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आखिर कब होगा प्लास्टिक मुक्त भारत ?

Posted at: Jul 6 , 2018 by Dilersamachar 5212

दिलेर समाचार, नरेंद्र देवांगन, प्लास्टिक आज हमारे जीवन में अत्यंत उपयोगी वस्तु है और हम हर दिन प्लास्टिक का उपयोग कई तरह से करते हैं। सुबह उठते ही टूथब्रश और टूथपेस्ट से लेकर भोजन की पैकिंग, यातायात साधन, फोन, कंप्यूटर सभी चीजों में प्लास्टिक है। इसके बिना आज जीवन की परिकल्पना असंभव सी लगती है लेकिन यह पर्यावरण के लिए घातक है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्लास्टिक से बनी अधिकांश वस्तुएं या तो पूर्णतः नष्ट नहीं होती या इसमें 500 से 1000 वर्ष तक लग सकते हैं।

जिस प्लास्टिक को वैज्ञानिकों ने मानव जाति की सुविधा के लिए ईजाद किया था, वह भस्मासुर बनकर समूचे पर्यावरण के विनाश का कारण बनती जा रही है। इसकी सबसे बड़ी खूबी ही दुनिया के लिए सबसे खतरनाक बात बन गई है और वह है नष्ट न होना। इसके चलते हमारी धरती से लेकर समुद्र तक हर तरफ प्लास्टिक ही प्लास्टिक है। पीने के पानी में हम प्लास्टिक पी रहे हैं, नमक में प्लास्टिक खा रहे हैं।

सालाना लाख से अधिक जलीय जीव प्लास्टिक प्रदूषण से मर रहे हैं। इसका सबसे ताजा उदाहरण थाईलैंड में देखने को मिला है जहां एक व्हेल मछली 80 से अधिक प्लास्टिक थैली निगलने के कारण मर गई। दुनिया की यह दुर्गति हमारी अपनी वजह से हुई है। हम विकल्पों की तरफ देखना नहीं चाहते। यही वजह है कि इस वर्ष पर्यावरण दिवस (5 जून) की थीम प्लास्टिक प्रदूषण को मात देने पर आधारित है। इस वर्ष इसका वैश्विक आयोजन भारत में हो रहा है।

भारत समुद्रों में सर्वाधिक प्लास्टिक प्रदूषण फैलाने वाले 20 देशों में 12वें स्थान पर है। चीन, दक्षिण-पूर्व एशियाई देश, श्रीलंका, मिस्र, नाइजीरिया, बांग्लादेश व दक्षिण अफ्रीका भारत से भी ऊपर हैं। समुद्रों में सर्वाधिक प्लास्टिक कचरा डालने वाली 20 नदियों में तीन सिंधु, ब्रह्मपुत्रा और गंगा भारत की नदियां हैं।

केंद्रीय प्रदूषण नियामक बोर्ड के मुताबिक देश में रोजाना 15 हजार टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। इसमें से 9 हजार टन को एकत्रा करके प्रोसेस किया जाता है लेकिन 6 हजार टन प्लास्टिक को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है। देश के प्रमुख शहरों मंे प्लास्टिक कचरे के आकलन और मात्रा के निर्धारण पर केंद्रीय प्रदूषण नियामक बोर्ड की 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक तकरीबन 70 फीसदी प्लास्टिक पैकेजिंग उत्पाद बहुत कम समय में कचरे में तब्दील हो जाते हैं।

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि तकरीबन 66 प्रतिशत प्लास्टिक कचरे में मिश्रित कचरा था जिसमें पॉलीबैग, खाद्य पदार्थों को पैक करने के काम आने वाले कई लेयरों वाले प्लास्टिक पाउच शामिल थे। अध्ययन के मुताबिक रोजाना निकलने वाले 50,592 मीट्रिक टन ठोस कचरे में से औसतन 6.92 किलोग्राम प्रति मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा हर रोज डंप किया जाता है। 

1950 से लेकर अब तक उत्पादित प्लास्टिक में सिर्फ 20 फीसदी ही या तो रिसाइकल किया गया है या बिजली बनाने में इस्तेमाल किया गया है। शेष हमारी धरती और समुद्रों को प्रदूषित कर रहा है। 60 प्रतिशत प्लास्टिक पदार्थ ऐसे हैं जो सिर्फ एक बार इस्तेमाल के लिए बनाए जाते हैं जैसे चाय या कॉफी के कप, पानी या अन्य पेय पदार्थ की बोतल और पॉलिथिन के थैले।

अमेरिका में सालाना औसत व्यक्ति 109 किलोग्राम प्लास्टिक का इस्तेमाल करता है। इसके मुकाबले भारत में एक औसत भारतीय सालाना 11 किलोग्राम प्लास्टिक का इस्तेमाल करता है। मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्रा में प्लास्टिक की जरूरत को देखते हुए भारतीय प्लास्टिक उद्योग 2022 तक प्रति व्यक्ति प्लास्टिक उपयोग को दोगुना करने के प्रयास में है। फिलहाल देश में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर लगाम कसने के लिए भारत सरकार ने 2016 में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स जारी किया जिसमें सिर्फ एक कानून है कि कोई उत्पादक या दुकानदार 50 माइक्रान से कम मोटी प्लास्टिक इस्तेमाल नहीं कर सकता है। यह कानून अन्य सभी प्रकार के प्लास्टिक बैग पर लागू नहीं होता, इसलिए प्लास्टिक का उपयोग कम नहीं होता।

हमारे देश की अपेक्षा विदेशों में प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने के लिए कड़े कायदे- कानून बनाए गए हैं। फलस्वरूप कई देश प्लास्टिक मुक्त हो चुके हैं। फ्रांस ने 2016 में प्लास्टिक पर बैन लगाने का कानून पारित किया। इसके तहत प्लास्टिक की प्लेटें, कप और सभी तरह के बर्तनों को 2020 तक पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया जाएगा। फ्रांस पहला देश है जिसने प्लास्टिक से बने रोजमर्रा की जरूरत के सभी उत्पादों को पूरी तरह प्रतिबंधित किया है। इसके तहत प्लास्टिक उत्पादों के विकल्प के तौर पर जैविक पदार्थों से बने उत्पादों को इस्तेमाल किया जाएगा।

अन्य विकासशील देशों की तरह रवांडा में भी प्लास्टिक की थैलियों ने जल निकासी के रास्ते अवरूद्ध कर दिए थे जिससे यहां के ईकोसिस्टम को नुकसान पहुंचने लगा था। इस विकट स्थिति से निपटने के लिए यहां की सरकार ने देश से प्राकृतिक रूप से सड़नशील न होने वाले सभी उत्पादों को प्रतिबंधित कर दिया। यह अफ्रीकी देश 2008 से प्लास्टिक मुक्त है।

स्वीडन में प्लास्टिक प्रतिबंधित नहीं किया गया है बल्कि प्लास्टिक को अधिक से अधिक रिसाइकिल किया जाता है। यहां हर तरह के कचरे को रिसाइकिल करके बिजली बनाई जाती है। इसके लिए यह पड़ोसी देशों से कचरा खरीदता है। आयरलैंड ने 2002 में प्लास्टिक थैलियों पर टैक्स लागू किया जिसके तहत लोगों को प्लास्टिक थैली इस्तेमाल करने पर भारी भरकम टैक्स चुकाना पड़ता था। इस कानून के लागू होने के कुछ दिन बाद प्लास्टिक थैली के इस्तेमाल में 94 फीसदी कमी आ गई।

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