लड़कियां पढ़ जाएंगी तो तालिबान भाग जाएंगे और हर इस्लामिक देश मे औरतों को खुल्ला घूमने की आजादी मिल जाएगी तो मलाला के हिसाब से उनको गोली मारना तालिबानियों के द्वारा ऐसा ही था जैसे भारत में निम्न वर्ग में रहने वाले लोग अपनी बेटियों की शिक्षा पर ध्यान नहीं देते हैं और उन्हें स्कूल नहीं भेज देते हैं या जल्दी शादी कर देते हैं। वैसे ही तालिबान थे। वो भी ये नहीं चाहते थे कि मलाला स्कूल जाएं। वो चाहते थे कि वो शादी कर के घर बसा लें। ये समस्या थी मलाला के हिसाब से जिनके वजह से उनको गोली मारी गयी। सारी समस्या और उसका समाधान ही उलट पलट दिया मलाला और उनके पिताजी ने मिलकर। लड़ना उन्हें इस्लामिक कट्टरपंथ से था और वो दोनों दार्शनिक बन गए।

यह एक मलाला की बात नहीं है.. अपनी इस उम्र में मैंने सैंकड़ों को देखा है ऐसे पलटते हुए। कभी समाज और आसपास का वास्ता देकर तो कभी ये कहकर कि विरोधी खेमा हमारे विरोध का फायदा उठा लेगा।

अभी हाल ही में भारत में रहने वाले एक साहब को इस्लाम के खिलाफ कुछ लिखने के कारण उनके शहर के लोगों ने भीड़ बनकर उन पर हमला बोल दिया था। दो दिन जेल में रहना पड़ा उन्हें। फिर उन्होंने माफी मांगी सब से और छूट गए। अब वो सिर्फ इस्लाम की तारीफ में पोस्ट करते हैं। इस्लामिक खलीफा उनके आइडियल हैं और अगर वो कहीं भी किसी खलीफा के खिलाफ कुछ लिखा हुआ देखते हैं तो सीधे हमला कर देते हैं। उन्हें ये पता है कि जो भीड़ उनको मारने आयी थी, वो अक्षरशः इन्हीं खलीफाओं के पदचिन्हों पर चलने वाली भीड़ है। ऐसे ही बड़ी बड़ी भीड़ और बड़ी बड़ी सेनाएं बना कर इन खलीफाओं ने अरब और उसके आसपास से हर उस व्यक्ति को या तो निकाल के बाहर फेंका या जान से मार दिया, जिस किसी ने भी इस्लाम को न अपनाया या विरोध किया या उनके पदचिन्हों पर चलने से इंकार किया मगर इन्हें लगता है कि जो भीड़ इनको मारने आयी थी, वो जाहिलों की भीड़ थी। पढ़ लिख जाती तो शायद इनको मारने न आती। जैसे मलाला सोचती हैं कि लड़कियां पढ़ जाएंगी तो तालिबानी सोच खत्म हो जाएगी। ये साहब मलाला की ही तरह हर हदीस और उसके मानने वालों को सपोर्ट करते हैं। हजरत उमर और अबू बकर को कोई कुछ कह दे तो उस से लड़ने को तैयार हो जाते हैं और ये कभी नहीं बताते कि कोई व्यक्ति जब इस्लाम का विरोध करता था या इस्लाम छोड़ देता था तो उमर उसकी गर्दन क्यूं काट देते थे?

ऐसे माडरेट लोगों ने इस दुनिया को नर्क बना के रखा हुआ है। इन्हीं लोगों ने दरअसल सारी दुनिया को हमेशा ऐसा भ्रमित किया है कि दुनिया कभी असल समस्या की जड़ तक पहुंच ही नहीं पाई क्योंकि दुनिया को कभी इतनी फुर्सत ही नहीं रही है कि वो इस्लाम और उसकी मान्यताओं की जड़ों में घुसकर देखे और उसका अध्ययन करे और समस्या समझे। जैसे ही समस्या उपजती है, भीड़ की भीड़ माडरेट वहां पहुंच जाते हैं और लीपा पोती करके नासूर छिपा देते हैं। वो हमसे और आपसे लड़ कर हमें ही इस्लाम का असल दुश्मन साबित कर देते हैं और लगभग सारी दुनिया भी इस पर धीरे धीरे यकीन कर लेती है।

इसीलिए मैं तारिक फतेह, तस्लीमा नसरीन, सलमान रुश्दी, इमाम तौहीदी, हसन निसार जैसों को पूरी तरह समर्थन देता हूँ क्यूंकि इन लोगों ने समस्या को समझा और समस्या से मुंह नहीं फेरा। तारिक फतेह को इन्हीं तालिबानी सोच वालों की वजह से अपना घर बार छोड़ना पड़ा और अगर वो दिन रात, चौबीस घंटे भी कट्टर इस्लामिक सोच को कोसें तो भी कम है। इमाम तौहीदी के घर वालों को जिंदा जला दिया गया था तालिबानी सोच वालों के द्वारा, इसलिए उनकी आने वाली सौ पुश्तें भी मातम मनाएं और इस्लाम मानने वालों को कोसें तो भी कम है। तस्लीमा नसरीन का सब कुछ छूट गया और अगर अब आप उनसे ये उम्मीद रखें कि वो इस्लाम को अपना प्रिय धर्म बता कर उंसके माडरेट संस्करण का प्रसार करें तो आप से बड़ा बेवकूफ कोई नहीं है। तस्लीमा जो कर रही हैं उन्हें दरअसल यही करना चाहिए था। वो सच्ची हैं। उन्होंने मलाला की तरह मुखौटा नहीं लगाया है।

इसलिए मैं अब ऐसे लोगों से कोई समझौता नहीं करता जो किंतु परन्तु करते हुए मूल समस्या से हमारा और आपका ध्यान भटका देते हैं। हम और आप मलाला जैसों की दार्शनिक बातों में उलझ कर कभी भी तालिबानियों की जड़ में मट्ठा नहीं डाल पाएंगे और अपनी आने वाली नस्लों को ऐसे ही पीडि़त जीवन और बदहाल पृथ्वी विरासत में दे कर जाएंगे। 

ये भी पढ़े: बुलंदशहर में सड़क के किनारे सो रहे लोगों पर चढ़ी बस


Tags:

Related Articles

Popular Posts

Photo Gallery

Images for fb1
fb1

STAY CONNECTED