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यमराज भी भय खाते हैं ‘वैद्यनाथ’ के भक्तों से

Posted at: Jul 9 , 2019 by Dilersamachar 10947

आनंद कुमार अनंत

श्रावण (सावन) माह के आगमन के साथ ही ’हर हर महादेव‘ की गूंज के साथ शिव भक्त काँवर लेकर सुल्तान गंज से जल भरकर वैद्यनाथ धाम की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। ज्योतिर्लिंगों के रूप में भगवान शिव के द्वादश अवतार हैं जिनमें चिताभूमि में वैद्यनाथ भी एक हैं।

समस्त ज्योतिर्लिंगों में वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंंग का अत्यन्त महत्त्व है। वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग जहां संस्थापित है, उसे वैद्यनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। इस शिव भूमि को चिताभूमि, महादेव भूमि एवं सिद्धपीठ के नाम से भी जाना जाता है। इस ज्योतिर्लिंग को ’कामना लिंग‘ के नाम से भी जाना जाता है।

परम पवित्रा ग्रन्थ शिवपुराण के अनुसार कामना लिंग के स्पर्शन, दर्शन, अभिषेचन तथा पूजन से सम्पूर्ण कामनाएं सिद्ध हो जाती हैं। शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार लंकाधिपति रावण की कठिन तपस्या से महादेव, महामहिम, महानिधि महाशक्ति एवं महावीर्य भगवान् शिव प्रसन्न हुए।

रावण ने कहा-’देवेश्वर। मैं आपको लंका ले जाना चाहता हूं। आप वहां स्थायी रूप से निवास करें। भक्त की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने कहा-’तुम जहां भी मुझे ले जाना चाहोगे, मैं जाऊंगा किन्तु मार्ग में मुझे तुम जहां भी रख दोगे, मैं वहीं सुस्थिर हो जाऊंगा।‘

रावण ज्योतिर्लिंग को लेकर चला किन्तु मार्ग में मूत्रावेग को नहीं रोक पाने के कारण उसने एक चरवाहे को शिवलिंग थमा दिया। चरवाहे का नाम वैद्यनाथ था। चरवाहे ने शिवलिंग के भार को बर्दाश्त नहीं किया और उसे उसी स्थान पर रखकर भाग निकला। प्रभु कृपा से रावण काफी देर बाद मूत्रा त्याग करके आया।

रावण ने जब शिवलिंग को वहां स्थापित देखा तो उसने लिंग के मस्तक पर मुक्के का प्रहार कर दिया जिससे शिवलिंग भूमि में धंस कर चपटा हो गया। आज भी शिवलिंग की यही स्थिति है। चरवाहा वैद्यनाथ द्वारा भूमि पर रखे जाने के कारण उस स्थान का नाम ’वैद्यनाथ धाम‘ तथा रावण द्वारा लाए जाने के कारण उनका नाम ’रावणेश्वर‘ पड़ा।

आनन्द रामायण के अनुसार भगवान् राम ने अपने राज्याभिषेक के बाद अपनी पत्नी सीता एवं अपने भ्राताओं के साथ सुल्तानगंज में स्थित उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर कांवर के साथ नंगे पांव चलकर वैद्यनाथ धाम पहुंचकर कामना लिंग की आराधना की तथा ज्योतिर्लिंग पर जलाभिषेक किया। किंवदंती के अनुसार रावण प्रत्येक दिन लंका से प्रस्थान करके रावणेश्वर पर जल चढ़ाने आता था। जल चढ़ाने के बाद ही वह आहार ग्रहण करता था।

भक्तिपरायणता के साथ कामना लिंग की अभ्यर्चना से पग-पग पर सब प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। रोग, दुःख, उद्वेग, कुटिलता एवं व्यग्रता का नाश हो जाता है। कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जो व्यक्ति जिस किसी भी कामना के साथ बाबा के दरबार में पहुंचता है, उसकी पूर्ति अवश्य होती है। ज्योतिस्वरूप शिवलिंग में भगवान् शिव निरन्तर अन्तर्निहित रहते हैं।

सायंकाल शिवलिंग की सजावट फूलों से होती है। उस समय जल चढ़ाना वर्जित होता है। यह जानकर आश्चर्य होगा कि शिवलिंग की फूलों की सजावट वहां के कारागार के कैदियों द्वारा बनाये गई झांकियों द्वारा ही होती है।

रावणेश्वर मंदिर केे ठीक सामने माता पार्वती का मन्दिर है। बाबा के मन्दिर के ऊपरी भाग से लेकर माता पार्वती के मंदिर के ऊपरी भाग तक कपड़े का अंचरी भक्तों द्वारा टांगा जाता है। मन्दिर की परिक्रमा मार्ग में शिवगणों, भैरवनाथ एवं गणपति सहित अनेक देवी-देवताओं के मन्दिर हैं। बाबा रावणेश्वर का मन्दिर विश्वकर्मा द्वारा निर्मित बताया जाता है।

सम्पूर्ण शिवलिंगों में ’कामना लिंग‘ का महत्त्व सर्वाधिक बताया गया है। प्रत्येक वर्ष करोड़ों विदेशी पर्यटक भी सावन के माह में जलाभिषेक करके स्वयं को धन्य मानते हैं। मानव जीवन में कम से कम एक बार इस ’कामना लिंग‘ के दर्शन अवश्य करने चाहिए। कहां जाता है कि रावणेश्वर मन्दिर पहुंचकर जलाभिषेक करने वाले को यमराज भी परेशान नहीं करते। 

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